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Drought Wreaks Havoc In Maharashtra Andhra Pradesh Karnataka Kharif Crops Destroyed Money Crunch For Rabi Sowi
महाराष्ट्र, आंध्र और कर्नाटक में सूखे का कहर : खरीफ की फसल बर्बाद... रबी की बुवाई के लिए पैसों का संकट
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sat, 24 Oct 2026 03:58 PM IST
सार
महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में सूखे से किसान परेशान हैं। खरीफ फसल में नुकसान, राहत भुगतान में देरी और जल संकट के बीच रबी की बुवाई के लिए पैसे जुटाना चुनौती बना।
महाराष्ट्र, आंध्र और कर्नाटक में सूखे का कहर
- फोटो : गांव जंक्शन
देश के कई सूखाग्रस्त राज्यों में किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। मानसून की फसल खराब होने से किसानों को भारी नुकसान हुआ है। अब उनके सामने रबी की फसल की बुवाई के लिए पैसे और पानी जुटाने की चुनौती है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारों ने आर्थिक सहायता और रोजगार देने की घोषणाएं की हैं, लेकिन कुछ राहत राशि का भुगतान अब भी लंबित बताया जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि कुछ किसान परिवार खर्च चलाने के लिए मवेशी बेच रहे हैं, जबकि कई लोग काम की तलाश में गांवों से पलायन कर रहे हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 23 अक्टूबर के बुलेटिन में उत्तर आंतरिक कर्नाटक के किसानों को पर्याप्त नमी होने पर ही बुवाई करने की सलाह दी है। विभाग ने कम अवधि में तैयार होने वाली और सूखा सहन करने वाली फसलों को प्राथमिकता देने का सुझाव भी दिया है।
महाराष्ट्र: फसल में नुकसान, मवेशी बेचने की नौबत
- फोटो : गांव जंक्शन
महाराष्ट्र: फसल में नुकसान, मवेशी बेचने की नौबत
महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में सूखे का असर किसानों की आमदनी और घरेलू खर्च पर दिखाई दे रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यवतमाल के किसान चितामन विट्ठल भोयर ने बताया कि खेती पर करीब 2.75 लाख रुपये खर्च हुए, जबकि फसल से लगभग 90 हजार रुपये की कमाई होने की उम्मीद है।
उन्होंने बताया कि सामान्य वर्ष में जहां सोयाबीन की पैदावार करीब 25 क्विंटल होती थी, वहीं इस बार पांच क्विंटल उत्पादन की उम्मीद है। चारे की कमी के कारण उन्हें 70 हजार रुपये में खरीदे गए बैलों को करीब 40 हजार रुपये में बेचना पड़ा। मवेशी बेचना तत्काल खर्च पूरा करने का जरिया बन सकता है, लेकिन इससे किसान परिवार अपनी खेती के लिए जरूरी संपत्ति भी खो देते हैं।
महाराष्ट्र के बीड जिले में कपास किसान मंगेश करपे ने डाउन टू अर्थ को बताया कि उन्होंने 10 एकड़ में खेती पर करीब 2.5 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन अब फसल मिलने की उम्मीद नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, गांव के उपसरपंच ने अनुमान जताया कि अंबेसावली के करीब आधे लोग काम की तलाश में पलायन कर चुके हैं। फसल खराब होने का असर सिर्फ किसानों की कमाई तक सीमित नहीं है। खेतों में मजदूरी के अवसर घटते हैं, कर्ज चुकाना मुश्किल होता है और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना भी चुनौती बन जाता है।
कर्नाटक: राहत के साथ अगली फसल की चिंता
- फोटो : गांव जंक्शन
कर्नाटक: राहत के साथ अगली फसल की चिंता
कर्नाटक में शुरुआती आकलन के मुताबिक, 101 तालुकों में करीब 18 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। यह शुरुआती अनुमान था, राज्य में कुल नुकसान का अंतिम आकलन नहीं। राज्य सरकार ने प्रभावित किसानों के लिए 2,500 रुपये की इनपुट सब्सिडी देने की घोषणा की थी। पहले चरण के लिए 1,250 करोड़ रुपये का प्रस्ताव रखा गया। इसके अलावा, राज्य सरकार ने केंद्र से तत्काल राहत के लिए 3,705.30 करोड़ रुपये की सहायता मांगी थी। इसमें फसल नुकसान, पेयजल और पशुधन की सुरक्षा से जुड़ी मदद शामिल थी।
हालांकि, मौसम की चुनौती अभी बनी हुई है। IMD के 23 अक्टूबर के बुलेटिन के अनुसार, उत्तर आंतरिक कर्नाटक में 25 से 27 अक्टूबर तक मौसम शुष्क रहने का अनुमान था। ऐसे में किसानों को मिट्टी में पर्याप्त नमी बचाने और मूंगफली तथा बागवानी फसलों में जरूरत के अनुसार सिंचाई करने की सलाह दी गई है।
आंध्र प्रदेश: 388 मंडलों में सूखे का असर
- फोटो : सोशल मीडिया
आंध्र प्रदेश: 388 मंडलों में सूखे का असर
आंध्र प्रदेश सरकार ने एक अक्टूबर को 21 जिलों के 388 मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था। इनमें 283 मंडलों को गंभीर रूप से प्रभावित बताया गया। सरकारी आदेश के अनुसार, जून से अगस्त के बीच राज्य में सामान्य से 53.4 फीसदी कम बारिश हुई।
रायलसीमा क्षेत्र में सूखे का असर आम फसल के साथ बागवानी पर भी पड़ रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में विपक्षी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के नेताओं के हवाले से बताया गया कि आम और नींबू जैसे फलों के बाग सूख रहे हैं। कुछ किसान पेड़ों को बचाने के लिए टैंकर से पानी मंगाने पर मजबूर हैं।
