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नहीं रहे ‘धान के पिता’ रमन : 50 से ज्यादा बचाई देसी किस्में, बोरियो में सहेजकर रखी 500 साल पुरानी विरासत

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 15 Oct 2026 07:07 PM IST
सार

  • केरल के वायनाड के चेरुवयल रमन को लोग प्यार से ‘धान का पिता’ कहते थे।

  • उन्होंने धान की 50 से ज्यादा देसी किस्मों को सहेजकर रखा था।

  • करीब 40 किस्में उन्हें पूर्वजों से मिली थीं, जबकि बाकी उन्होंने दूसरे इलाकों से जुटाईं।

  • रमन पांचवीं कक्षा तक पढ़े थे, लेकिन धान की पारंपरिक किस्मों का गहरा ज्ञान रखते थे।

नहीं रहे ‘धान का पिता’ चेरुवयल रमन
नहीं रहे ‘धान का पिता’ चेरुवयल रमन - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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धान की हर किस्म में उनके लिए एक कहानी थी, हर बीज में पूर्वजों की विरासत। उन्होंने न खेती की बड़ी डिग्री ली, न किसी प्रयोगशाला में काम किया। उनका खेत ही उनकी प्रयोगशाला था और देसी धान की किस्मों को बचाना जीवन का मकसद। केरल के वायनाड के चेरुवयल रमन, जिन्हें लोग प्यार से ‘धान का पिता’ कहते थे, अब हमारे बीच नहीं रहे।

बुधवार (14 अक्टूबर, 2026) को 74 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। वे उम्र संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए कोझिकोड मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती थे। उन्होंने 50 से ज्यादा देसी धान की किस्मों को सहेजकर ऐसी विरासत छोड़ी है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अहम है।

बीजों में बसती थी रमन की दुनिया
वायनाड के कम्मना गांव में मिट्टी और बांस से बना करीब 150 साल पुराना घर चेरुवयल रमन की पहचान था। घर के कमरों में धान के बीजों से भरी बोरियां रखी रहती थीं। हर बोरी में एक अलग किस्म की पहचान और इतिहास छिपा था। रमन कुरिचिया आदिवासी समुदाय से थे। वे पांचवीं कक्षा तक ही पढ़े थे, लेकिन धान की देसी किस्मों का उनका ज्ञान बेमिसाल था। लोग उन्हें ‘रमेट्टन’ और ‘नेल्लाचन’ यानी ‘धान का पिता’ कहकर बुलाते थे।

खेत ही थी उनकी प्रयोगशाला
रमन ने खेती और पौधों के बारे में किताबी ज्ञान के बजाय अपने अनुभव से सीखा। चार दशक से ज्यादा समय तक वे धान की अलग-अलग किस्मों को उगाने, समझने और बचाने में जुटे रहे। कहा जाता है कि 1969 में उन्होंने सरकारी नौकरी का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया था, क्योंकि उनका मन खेती में ही लगता था।

उनके पास 50 से ज्यादा देसी धान की किस्में थीं। इनमें से करीब 40 किस्में उन्हें अपने पूर्वजों से मिली थीं, जबकि बाकी उन्होंने दूसरे इलाकों से जुटाईं। इनमें कुछ किस्मों को 500 साल से भी पुराना बताया जाता है। वे हर किस्म को अलग पहचान के साथ बचाकर रखना चाहते थे। इसके लिए खेत को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा गया था, ताकि अलग-अलग किस्में उगाई जा सकें और उनकी पहचान बनी रहे।

रसायनों से दूरी बनाई, खेत में लौटे जीव
रमन ने 1978 में रासायनिक खेती छोड़ दी थी। इसकी वजह उन्होंने खेत में होने वाले बदलावों को बताया। उनके मुताबिक, रासायनिक खेती के कारण खेत से मछलियां, केंचुए, मेंढक और कई तरह के कीट गायब होने लगे थे। जैविक खेती अपनाने के बाद ये जीव फिर दिखाई देने लगे। रमन आधुनिक विज्ञान या वैज्ञानिक खेती के विरोधी नहीं थे। उनका मानना था कि खेती में फैसले सोच-समझकर लेने चाहिए और मिट्टी व प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

देसी बीजों के साथ सहेजी पूर्वजों की विरासत
चेरुवयल रमन का काम सिर्फ धान उगाने तक सीमित नहीं था। वे देसी बीजों को बचाकर खेती की विविधता और पारंपरिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटे रहे। उनके लिए हर बीज केवल फसल का साधन नहीं, बल्कि पुरानी पीढ़ियों से मिली धरोहर था।

आज जब खेती में बेहतर उत्पादन, बदलते मौसम और मिट्टी की सेहत को लेकर नई चुनौतियां सामने हैं, तब रमन की यह विरासत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अगली बार जब आपकी थाली में चावल आए, तो उस किसान को भी याद कीजिएगा, जिसने अपनी जिंदगी देसी धान की किस्मों को बचाने में लगा दी।
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