देशभर में किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ फलदार पौधों की खेती कर अपनी आमदनी में वृद्धि कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आंवले की वैज्ञानिक तरीके से बागवानी किसानों के लिए लंबे समय तक अतिरिक्त आय प्राप्त करने का एक बेहद आकर्षक और टिकाऊ माध्यम बन सकती है। आयुर्वेद और खाद्य उद्योगों में आंवले की लगातार मांग बनी रहती है, क्योंकि इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों, मुरब्बा, कैंडी, अचार और जूस बनाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है। स्थानीय मंडियों में भी इसकी मांग पूरे साल रहती है।
आंवले के लिए ऐसी जमीन और मिट्टी फायदेमंद
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बागवानी शुरू करने से पहले खेत की मिट्टी की वैज्ञानिक जांच करवाना बेहद जरूरी है। आंवले की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना गया है। खेत में जलभराव की समस्या बिल्कुल नहीं होनी चाहिए, क्योंकि लंबे समय तक पानी जमा रहने से पौधों की वृद्धि पर बुरा असर पड़ता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान अपनी मिट्टी की गुणवत्ता के आधार पर ही जैविक खाद और उर्वरकों का उपयोग करें। इसके अलावा, व्यावसायिक उत्पादन में समय लगने के कारण सिंचाई, लागत और बाजार तक पहुंच की पूरी योजना पहले ही बना लेनी चाहिए।
बाग में तापमान को काबू करेंगे ये पेड़
बाग को तेज गर्म और ठंडी हवाओं से सुरक्षित रखने के लिए खेत की सीमा पर देसी आम, जामुन, बेल, शहतूत, खिरनी, कैथा, शरीफा और इमली जैसे मजबूत पेड़ लगाए जा सकते हैं। हालांकि, मुख्य फलदार पौधों को धूप और पोषक तत्व मिलते रहें, इसके लिए इन पेड़ों की मुख्य बाग से उचित दूरी रखना अनिवार्य है।
सर्दी के मौसम में हर 15 दिन पर सिंचाई
सिंचाई के प्रबंधन पर विशेषज्ञों का कहना है कि रोपाई के शुरुआती दो महीनों तक पौधों की विशेष देखभाल करनी चाहिए। खेत की असल स्थिति को देखते हुए गर्मियों में सात से 10 दिन और सर्दियों में 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है। बारिश के मौसम में खेत में नमी होने पर अतिरिक्त पानी देने से बचने और नियमित रूप से खरपतवार हटाने की सलाह दी गई है।