बागवानी किसानों के लिए यह स्थिति खास तौर पर चुनौतीपूर्ण है। पेड़ों को जीवित रखने के लिए पानी और पैसा खर्च करना पड़ता है, जबकि फसल से होने वाली कमाई अनिश्चित रहती है। लंबे समय तक पानी की कमी रहने पर केवल एक सीजन की उपज नहीं, बल्कि फलदार पेड़ों को भी नुकसान हो सकता है।
इस बीच, राज्य के कृषि विभाग के रबी बीज डैशबोर्ड के अनुसार, 15 अक्टूबर तक 45,259 किसानों को बीज वितरित किए गए थे। इस नियमित शीतकालीन फसल कार्यक्रम के तहत 19.63 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई।
महाराष्ट्र में राहत का एलान, लेकिन भुगतान पर सवाल
- फोटो : सोशल मीडिया
महाराष्ट्र में राहत का एलान, लेकिन भुगतान पर सवाल
महाराष्ट्र सरकार ने सूखाग्रस्त घोषित तहसीलों की संख्या बढ़ाकर 358 में से 305 कर दी है। सरकार ने दिवाली से पहले किसानों को 5,000 रुपये देने की घोषणा भी की थी। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सहायता पर 6,000 से 7,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था। हालांकि, पात्र किसानों और लाभार्थियों की अंतिम संख्या तय नहीं हुई थी।
यह राशि केंद्र से मिलने वाली संभावित सहायता के बदले अग्रिम मदद के तौर पर घोषित की गई थी। लेकिन 19 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, इसके लिए दिशानिर्देश अभी लंबित थे। इसके अलावा, नमो शेतकरी आय सहायता योजना की दो किस्तें भी लंबित बताई गईं। इनकी कुल राशि पात्र किसानों के लिए 4,000 रुपये थी।
ग्रामीण रोजगार भी संकट से निपटने का एक जरिया है। महाराष्ट्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार और आजीविका के लिए 6,728 करोड़ रुपये निर्धारित किए। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार गारंटी के तहत काम मांगने वाले परिवारों की संख्या जुलाई में 4.02 लाख से बढ़कर सितंबर में 4.93 लाख हो गई। हालांकि, बजट में राशि निर्धारित होने से यह साबित नहीं होता कि कितने परिवारों को वास्तव में काम मिला या मजदूरी का भुगतान हुआ है।
सूखे से प्रभावित इलाकों में शिक्षा पर भी असर पड़ा है। महाराष्ट्र के 26 विश्वविद्यालयों में 2,40,365 विद्यार्थियों ने सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए परीक्षा शुल्क माफी का लाभ लिया। मुंबई विश्वविद्यालय ने भी विद्यार्थियों को शुल्क लौटाना शुरू किया था।
रबी फसलों की बुवाई
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रबी की बुवाई के लिए पैसे और पानी जरूरी
किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खरीफ की फसल में हुए नुकसान के बाद अगली फसल की तैयारी करना है। फसल से कमाई नहीं होने पर बीज, खाद, डीजल और सिंचाई के लिए पैसा जुटाना मुश्किल हो जाता है। वहीं, पानी की कमी बुवाई और फसल की शुरुआती बढ़त को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे में नकद सहायता किसानों को तत्काल खर्च पूरा करने में मदद दे सकती है। ग्रामीण रोजगार योजनाओं से उन परिवारों को आमदनी मिल सकती है, जिनके लिए खेतों में मजदूरी के अवसर घट गए हैं।लेकिन राहत की असली परीक्षा इस बात से होगी कि पैसा किसानों के खातों में कितनी जल्दी पहुंचता है, रोजगार मांगने वाले परिवारों को समय पर काम और मजदूरी मिलती है या नहीं, और अगली फसल के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो पाता है या नहीं।
जलाशय
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जलाशयों में पानी बढ़ा, फिर भी सामान्य स्तर से कम
केंद्रीय जल आयोग (CWC) के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 178 निगरानी वाले जलाशयों में पानी का भंडार 3 सितंबर को 129.870 अरब घन मीटर (BCM) से बढ़कर 8 अक्टूबर को 130.980 BCM हो गया। इसके बावजूद, पिछले दस वर्षों के इसी समय के औसत की तुलना में पानी की कमी 3.25 फीसदी से बढ़कर 12.92 फीसदी हो गई।
इसका मतलब है कि जलाशयों में पानी की मात्रा थोड़ी बढ़ी, लेकिन भंडारण में सामान्य वर्षों जैसी बढ़ोतरी नहीं हुई। एक से आठ अक्टूबर के बीच जलाशयों में पानी का स्तर 1.754 BCM घटा भी था। आठ अक्टूबर को जलाशय अपनी कुल क्षमता के 70.89 फीसदी तक भरे थे, जबकि पिछले दस वर्षों का इसी समय का औसत 81.41 फीसदी था। एक साल पहले इसी अवधि में जलाशय 90.06 फीसदी भरे हुए थे।
दक्षिण भारत में स्थिति और चिंताजनक रही। वहां पांच सप्ताह में जलाशयों में पानी का भंडार 31.718 BCM से घटकर 26.384 BCM रह गया। यह पिछले दस वर्षों के औसत से 38.59 फीसदी कम था। इसके विपरीत, पूर्वी और मध्य भारत के जलाशयों में पानी का भंडार संबंधित औसत से अधिक बना हुआ था। जलाशयों में पानी की कमी और किसानों की घटती आमदनी मिलकर रबी की खेती को मुश्किल बना सकती है। ऐसे में समय पर राहत, ग्रामीण रोजगार और उपलब्ध पानी का बेहतर प्रबंधन किसानों के लिए बेहद अहम होगा।
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