फसलों की जरूरत के हिसाब से पोषक तत्व देने वाले उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार सरकार से गैर-सब्सिडी वाले उर्वरकों और विशेष फसल पोषण उत्पादों की बिक्री पर लगाई गई पाबंदियों की समीक्षा करने की मांग की है।
संगठन का कहना है कि इन प्रतिबंधों से किसानों को मिट्टी और फसल की जरूरत के अनुसार इस्तेमाल होने वाले स्वीकृत उत्पाद मिलने में परेशानी हो सकती है। इसका असर मौजूदा रबी सीजन में भी पड़ने की आशंका है।
स्वीकृत उत्पादों की बिक्री पर रोक का विरोध
FAI के मुताबिक, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों ने सब्सिडी वाले उर्वरक बेचने वाली कंपनियों के गैर-सब्सिडी वाले उर्वरकों और विशेष पोषण उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए हैं। हाल ही में बिहार में भी ऐसे कदम उठाए गए हैं। संगठन का कहना है कि इनमें से कई उत्पाद उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO), 1985 के नियामकीय ढांचे के तहत आते हैं।
FAI ने गुरुवार को जारी बयान में कहा कि किसानों को गलत बिक्री से बचाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही उन्हें वैध और स्वीकृत कृषि उत्पादों तक पहुंच भी मिलनी चाहिए। संगठन ने इस मामले में संतुलित और विज्ञान आधारित नीति अपनाने की अपील की है।
क्या होते हैं विशेष फसल पोषण उत्पाद?
पारंपरिक उर्वरकों के अलावा खेती में अब कई तरह के पोषण उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ा है। इनमें सूक्ष्म पोषक तत्व, पानी में घुलनशील उर्वरक, लाभकारी तत्वों वाले उर्वरक, तरल और जैविक आधारित उत्पाद, जैव उर्वरक, बायोस्टिमुलेंट और नैनो उर्वरक शामिल हैं।
FAI के अनुसार, ये उत्पाद यूरिया, डीएपी और एमओपी जैसे पारंपरिक उर्वरकों के पूरक हैं। इनका इस्तेमाल फसलों में पोषक तत्वों की कमी दूर करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और पानी व उर्वरकों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकता है। इससे फसल की पैदावार और उपज की गुणवत्ता बेहतर बनाने में भी मदद मिल सकती है।
किसानों की पसंद और नई तकनीकों पर पड़ सकता है असर
FAI ने कहा कि उर्वरक उद्योग ने बेहतर उत्पाद विकसित करने के लिए शोध, तकनीकी सेवाओं, खेतों में प्रदर्शन और किसानों को जानकारी देने पर निवेश किया है। उत्पादों की बिक्री पर व्यापक प्रतिबंध लगने से नई तकनीकों के विकास और उनके इस्तेमाल की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
संगठन के मुताबिक, स्थापित कंपनियों के उत्पादों की उपलब्धता कम होने पर किसान बाजार में मौजूद दूसरे उत्पादों पर निर्भर हो सकते हैं। इससे उत्पाद की गुणवत्ता, मिट्टी की सेहत और फसल की पैदावार पर असर पड़ने की आशंका है। अधिक मूल्य वाली और निर्यात के लिए उगाई जाने वाली फसलों में सही पोषण और उपज की एकसमान गुणवत्ता खास महत्व रखती है।
FAI के महानिदेशक सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि खेती की उत्पादकता को टिकाऊ तरीके से बढ़ाने के लिए किसानों को स्वीकृत और आधुनिक पोषण उत्पादों तक पहुंच मिलनी चाहिए। उनके मुताबिक, FCO इन उत्पादों के लिए राष्ट्रीय नियामकीय ढांचा उपलब्ध कराता है, लेकिन राज्यों के अलग-अलग प्रतिबंधों से कुछ बाजारों में स्वीकृत उत्पाद भी किसानों की पहुंच से बाहर हो सकते हैं।
खाद की जबरन टैगिंग पर सख्त कार्रवाई का समर्थन
FAI ने यह भी माना कि राज्यों की पाबंदियों के पीछे खाद की जबरन टैगिंग को लेकर चिंता है। टैगिंग का मतलब है कि किसान को सब्सिडी वाला उर्वरक खरीदने के साथ किसी दूसरे उत्पाद को भी खरीदने के लिए मजबूर किया जाए।
संगठन ने स्पष्ट किया कि वह ऐसी जबरन बिक्री के खिलाफ है और इस तरह की गतिविधियों में शामिल कंपनियों, वितरकों या खुदरा विक्रेताओं पर सख्त कार्रवाई का समर्थन करता है। हालांकि, उसका कहना है कि कार्रवाई का लक्ष्य गलत बिक्री की प्रथा को खत्म करना होना चाहिए, न कि वैध उत्पादों की बिक्री और किसानों की स्वेच्छा से खरीद पर रोक लगाना। FAI ने राज्यों से ऐसी नीति अपनाने की अपील की है, जिससे जबरन बिक्री पर रोक लगे और किसानों को उनकी फसल व मिट्टी की जरूरत के मुताबिक स्वीकृत पोषण उत्पाद मिलते रहें।
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