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भारत का गेहूं फिर बना बांग्लादेश की पसंद : 2 लाख टन से ज्यादा की खरीद, निर्यात बढ़ने की उम्मीद

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 24 Sep 2026 12:44 PM IST
सार

  • बांग्लादेश के आयातकों ने भारत से 2 लाख टन से ज्यादा गेहूं खरीदा।
  • 2022 के बाद भारत से बांग्लादेश की यह पहली बड़ी गेहूं खरीद है।
  • भारत से गेहूं की डिलीवरी मुख्य रूप से रेल के जरिए होने की उम्मीद है।
  • भारतीय गेहूं की कीमत करीब 305 से 326 डॉलर प्रति टन बताई गई है।

गेहूं की फसल
गेहूं की फसल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में गेहूं की पर्याप्त उपलब्धता और वैश्विक बाजार में बढ़ती कीमतों के बीच बांग्लादेश ने एक बार फिर भारत से गेहूं खरीद शुरू कर दी है। अगस्त के आखिर में भारत से गेहूं निर्यात पर लगी पाबंदी हटने के बाद बांग्लादेश के आयातकों ने 2 लाख टन से ज्यादा गेहूं खरीद के सौदे किए हैं। 2022 के बाद यह भारत से बांग्लादेश की पहली बड़ी गेहूं खरीद बताई जा रही है।

ब्लैक सी क्षेत्र में संकट से बढ़ी गेहूं की मांग
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ब्लैक सी क्षेत्र से गेहूं की आपूर्ति प्रभावित हुई है। बंदरगाहों और टर्मिनलों पर लगातार हमलों के चलते इस क्षेत्र से अनाज की आवाजाही पर असर पड़ा है। इससे एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों को गेहूं के लिए दूसरे स्रोतों की तलाश करनी पड़ रही है।

बांग्लादेश के लिए यह स्थिति ज्यादा अहम है। देश को हर साल 70 लाख टन से ज्यादा गेहूं आयात करना पड़ता है। मई 2022 में भारत से निर्यात पर रोक लगने से पहले बांग्लादेश की गेहूं खरीद में भारत की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी थी। भारत से दूरी कम होने के कारण परिवहन लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती है। इसके बाद बांग्लादेश ने अर्जेंटीना, कनाडा, रूस और यूक्रेन से गेहूं खरीद बढ़ाई। फिलहाल उसके करीब 40 फीसदी गेहूं आयात ब्लैक सी क्षेत्र से आते हैं।

मेघना ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के वरिष्ठ अधिकारी तस्लीम शाहारियार के मुताबिक, रूस-यूक्रेन संकट जारी रहने तक गेहूं की आपूर्ति महत्वपूर्ण बनी रहेगी। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश के खरीदार अब ऑस्ट्रेलियाई गेहूं के लिए 450 डॉलर प्रति टन से ज्यादा कीमत चुका रहे हैं, जबकि पहले इसकी कीमत 380 डॉलर प्रति टन से कम थी।

भारत का गेहूं पड़ोसी देशों के लिए सस्ता विकल्प
जानकारी के मुताबिक, बांग्लादेश को भारत से भेजे जाने वाले ज्यादातर गेहूं की ढुलाई रेल के जरिए होगी। डिलीवरी समेत इसकी कीमत करीब 305 से 326 डॉलर प्रति टन रहने की बात कही गई है। भारत से श्रीलंका ने भी हाल में करीब 60 हजार टन गेहूं खरीदा है। इसकी कीमत शिपिंग से पहले करीब 325 डॉलर प्रति टन रही। एग्रोकार्प इंटरनेशनल के निदेशक अभिनव विजय के मुताबिक, पड़ोसी देशों में भारतीय गेहूं के लिए बाजार बनने की संभावना है।

भारत का गेहूं निर्यात बढ़ने का अनुमान
अमेरिकी कृषि विभाग की फॉरेन एग्रीकल्चरल सर्विस (FAS) के अनुसार, 2026-27 सीजन में भारत का गेहूं निर्यात बढ़कर करीब 20 लाख टन हो सकता है। यह पिछले अनुमान की तुलना में चार गुना से ज्यादा है। भारत में गेहूं की पर्याप्त उपलब्धता, निर्यात प्रतिबंधों में ढील और ब्लैक सी क्षेत्र से आपूर्ति में बाधा के कारण भारतीय गेहूं अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो गया है। करीब पांच साल बाद भारत के लिए पड़ोसी देशों को गेहूं निर्यात का अवसर मजबूत हुआ है।

बांग्लादेश में बढ़ी आटे की कीमत
भारत से गेहूं की बढ़ती खरीद का एक कारण बांग्लादेश में गेहूं और आटे की कीमतों में बढ़ोतरी भी है। बांग्लादेश की सरकारी ट्रेडिंग कॉरपोरेशन के अनुसार, पिछले एक महीने में ढाका में रिफाइंड गेहूं के आटे की कीमत करीब 17 फीसदी बढ़ी है। बांग्लादेश में गेहूं दूसरा सबसे ज्यादा खाया जाने वाला अनाज है। इसलिए इसकी कीमत बढ़ने से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, देश के सामने फिलहाल गेहूं की उपलब्धता से ज्यादा बड़ी चुनौती इसे किफायती कीमत पर उपलब्ध कराना है। एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के व्लादिमीर जिंकोव्स्की के अनुसार, गेहूं की ऊंची कीमतों से बांग्लादेश में चावल की खपत बढ़ सकती है। उनके मुताबिक भारत क्षेत्रीय बाजार में गेहूं की आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त स्रोत बन सकता है।

वैश्विक कीमत बढ़ने से भारतीय गेहूं को फायदा
पिछले महीने शिकागो गेहूं वायदा की कीमत तीन साल से ज्यादा समय के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि बाद में इसमें कुछ गिरावट आई। वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने से भारतीय गेहूं, जो पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा पड़ता था, अब पड़ोसी देशों के खरीदारों के लिए ज्यादा आकर्षक हो गया है।

FAS के अनुसार, बांग्लादेश और नेपाल को भारतीय गेहूं का निर्यात पहले ही बढ़ा है। आने वाले समय में संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया को भी भारत से गेहूं की अधिक आपूर्ति हो सकती है। पड़ोसी आयात-निर्भर देशों के लिए गेहूं की बढ़ती उपलब्धता खाद्य आपूर्ति को स्थिर रखने में मदद कर सकती है।
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