सरकार की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाने और खाद्य तेलों की बढ़ती मांग के चलते इस रबी सीजन में किसान सरसों की खेती का रकबा बढ़ा सकते हैं। साल 2026-27 में सरसों की बुवाई का क्षेत्र बढ़कर 95 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने का अनुमान है। पिछले रबी सीजन 2025-26 में यह 94.2 लाख हेक्टेयर था। बेहतर बीज और हाइब्रिड किस्मों से प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ने की भी उम्मीद है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भरतपुर स्थित भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान के निदेशक विजय वीर सिंह के मुताबिक, अगर प्रति हेक्टेयर उत्पादन पिछले साल के स्तर पर बना रहता है, तो इस सीजन में सरसों का उत्पादन बढ़कर करीब 1.39 करोड़ टन हो सकता है। पिछले साल उत्पादन लगभग 1.377 करोड़ टन था। यह अनुमान 1,460 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता के आधार पर लगाया गया है।
खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता घटाने में मिलेगी मदद
भारत अपनी जरूरत का करीब 60 फीसदी खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण खाद्य तेलों के आयात की लागत और उनकी ढुलाई पर असर पड़ रहा है। ऐसे में देश में सरसों जैसी तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाना महत्वपूर्ण हो गया है।
खाद्य तेल की घरेलू मांग भी लगातार बढ़ रही है। अक्टूबर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत में खाद्य तेल की मांग बढ़कर 2.65 करोड़ टन पहुंचने का अनुमान है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 2.57 करोड़ टन थी। सरसों का रकबा बढ़ने से घरेलू स्तर पर खाद्य तेल की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
MSP में 413 रुपये की बढ़ोतरी
सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6,613 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। 30 सितंबर 2026 को मंजूर इस कीमत में पिछले साल के मुकाबले 413 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, MSP में लगातार बढ़ोतरी और बाजार में समर्थन मूल्य से बेहतर दाम मिलने की संभावना सरसों की खेती को किसानों के लिए आकर्षक बना रही है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति बलदेव राज कंबोज के अनुसार, सरसों कई क्षेत्रों में गेहूं और दूसरी रबी फसलों के अच्छे विकल्प के रूप में उभर रही है। इसकी वजह सरसों से मिलने वाला तुलनात्मक रूप से बेहतर मुनाफा है।
हरियाणा में 6 से 10 फीसदी बढ़ सकता है रकबा
हरियाणा में भी इस बार सरसों की बुवाई बढ़ने की संभावना है। बलदेव राज कंबोज के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में राज्य में करीब 6.49 लाख हेक्टेयर में सरसों की खेती हुई थी। इससे लगभग 14.6 लाख टन उत्पादन मिला और औसत उत्पादकता 2,255 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रही।
उन्होंने अनुमान जताया कि बेहतर बीजों की उपलब्धता और MSP में बढ़ोतरी के कारण आगामी रबी सीजन में हरियाणा में सरसों का रकबा 6 से 10 फीसदी तक बढ़ सकता है। दिल्ली के कारोबारी नमित सिंघला के मुताबिक, अगर मौसम अनुकूल रहा तो देशभर में सरसों की बुवाई पिछले साल से अधिक रह सकती है।
राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और हरियाणा देश के प्रमुख सरसों उत्पादक राज्य हैं। इनके अलावा झारखंड, असम, गुजरात, बिहार, पंजाब, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश में भी सरसों की खेती होती है।
पांच साल में 40 फीसदी से ज्यादा बढ़ा सरसों का रकबा
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में सरसों की खेती का क्षेत्र वर्ष 2020-21 में 67 लाख हेक्टेयर था, जो 2025-26 में बढ़कर 94.2 लाख हेक्टेयर हो गया। इस तरह पांच साल में सरसों का रकबा करीब 40.6 फीसदी बढ़ा है।
हालांकि, कुछ राज्यों में सरसों की खेती का क्षेत्र अब एक स्तर पर पहुंचता दिख रहा है। वहीं, दूसरे क्षेत्रों में इसके विस्तार की संभावना बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल सरसों की बुवाई कितनी बढ़ेगी, इसमें मिट्टी में नमी की उपलब्धता अहम भूमिका निभाएगी। गेहूं की तुलना में सरसों को कम सिंचाई की जरूरत होती है, इसलिए कम पानी वाले क्षेत्रों में यह किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।
धान कटने के बाद खाली खेतों में भी उगाई जा सकती है सरसों
सरसों का रकबा बढ़ाने के लिए धान की कटाई के बाद खाली रह जाने वाले खेतों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। खासकर पूर्वी भारत में कम अवधि में तैयार होने वाली सरसों की किस्में इस दिशा में मददगार हो सकती हैं।
ICAR के सरसों अनुसंधान निदेशालय के विजन-2050 के अनुसार, पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में करीब 1.165 करोड़ हेक्टेयर जमीन धान की कटाई के बाद रबी सीजन में खाली रहती है। यदि इस क्षेत्र के केवल 10 फीसदी हिस्से में सरसों की खेती शुरू की जाए, तो तिलहन उत्पादन में कम से कम 10 लाख टन की बढ़ोतरी हो सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, क्षेत्र के मौसम और मिट्टी के अनुसार उपयुक्त किस्मों का चयन, बेहतर बीज और खेत में पर्याप्त नमी सरसों की खेती बढ़ाने में अहम होंगे। इससे किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
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