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Air Pollution Analysis: वाहनों का धुआं, पराली या सड़क की धूल... अब पता चलेगा दिल्ली की हवा कौन कर रहा खराब

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 24 Oct 2026 04:19 PM IST
सार

दिल्ली-NCR में AATAL प्रदूषण विश्लेषण लैब शुरू हुई। यह वाहनों, पराली, उद्योगों और धूल से होने वाले प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और वायु गुणवत्ता के पूर्वानुमान में मदद करेगी।

दिल्ली-NCR में AATAL प्रदूषण विश्लेषण लैब शुरू हुई।
दिल्ली-NCR में AATAL प्रदूषण विश्लेषण लैब शुरू हुई। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक नई प्रयोगशाला शुरू की गई है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने 24 अक्टूबर को इस सुविधा का उद्घाटन किया। इसे ‘इंटीग्रेटेड एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड एयरोसोल टॉक्सिसिटी एनालिसिस लैब’ (AATAL) नाम दिया गया है। इस लैब की मदद से न सिर्फ हवा में प्रदूषण का स्तर पता चलेगा, बल्कि यह भी जानने में मदद मिलेगी कि प्रदूषण किन स्रोतों से आ रहा है और उसमें किन हानिकारक तत्वों की मौजूदगी है।

सरकार के मुताबिक, यह अपनी तरह की दुनिया की पहली एकीकृत सुविधा है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मिशन मौसम’ पहल के तहत स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य दिल्ली-NCR में प्रदूषण को लेकर वैज्ञानिक जानकारी जुटाना और उसके आधार पर नियंत्रण के प्रभावी कदम उठाने में मदद करना है।

सिर्फ AQI नहीं, प्रदूषण की असली वजह भी पता चलेगी
अभी वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) से मुख्य रूप से यह पता चलता है कि हवा कितनी प्रदूषित है। नई लैब इससे आगे बढ़कर प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों की पहचान करने में मदद करेगी। इससे पता लगाया जा सकेगा कि किसी समय दिल्ली की हवा में वाहनों, उद्योगों, पराली जलाने, निर्माण कार्यों, सड़क की धूल या आसपास के क्षेत्रों से आने वाले प्रदूषण की कितनी हिस्सेदारी है।

डॉ. जितेंद्र सिंह के अनुसार, पहले प्रदूषण पर चर्चा इस बात तक सीमित रहती थी कि इसका स्तर 100 है या 200। नई सुविधा से यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रदूषण में कौन-कौन से तत्व मौजूद हैं और अलग-अलग स्रोत कितना योगदान दे रहे हैं। इससे प्रदूषण कम करने के लिए अधिक सटीक कदम उठाए जा सकेंगे।

हवा में मौजूद हानिकारक तत्वों की भी होगी जांच
यह लैब हवा में मौजूद गैसों और एयरोसोल यानी हवा में तैरने वाले बेहद छोटे कणों की रासायनिक जांच करेगी। इसमें PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों के साथ धातुओं और अन्य संभावित जहरीले तत्वों का भी विश्लेषण किया जाएगा।

इससे वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि हवा में मौजूद प्रदूषक किस तरह एक-दूसरे के साथ प्रतिक्रिया करते हैं और उनके स्वास्थ्य पर क्या संभावित प्रभाव हो सकते हैं। इस जानकारी से स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी एजेंसियों को प्रदूषण के जोखिमों का बेहतर आकलन करने में मदद मिल सकती है।

400 मीटर के दायरे तक प्रदूषण का पूर्वानुमान
इस लैब को भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के AIRWISE सिस्टम से जोड़ा गया है। यह सिस्टम वायु गुणवत्ता के पूर्वानुमान, वास्तविक समय के आंकड़ों और प्रदूषण के स्रोतों से जुड़ी जानकारी को एक साथ इस्तेमाल करता है।

परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, AIRWISE अगले 72 घंटे के लिए 400 मीटर के स्थानिक रिजॉल्यूशन पर वायु गुणवत्ता का पूर्वानुमान दे सकता है। यानी दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में प्रदूषण की स्थिति का अधिक बारीकी से आकलन किया जा सकेगा। इससे यह भी समझने में मदद मिलेगी कि आने वाले समय में किसी क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ने की वजह क्या हो सकती है।

प्रदूषण रोकने के लिए एजेंसियों को मिलेगी मदद
इस सुविधा से वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और अन्य संबंधित एजेंसियों को प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों की पहचान करने में मदद मिलेगी। अधिकारी इस जानकारी के आधार पर तय कर सकेंगे कि किन क्षेत्रों में पहले कदम उठाने की जरूरत है और उठाए गए कदम कितने प्रभावी रहे। यह जानकारी ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के तहत प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े फैसलों में भी मददगार हो सकती है।

अलग-अलग विभाग मिलकर करेंगे काम
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए किसी एक विभाग के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थानों, पर्यावरण मंत्रालय, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों के बीच तालमेल जरूरी है।

उन्होंने कहा कि नई लैब से मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़ों को जमीन पर लागू करना महत्वपूर्ण होगा। इससे दिल्ली-NCR में प्रदूषण के स्रोतों को बेहतर ढंग से समझने, समय रहते तैयारी करने और नियंत्रण के उपायों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।

नई सुविधा का उद्देश्य प्रदूषण के स्तर की जानकारी देने के साथ उसकी वजहों और संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को भी सामने लाना है, ताकि वायु प्रदूषण से निपटने के फैसले अधिक सटीक वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर लिए जा सकें।
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