इस रबी तापमान में असामान्य बढ़ोतरी प्रमुख रबी फसलों के विकास और उपज का गणित बिगाड़ सकती है। अमर उजाला कि रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब के मोहाली स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईसर) के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के विशेषज्ञ डॉ. राजू अट्टादा का कहना है कि 2026 के दिसंबर महीने से 2027 के फरवरी महीने के दौरान उत्तर भारत के मौदानी इलाकों खासतौर से पंजाब-हरियाणा और चंडीगढ़ में दिन और रात का तापमान सामान्य से एक से दो डिग्री ज्यादा रह सकता है। बीते खरीफ सीजन के दौरान कम बारिश से किसान आय में दबाव का खतरा बना हुआ है। अब रबी सीजन में भी अल नीनो ने चिंता बढ़ाने का काम किया है।
रबी के लिए बारिश और तापमान जरूरी, अल नीनो सामने
गेहूं, सरसों और दलहन जैसी प्रमुख रबी फसलों को बेहतर विकास के लिए ठंडक और समय पर हल्की बारिश की जरूरत होती है। लेकिन, अल नीनो बारिश और ठंडक दोनों मोर्चों पर चुनौती खड़ी कर सकती है।
ठंड के दिन कम हो सकते हैं, समय से पहले गर्मी की दस्तक
डॉ. अट्टादा के मुताबिक, सामान्य से अधिक पारा रहने के कारण इस बार कड़ाके की ठंड वाले दिन कम हो सकते हैं और रात के तापमान में भी बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। हालांकि तापमान में बढ़ोतरी का मतलब शीतलहर की बेरुखी से बिल्कुल नहीं है, क्योंकि असल मौसम पश्चिमी विक्षोभ जैसे कारकों पर भी निर्भर करेगा। इसके अलावा, फरवरी-मार्च के महीनों में समय से पहले गर्मी बढ़ने और आगे चलकर गर्मियों के मौसम में लू का खतरा भी गहरा सकता है।
खेती के लिए अनुकूल ठंड और जलाशयों में पानी की कमी
तापमान में यह फेरबदल किसानों के लिए दोहरी चुनौती खड़ी कर सकता है। रबी की फसलों को बढ़ने के लिए जिस ठंड की जरूरत होती है, उसमें कमी होने से फसल पर खराब प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही सिंचाई जल के स्तर में भी कमी देखी गई है। केंद्रीय जल आयोग के सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी उनकी कुल क्षमता का करीब 70 प्रतिशत ही था, जो पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी कम है। पानी की यह कमी और बढ़ता तापमान मिलकर फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल असर डाल सकते हैं।
भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी जब सामान्य से ज्यादा हो जाए, तो उसे अल नीनो के जन्म से जोड़ा जाता है। इसका जन्म भारत के मानसून और तापमान चक्र पर पड़ता हैं। हालांकि किसी भी इलाके में ठंड या बारिश केवल अल नीनो तय नहीं करता, ब्ल्कि दूसरी मौसम परिस्थितियां भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।