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उत्तर प्रदेश : जिस खोई को समझते हैं बेकार, उससे बना रहे क्रॉकरी... विदेशों तक पहुंची शामली के उद्यमी की पहचान

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Fri, 16 Oct 2026 01:53 PM IST
सार

  • शामली के अर्चित गर्ग गन्ने की खोई से प्लेट, कटोरी, दोने, थाली और ट्रे बना रहे हैं।
  • उत्पादों की आपूर्ति देश के कई राज्यों के अलावा जर्मनी और इंग्लैंड में भी की जा रही है।
  • प्लांट में हर महीने 100 टन से अधिक क्रॉकरी तैयार की जा रही है।
  • इस कारोबार से 150 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है।

गन्ने की खोई से बन रहीं थाली-कटोरी
गन्ने की खोई से बन रहीं थाली-कटोरी - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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गन्ने से चीनी निकालने के बाद बचने वाली खोई को अक्सर बेकार समझा जाता है, लेकिन शामली के उद्यमी अर्चित गर्ग इसी खोई से प्लेट, कटोरी, दोने और खाना परोसने वाली ट्रे बना रहे हैं। उनके प्लांट में हर महीने 100 टन से अधिक क्रॉकरी तैयार हो रही है। खास बात यह है कि इन उत्पादों की मांग देश के कई राज्यों के साथ अब जर्मनी और इंग्लैंड में भी होने लगी है। इस कारोबार से 150 से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। अर्चित की यह पहल खेती से निकलने वाले अवशेष का उपयोग करने के साथ प्लास्टिक के विकल्प को भी बढ़ावा दे रही है।

खोई से तैयार हो रही खाने-पीने की क्रॉकरी
शहर के गगन विहार निवासी अर्चित गर्ग ने औद्योगिक क्षेत्र में क्रॉकरी बनाने का प्लांट लगाया है। यहां गन्ने की खोई से तैयार लुगदी का इस्तेमाल कर खाने-पीने में काम आने वाले उत्पाद बनाए जाते हैं। इनमें प्लेट, कटोरी, दोने, खानों वाली थाली और खाना रखने की ट्रे शामिल हैं।

अर्चित के मुताबिक, प्लांट में हर महीने 100 टन से अधिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनकी आपूर्ति हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में की जा रही है। पिछले महीने से विदेशों में भी उत्पादों की मांग शुरू हुई है। अब तक दो खेप जर्मनी और इंग्लैंड भेजी जा चुकी हैं। कारोबार को और बढ़ाने की तैयारी भी चल रही है।

प्लास्टिक से थोड़ी महंगी, लेकिन पर्यावरण के लिए बेहतर
अर्चित और उनके पिता विपुल मित्तल के मुताबिक, गन्ने की खोई से बनी क्रॉकरी प्लास्टिक के उत्पादों के मुकाबले कुछ महंगी है। उदाहरण के लिए, तीन रुपये में मिलने वाली प्लास्टिक की प्लेट के मुकाबले समान आकार की खोई से बनी प्लेट की कीमत करीब साढ़े चार रुपये पड़ती है। हालांकि, मांग और जरूरत के अनुसार एक रुपये से शुरू होने वाली प्लेट भी तैयार की गई है।

प्लास्टिक के उत्पाद लंबे समय तक नष्ट नहीं होते। इन्हें खुले में फेंकने या जलाने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। इसके मुकाबले गन्ने की खोई से बनी क्रॉकरी उचित परिस्थितियों में 10 से 15 दिन में प्राकृतिक रूप से नष्ट हो सकती है। इससे प्लास्टिक कचरे को कम करने में मदद मिल सकती है।

ऐसे तैयार होती है खोई से क्रॉकरी
अर्चित ने बताया कि सबसे पहले गन्ने की खोई से लुगदी तैयार की जाती है। इसके बाद इसे पानी में मिलाकर मिश्रण बनाया जाता है। फिर मशीनों में लगे अलग-अलग आकार के सांचों की मदद से प्लेट, कटोरी, थाली और ट्रे जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ग्राहकों की मांग के अनुसार सांचों का आकार बदला जा सकता है।

150 से अधिक लोगों को मिला रोजगार
इस प्लांट में क्रॉकरी के उत्पादन से 150 से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। कारोबार बढ़ने और विदेशों से मांग आने के बाद रोजगार के अवसर और बढ़ने की संभावना है। उद्योग केंद्र की उपायुक्त रतिका गुप्ता ने अर्चित की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद बनाने का यह प्रयास दूसरे उद्यमियों के लिए भी प्रेरणादायक है। इस तरह की पहल से रोजगार बढ़ाने और प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
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