पश्चिम एशिया में जारी संकट ने पंजाब के बासमती चावल निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले साल का चावल ही पूरी तरह विदेश नहीं भेजा जा सका है और अब नई फसल भी मंडियों में पहुंचने लगी है। करीब 15 लाख मीट्रिक टन नया बासमती निर्यात के लिए तैयार है, लेकिन समुद्री रास्ते में रुकावट और भाड़ा बढ़ने से कारोबार प्रभावित हो रहा है। निर्यातकों के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद होने से समुद्री भाड़ा 500 डॉलर से बढ़कर 3,000 डॉलर तक पहुंच गया है। इससे निर्यात में देरी हो रही है और फरवरी से अब तक करीब 60 करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित हुआ है।
पुराना स्टॉक पड़ा, अब नई फसल की चिंता
पंजाब में हर साल करीब 30 लाख मीट्रिक टन बासमती का उत्पादन होता है। इसमें से लगभग 15 लाख मीट्रिक टन चावल निर्यात के लिए तैयार होता है। राज्य में तैयार होने वाले बासमती का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा विदेशों में भेजा जाता है।
फिलहाल पंजाब की मिलों में पिछले साल का करीब दो लाख टन बासमती चावल पड़ा है। इसके अलावा करीब एक लाख टन चावल का निर्यात अटका हुआ है। इस तरह कुल तीन लाख टन चावल का निर्यात प्रभावित है। अब नई फसल आने से मिलों और निर्यातकों के सामने पुराने स्टॉक को निकालने और नए चावल को रखने की जगह बनाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
समुद्री भाड़ा छह गुना बढ़ा
पंजाब बासमती मिलर्स एंड एक्सपोर्ट एसोसिएशन के वित्त सचिव नरेश गोयल ने अमर उजाला को बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद होने से समुद्री भाड़ा 500 डॉलर से बढ़कर 3,000 डॉलर तक पहुंच गया है। इससे निर्यात की लागत काफी बढ़ गई है।
उन्होंने बताया कि पहले जिस खेप को विदेश पहुंचने में करीब सात दिन लगते थे, अब उसमें एक महीने तक का समय लग रहा है। निर्यात में देरी के कारण भुगतान भी समय पर नहीं मिल रहा है। गोयल के मुताबिक, फरवरी से अब तक करीब 60 करोड़ रुपये का निर्यात प्रभावित हुआ है। कुछ समय तक निर्यात पूरी तरह बंद भी रहा था। यदि मार्ग जल्द नहीं खुला, तो कारोबारियों की परेशानी और बढ़ सकती है।
मध्य पूर्व के देशों में बड़ी मांग
पंजाब से बासमती चावल का बड़ा हिस्सा ईरान और मध्य पूर्व के अन्य देशों में भेजा जाता है। इराक, संयुक्त अरब अमीरात और यमन भी इसके प्रमुख बाजारों में शामिल हैं। इसके अलावा यूरोपीय संघ, तुर्किये और ब्रिटेन में भी पंजाब के बासमती की मांग है।
होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग में रुकावट से खासकर मध्य पूर्व के बाजारों तक चावल पहुंचाना मुश्किल हो रहा है। इससे निर्यातकों को वैकल्पिक रास्तों, बढ़ती लागत और माल पहुंचने में देरी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
देश के बासमती निर्यात में पंजाब की 40 प्रतिशत हिस्सेदारी
एसोसिएशन के प्रधान बाल कृष्ण बाली ने बताया कि बासमती का निर्यात जारी है, लेकिन पहले के मुकाबले इसमें अधिक समय लग रहा है। इससे कारोबारियों की लागत बढ़ रही है और भुगतान में भी देरी हो रही है। उन्होंने बताया कि पंजाब के अलावा पड़ोसी राज्यों से भी करीब सात लाख टन बासमती आता है। इस तरह कुल करीब 22 लाख टन बासमती के निर्यात की चुनौती है। बाली के मुताबिक, भारत से हर साल करीब 48 हजार करोड़ रुपये का बासमती चावल निर्यात होता है, जिसमें पंजाब की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है।
निर्यातकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में हालात सामान्य होने और समुद्री मार्ग से माल की आवाजाही सुचारु होने पर ही कारोबार को राहत मिल सकती है। तब तक पुराने स्टॉक को निकालना और नई फसल का निर्यात करना बड़ी चुनौती बना रहेगा।
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