विज्ञापन
Home› Khabar Junction› Deficient Rainfall Hits The Rabi Season A Sharp 37 Drop In Sowing Significant Decline In Mustard And Pulse

कम बारिश से रबी सीजन को झटका : बुवाई में 37% की भारी गिरावट, सरसों-दलहन के रकबे में बड़ी कमी, गेहूं का क्या?

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Tue, 27 Oct 2026 09:19 AM IST
सार

  • देश में रबी फसलों की शुरुआती बुवाई 37 प्रतिशत घटी, 23 अक्टूबर तक 17.78 लाख हेक्टेयर में हुई बुवाई।
  • सरसों की बुवाई में 38 प्रतिशत की गिरावट, राजस्थान में कम बारिश से सबसे ज्यादा असर।
  • चने का रकबा पिछले साल के 3.77 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.21 लाख हेक्टेयर रह गया।
  • गेहूं की बुवाई अब तक 11 हजार हेक्टेयर में हुई, मौसम ठंडा होने पर तेजी आने की उम्मीद।
  • कई रबी उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी से सिंचाई का खर्च बढ़ने और पैदावार प्रभावित होने की आशंका।

रबी फसलों की बुवाई में भारी गिरावट।
रबी फसलों की बुवाई में भारी गिरावट। - फोटो : StoryBlocks
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इस साल रबी सीजन की शुरुआती बुवाई में पिछले साल की तुलना में 37 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के ताजा बुवाई आंकड़ों में यह बात सामने आई है। 23 अक्टूबर तक देशभर में केवल 17.78 लाख हेक्टेयर में रबी फसलों की बुवाई हो सकी है, जबकि पिछले साल इसी समय तक यह आंकड़ा 28.16 लाख हेक्टेयर था। बुवाई में इस बड़ी गिरावट का सबसे मुख्य कारण सरसों की खेती का धीमा होना है। विशेष रूप से राजस्थान में कम बारिश की वजह से किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे शुरुआती बुवाई प्रभावित हुई है। सर्दी में होने वाले धान की रोपाई भी पिछले साल के 2.13 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस बार केवल 1.02 लाख हेक्टेयर में हो पाई है।

सरसों और दलहन फसलों के रकबे ने बढ़ाई चिंता
आंकड़ों के अनुसार, इस साल सरसों की बुवाई केवल 13.10 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के 21.03 लाख हेक्टेयर से 38 प्रतिशत कम है। सरसों और चने के सबसे बड़े उत्पादक राज्य राजस्थान में स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है। सूत्रों के अनुसार, 21 अक्टूबर तक राजस्थान में सरसों का रकबा 6 लाख हेक्टेयर तक भी नहीं पहुंच पाया था, जबकि पिछले साल यह 12 लाख हेक्टेयर था। पूर्वी राजस्थान में 1 से 26 अक्टूबर के बीच सामान्य से 51 प्रतिशत और पश्चिमी राजस्थान में 63 प्रतिशत कम बारिश हुई है। हालांकि, प्रमुख सरसों उत्पादक जिलों भरतपुर और अलवर में हाल ही में सामान्य से अधिक बारिश हुई है, जिससे यहां बुवाई बढ़ने की उम्मीद है। सूत्रों का कहना है कि सरसों की बुवाई का यह सबसे जरूरी समय है। यदि इसमें देरी होती है और अल नीनो के प्रभाव से जनवरी-फरवरी में तापमान बढ़ता है, तो फसल के सही समय पर पकने में समस्या आ सकती है। दलहन की बात करें तो इसकी बुवाई भी पिछले साल के 4.39 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.27 लाख हेक्टेयर रह गई है, जिसमें चने का रकबा 3.77 लाख से गिरकर 2.21 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है।

सीजन की प्रमुख फसल गेहूं भी पिछड़ी
रबी सीजन की सबसे मुख्य फसल गेहूं की बुवाई भी अभी बेहद कम है। आंकड़ों के अनुसार, अब तक केवल 11,000 हेक्टेयर में गेहूं बोया गया है, जबकि पिछले साल यह 27,000 हेक्टेयर था। अधिकारियों के अनुसार, गेहूं की बुवाई का मुख्य समय एक नवंबर से शुरू होता है और लगभग दो महीने तक चलता है। शुरुआत में मिट्टी में पर्याप्त नमी न होने और दिन का तापमान अधिक रहने के कारण बुवाई रुकी हुई थी। अधिकारियों को उम्मीद है कि मौसम ठंडा होने और नमी बढ़ने पर इसमें तेजी आएगी। हालांकि, एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे के कारण इस साल गेहूं के कुल रकबे में कुछ गिरावट आ सकती है। सरकार के अनुसार, इस साल कुल 177.72 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 121 मिलियन टन गेहूं, 17.20 मिलियन टन दलहन, 22.30 मिलियन टन मोटे अनाज, 14.3 मिलियन टन सरसों और 12.33 मिलियन टन चने के उत्पादन का लक्ष्य शामिल है।

बारिश की कमी से किसानों का बढ़ सकता है खर्च
देश के अन्य प्रमुख रबी उत्पादक राज्यों में 1 से 26 अक्टूबर के बीच बारिश का भारी अभाव देखा गया है। उत्तर प्रदेश में सामान्य से 43 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 91 प्रतिशत, गुजरात में 98 प्रतिशत, बिहार में 55 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 96 प्रतिशत और कर्नाटक में 36 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इसके ठीक उलट, भारी बारिश के चलते पंजाब में 239 प्रतिशत और हरियाणा में 183 प्रतिशत अधिक पानी बरसा है। हालांकि ज्यादातर रबी फसलें सीधे बारिश पर निर्भर नहीं होती हैं और किसान सिंचाई के लिए भूजल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन लंबे समय तक बारिश न होने और सूखे की स्थिति से पैदावार पर असर पड़ सकता है और सिंचाई करने में किसानों का खर्च काफी बढ़ सकता है।


विज्ञापन
विज्ञापन