भारत की आत्मा गांवों में बसती है और इन गांवों की समृद्धि का मुख्य आधार हमारी कृषि है। पारंपरिक नजरिए से भारतीय कृषि में मिट्टी, जल, पशुधन, बीज और जैव विविधता हमेशा से अहम भूमिका निभाते आए हैं। पहले खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हुआ करते थे। पशुओं के गोबर से खेतों की उर्वरता बढ़ती थी और खेतों का चारा पशुओं के काम आता था। गोबर की खाद, फसल चक्र, हरी खाद और मिश्रित खेती हमारी पारंपरिक व्यवस्था का अहम हिस्सा थे।
परंपरा से लेकर हरित क्रांति तक का सफर
समय के साथ बढ़ती जनसंख्या और खाद्यान्न की मांग ने कृषि का स्वरूप बदल दिया। 1960 के दशक में देश को खाद्य संकट से निकालने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत हुई। उन्नत किस्म के बीजों, सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों (खाद) और कीटनाशकों के उपयोग से उत्पादन में भारी वृद्धि हुई और भारत खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर बना।
हालांकि, इसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी सामने आए। असंतुलित मात्रा में रसायनों का उपयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य ने पर्यावरण के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। आज हमें केवल अधिक उत्पादन नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा उत्पादन चाहिए जो मिट्टी, जल, पर्यावरण और किसान की आय, सभी को सुरक्षित रख सके। इसी दिशा में जैविक और टिकाऊ खेती एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है।
मिट्टी की सेहत काफी अहम पूंजी, न करें ये काम
मिट्टी केवल पौधों को खड़ा रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत प्राकृतिक संसाधन है। इसमें मौजूद सूक्ष्मजीव, केंचुए और पोषक तत्व फसल उत्पादन में अहम भूमिका निभाते हैं।
लगातार एक ही फसल बोना, फसल के अवशेषों को खेत से बाहर निकालना या जलाना, और जरूरत से ज्यादा जुताई करना मिट्टी को नुकसान पहुंचाता है। यह समझना जरूरी है कि केवल रासायनिक खाद ही मिट्टी के खराब होने का एकमात्र कारण नहीं है। मुख्य समस्या रसायनों का असंतुलित उपयोग और मिट्टी में जैविक पदार्थों की कमी है। इसलिए, मिट्टी की जांच के आधार पर संतुलित पोषण देना बहुत जरूरी है।
कृषि अवशेष से मिट्टी बनेगी उपजाऊ
जैविक खेती में मिट्टी की उर्वरता और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने पर जोर दिया जाता है। गन्ने की सूखी पत्तियां, धान का पुआल और गेहूं का भूसा कचरा नहीं, बल्कि खेत के लिए बहुमूल्य संसाधन हैं। इन्हें जलाने के बजाय अगर वैज्ञानिक तरीके से कंपोस्ट बनाकर वापस खेत में डाला जाए, तो यह प्रदूषण कम करने के साथ-साथ मिट्टी को उपजाऊ भी बनाता है। गोबर की खाद, वर्मी-कंपोस्ट और हरी खाद इसके अहम इनपुट हैं।
फसल चक्र अपनाएं, दलहन को दें जगह
लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी के खास पोषक तत्व खत्म होने लगते हैं और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए फसल चक्र अपनाना चाहिए। जैसे- गेहूं और मक्का के साथ चना, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलें बोना। दलहनी फसलें हवा से नाइट्रोजन खींचकर मिट्टी को देती हैं। कीटों से बचाव के लिए केवल एक उपाय काफी नहीं है। नीम आधारित उत्पाद, जैविक कीटनाशक, फेरोमोन ट्रैप और मित्र कीटों का बचाव करना फायदेमंद है। सही समय पर कीटों की पहचान और समेकित कीट प्रबंधन अपनाना सबसे वैज्ञानिक तरीका है।
जैविक खेती को उपज नहीं आमदनी-लागत के पैमाने पर मापें
जैविक खेती की सफलता केवल अधिक उपज से नहीं, बल्कि किसान की शुद्ध आय और कम लागत से मापी जानी चाहिए। स्थानीय संसाधनों (जैसे गोबर और फसल अवशेष) के इस्तेमाल से बाहर का खर्च कम होता है, लेकिन शुरुआत में श्रम और जैविक इनपुट पर खर्च बढ़ सकता है। इसलिए किसानों को पूरी जमीन पर एक साथ जैविक खेती शुरू करने के बजाय 'चरणबद्ध तरीके' (Step-by-step) से शुरुआत करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, 5 एकड़ वाले किसान को पहले 1 एकड़ में जैविक खेती करनी चाहिए। उत्पादन, लागत और मुनाफे का रिकॉर्ड रखकर, अनुभव के आधार पर इस रकबे को बढ़ाना चाहिए।
जैविक खेती से अच्छी आमदनी का सूत्र
जैविक खेती से अच्छी कमाई तभी होगी जब किसान सीधे सही बाजार से जुड़ें। किसान उत्पादक संगठन , सहकारी संस्थाएं और किसान समूह मिलकर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग का काम आसानी से कर सकते हैं। भारत में जैविक उत्पादों की प्रामाणिकता के लिए 'PGS-India' और 'National Programme for Organic Production (NPOP)' जैसी प्रमाणन व्यवस्थाएं मौजूद हैं। केवल जैविक तरीके से खेती करने से उत्पाद 'प्रमाणित जैविक' नहीं हो जाता, इसके लिए तय मानकों को पूरा करना और सर्टिफिकेट लेना जरूरी है।
युवाओं की भागीदारी और एक सुरक्षित भविष्य
जैविक और टिकाऊ कृषि को आगे बढ़ाने में युवाओं, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका सबसे अहम है। मिट्टी परीक्षण, कंपोस्ट निर्माण, डिजिटल मार्केटिंग और FPO के जरिए युवा खेती को एक नए व्यवसाय (Startup) का रूप दे सकते हैं। सरकार को भी किसानों तक सही ट्रेनिंग और बाजार की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।