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AI से छंटाई-ग्रेडिंग : मशीन में डालते ही अलग हो जाते हैं खराब प्याज-आलू, अब टमाटर और लहसुन की बारी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 26 Sep 2026 11:55 AM IST
सार

एग्रोग्रेड की AI आधारित मशीनें प्याज की छंटाई और ग्रेडिंग का काम करीब 10 टन प्रति घंटे की क्षमता से कर सकती हैं। कंपनी के अनुसार, आकार के आधार पर ग्रेडिंग में करीब 99% तक सटीकता मिलती है और लागत 40 पैसे-1 रुपये प्रति किलो से घटकर 8-10 पैसे प्रति किलो तक आ सकती है।

आलू और प्याज
आलू और प्याज - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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प्याज की छंटाई और पैकिंग में अब कई दिनों की जगह कुछ घंटे लगेंगे। पुणे की कृषि-रोबोटिक्स कंपनी एग्रोग्रेड ने ऐसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित मशीनें विकसित की हैं, जो प्याज और आलू की छंटाई, ग्रेडिंग और वजन का काम तेजी से कर सकती हैं। कंपनी के मुताबिक, उसकी मशीनें आकार के आधार पर करीब 99 प्रतिशत तक सटीकता से प्याज की ग्रेडिंग कर सकती हैं। इससे मजदूरी, समय और हैंडलिंग के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलती है।

एग्रोग्रेड के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी क्षितिज ठाकुर ने बिजनेस लाइन को बताया कि कंपनी अब टमाटर, लहसुन और पत्तेदार सब्जियों के लिए भी एआई आधारित छंटाई, ग्रेडिंग, वजन और गोदाम प्रबंधन की मशीनें तैयार कर रही है। कंपनी की योजना अगले साल टमाटर के लिए मशीन लाने की है।

130 से ज्यादा मशीनें लगाईं
2018 में शुरू हुई एग्रोग्रेड अब तक 14 राज्यों में 130 से ज्यादा मशीनें लगा चुकी है। कंपनी फिलहाल प्याज, आलू, सेब और सुपारी की अलग-अलग जरूरतों के लिए मशीनें उपलब्ध करा रही है। कंपनी मसालों की फसलों के लिए भी तकनीक विकसित करने की संभावना तलाश रही है। ठाकुर के मुताबिक, इन तकनीकों को तैयार करने में अभी दो से तीन साल लग सकते हैं।

खेत के पास ही होने लगी छंटाई
कंपनी के अनुसार, अब कृषि उपज मंडी और खेत के आसपास भी मशीनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसके प्रमुख ग्राहक किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), कृषि उपज एकत्र करने वाले कारोबारी और निर्यातक हैं। कंपनी के मुताबिक, हाथ से प्याज की छंटाई और ग्रेडिंग में जगह के हिसाब से करीब 40 पैसे से 1 रुपये प्रति किलो तक खर्च आता है। 

प्याज जैसी कम कीमत और कम मुनाफे वाली लेकिन ज्यादा मात्रा में पैदा होने वाली फसल में यह लागत महत्वपूर्ण होती है। एग्रोग्रेड के अनुसार, उसकी मशीनों से छंटाई और ग्रेडिंग की लागत घटकर करीब 8 से 10 पैसे प्रति किलो रह गई है। साथ ही, प्याज को बार-बार संभालने की जरूरत कम होने से नुकसान भी घटता है।

मशीन में डालते ही अलग हो जाती है खराब प्याज
नासिक में आमतौर पर ट्रैक्टर-ट्रॉली से प्याज जमीन पर उतारी जाती है। इसके बाद मजदूर ढेर से प्याज चुनकर अलग करते हैं और फिर उसे बोरे में भरा जाता है। इस प्रक्रिया में प्याज को कई बार उठाने-रखने से उसकी ऊपरी परत को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे गुणवत्ता और कीमत प्रभावित होती है। एग्रोग्रेड की मशीन में ट्रॉली से प्याज सीधे डाली जा सकती है। मशीन प्याज की छंटाई और ग्रेडिंग करने के बाद उसे सीधे पैकिंग के लिए भेज देती है। इससे बार-बार हाथ लगाने की जरूरत कम होती है।

