हरियाणा के कई हिस्सों में आलू की बुवाई का काम शुरू हो चुका है। हालांकि, पिछले सीजन में में कम बाजार भाव ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया था। इसी वजह से किसान अब भावांतर भरपाई योजना के तहत मिलने वाले भाव को 600 रुपये से बढ़ाकर कम से कम 900 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग कर रहे हैं। किसान इस मांग के पीछे खेती की बढ़ती लागत का हवाला दे रहे हैं।
पिछले साल उत्पादन लागत से भी निचे लुढ़का भाव
किसानों को कहना है कि पिछले साल सफेद आलू का भाव 200 रुपये प्रति क्विंटल से भी नीचे गिर गया था। यह भाव आलू की उत्पादन लागत से भी कम है। उन्होंने बताया कि बीते सीजन में कम भाव के साथ रोगों का प्रकोप, मजदूरी-भंडारण और परिवहन खर्च में बढ़ोतरी होने से भारी नुकसान उठाना पड़ था।
बाजार की मार से बचाने वाली योजना
भावांतर भरपाई योजना किसानों को बाजार की मार से बचाने का काम करती है। अगर फसल एमएसपी से कम दाम पर बिकती है, तो योजना के तहत सरकार बाजार भाव और एमएसपी के अंतर को किसान के बैंक खाते में पहुंचाती है।
आलू का लागत 800 रुपये क्विंटल, रकबे में गिरावट के आसार
आलू बाजार में पिछली सुस्ती को असर रकबे पर भी देखने को मिल रहा है। कई किसानों ने आलू के रकबे को घटाने का फैसला लिया है, क्योंकि आलू उत्पादन की लागत और बाजार भाव में अस्थिरता किसानों के लिए चिंता की विषय है। किसान नेताओं का कहना है कि बीते सालों में आलू उत्पादन की लागत बढ़कटर 800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंची है। यह वजह है कि किसान सुरक्षित मूल्य में उसी हिसाब से बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। किसान नेताओं ने साफ किया कि अगर सुरक्षित भाव नहीं बढ़ा, तो किसान आलू का रकबा कम करने शुरू कर सकते हैं।