हर प्याज की कई तस्वीरों से पहचान
कंपनी की मशीनों में वेव मोशन तकनीक और एआई आधारित डीप लर्निंग का इस्तेमाल किया गया है। मशीन से गुजरने वाली हर उपज की कम से कम 12 तस्वीरें ली जाती हैं। इन तस्वीरों का विश्लेषण डीप लर्निंग तकनीक से किया जाता है। कंपनी ने इसके लिए पिछले करीब 8 वर्षों में जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। मशीन खराब, सड़ी या फफूंद लगी प्याज को अलग करती है और बाजार की जरूरत के मुताबिक अच्छी गुणवत्ता वाली प्याज की ग्रेडिंग व पैकिंग करती है।

10 टन प्रति घंटे तक क्षमता
कंपनी के मुताबिक, मशीन करीब 10 टन उपज प्रति घंटे की क्षमता से काम कर सकती है। जो काम पहले एक-दो दिन में पूरा होता था, उसे अब कुछ घंटों में किया जा सकता है। नासिक के एक एफपीओ में मशीन लगाए जाने के बाद निर्यात के लिए प्याज की पैकिंग की जा रही है। कंपनी का कहना है कि गुणवत्ता की बेहतर छंटाई के कारण एफपीओ को निर्यात के ऑर्डर हासिल करने में मदद मिली है।

200 टन प्याज का काम एक दिन में
नासिक के एक ग्राहक के पास 200 टन प्याज की छंटाई करनी थी। कंपनी के अनुसार, यह काम हाथ से करने में तीन से चार दिन और करीब 60 से 80 मजदूर लगते थे। मशीन की मदद से यह काम एक दिन में 22 मजदूरों के साथ पूरा किया जा रहा है। कंपनी अब प्याज और आलू की पूरी मूल्य श्रृंखला में अपनी तकनीक का विस्तार करने के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अवसर तलाश रही है।

दक्षिण-पूर्व एशिया में विस्तार की तैयारी
एग्रोग्रेड को विदेशों से भी मशीनों के लिए पूछताछ मिल रही है। हालांकि कंपनी के मुताबिक, फिलहाल मशीनों का उत्पादन उसकी सबसे बड़ी चुनौती है। उत्पादन क्षमता बढ़ाने के बाद कंपनी अगले करीब 18 महीनों में दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में विस्तार की योजना बना रही है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में कंपनी की बड़ी संख्या में मशीनें लगाई गई हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़, केरल और तमिलनाडु में भी मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है। कंपनी खास तौर पर आलू के क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों के साथ काम कर रही है।

हर फसल के लिए अलग तकनीक
कृषि उपज की छंटाई और पैकिंग में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हर फसल की बनावट अलग होती है। प्याज की बाहरी परत ढीली होती है, आलू पर मिट्टी लगी रहती है, टमाटर नरम होता है और सुपारी पर छिलका अधिक होता है। इसलिए एक ही तकनीक सभी फसलों पर लागू नहीं की जा सकती।

कंपनी किसी नई फसल के लिए पहले तीन मशीनें खुद तैयार करती है। इसके बाद इन्हें खेतों में लगाकर परीक्षण किया जाता है। किसानों और कारोबारियों से मिले सुझावों के आधार पर मशीन में बदलाव किए जाते हैं।

2.5 लाख से 1 करोड़ रुपये तक कीमत
कंपनी के पास ग्राहक की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग क्षमता वाली मशीनें हैं। इनकी कीमत करीब 2.5 लाख रुपये से शुरू होकर 1 करोड़ रुपये तक जाती है। कंपनी के अनुसार, मशीन की कीमत उसके आकार, ग्राहक की जरूरत के मुताबिक बदलाव, काम करने की क्षमता और उससे मिलने वाले अतिरिक्त लाभ पर निर्भर करती है।

एग्रोग्रेड का कहना है कि उसने प्याज और आलू जैसी कम मुनाफे वाली फसलों पर ज्यादा ध्यान दिया है, क्योंकि इन फसलों में छंटाई और पैकिंग की लागत कम करना किसानों, एफपीओ और कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण है।
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