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Agrivoltaic: एक ही खेत में उगेगी फसल, बनेगी बिजली... एग्री-वोल्टाइक तकनीक से किसानों की ऐसे बढ़ेगी कमाई

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Fri, 23 Oct 2026 02:25 PM IST
सार

एग्री-वोल्टाइक तकनीक से किसान एक ही खेत में फसल उगाने के साथ सौर बिजली भी बना सकते हैं। जानें इसके फायदे, संभावनाएं, सरकारी योजनाएं और किसानों की कमाई बढ़ाने के तरीके।

एग्री-वोल्टाइक तकनीक से किसान एक ही खेत में फसल उगाने के साथ सौर बिजली भी बना सकते हैं।
एग्री-वोल्टाइक तकनीक से किसान एक ही खेत में फसल उगाने के साथ सौर बिजली भी बना सकते हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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खेती और सौर ऊर्जा को एक साथ जोड़कर किसानों की आमदनी बढ़ाने की नई संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। इस तकनीक को एग्री-वोल्टाइक (Agrivoltaics) कहा जाता है। इसमें खेत में फसल उगाने के साथ-साथ सौर पैनलों से बिजली भी बनाई जाती है। सौर पैनल जमीन पर लगाने के बजाय उन्हें ऊंचे ढांचे पर या फसलों की कतारों के बीच लगाया जाता है, ताकि उनके नीचे खेती जारी रखी जा सके।

इस व्यवस्था से किसान एक ही जमीन से दो तरह के फायदे ले सकते हैं। वे फसल बेचकर कमाई कर सकते हैं और जरूरत से ज्यादा बनी बिजली को ग्रिड में बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी हासिल कर सकते हैं। हालांकि, इसके फायदे फसल, मौसम, सौर पैनलों की बनावट और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह तकनीक खेती की जरूरतों को पूरा करने के साथ स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने में भी मदद कर सकती है। इससे जमीन का बेहतर इस्तेमाल करने, सिंचाई के लिए सौर बिजली अपनाने और किसानों की आय के नए साधन तैयार करने की संभावनाएं हैं।
 
एग्रीसोलर
एग्रीसोलर - फोटो : सोशल मीडिया
खेती और ऊर्जा, दोनों के लिए जरूरी है सौर बिजली
भारत की बड़ी आबादी आजीविका के लिए खेती और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है। कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का देश की अर्थव्यवस्था में भी अहम योगदान है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2025-26 में कृषि और संबंधित क्षेत्रों का सकल मूल्य वर्धन (GVA) बढ़कर 52.08 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। देश की करीब 46.1 प्रतिशत आबादी की आजीविका कृषि क्षेत्र से जुड़ी है।

खेती में सिंचाई, मशीनों के संचालन और दूसरे कामों के लिए लगातार ऊर्जा की जरूरत होती है। ऐसे में सौर ऊर्जा किसानों को बिजली उपलब्ध कराने का एक विकल्प बन सकती है। सौर पंपों के इस्तेमाल से किसान दिन में खेतों की सिंचाई कर सकते हैं और डीजल से चलने वाले पंपों पर निर्भरता घटा सकते हैं।

देश में खेती के लिए उपलब्ध जमीन भी सौर ऊर्जा उत्पादन की बड़ी संभावना पेश करती है। भूमि उपयोग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023-24 में भारत का कुल रिपोर्टेड क्षेत्र 30.696 करोड़ हेक्टेयर था। इसमें करीब 55 प्रतिशत हिस्सा कृषि भूमि का था। देश का शुद्ध बोया गया क्षेत्र 13.899 करोड़ हेक्टेयर और कुल फसली क्षेत्र 21.788 करोड़ हेक्टेयर दर्ज किया गया। इतने बड़े कृषि क्षेत्र में ऐसी तकनीक अपनाने की संभावनाएं हैं, जिनसे खेती और बिजली उत्पादन दोनों काम एक साथ हो सकें। एग्री-वोल्टाइक इसी दिशा में एक विकल्प है।
 
क्या है एग्री-वोल्टाइक तकनीक?
क्या है एग्री-वोल्टाइक तकनीक? - फोटो : गांव जंक्शन
क्या है एग्री-वोल्टाइक तकनीक?
एग्री-वोल्टाइक को एग्रीसोलर या ड्यूल-यूज सोलर भी कहा जाता है। इसका मतलब है कि एक ही जमीन पर खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन दोनों किए जाएं। इसमें सौर पैनल इस तरह लगाए जाते हैं कि उनके नीचे या आसपास फसल उगाई जा सके।

सामान्य सौर ऊर्जा परियोजनाओं में जमीन का बड़ा हिस्सा पैनलों के लिए इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, एग्री-वोल्टाइक व्यवस्था में पैनलों के बीच या नीचे खेती जारी रखने की योजना बनाई जाती है। इससे जमीन का इस्तेमाल केवल बिजली बनाने तक सीमित नहीं रहता।

इस तकनीक में पैनलों की ऊंचाई, उनके बीच की दूरी, खेत में आने वाली धूप और उगाई जाने वाली फसल का खास ध्यान रखना पड़ता है। हर फसल के लिए एक जैसी व्यवस्था उपयुक्त नहीं होती। इसलिए स्थानीय मौसम, मिट्टी और फसल की जरूरतों के अनुसार सौर पैनलों की बनावट तय करना जरूरी है।

कुछ परिस्थितियों में पैनलों से मिलने वाली आंशिक छाया तेज धूप और गर्मी के असर को कम कर सकती है। इससे मिट्टी से पानी के वाष्पीकरण में कमी आने की संभावना रहती है। लेकिन इसका असर फसल और मौसम पर निर्भर करता है। बहुत ज्यादा छाया होने पर कुछ फसलों की पैदावार घट भी सकती है। इसलिए इस तकनीक को अपनाने से पहले वैज्ञानिक परीक्षण और स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन जरूरी हैं।
 
सौर पैनल
सौर पैनल - फोटो : सोशल मीडिया
कैसे काम करती है एग्री-वोल्टाइक व्यवस्था?
एग्री-वोल्टाइक सिस्टम में खेती और बिजली उत्पादन को एक साथ चलाने के लिए कुछ खास व्यवस्थाएं की जाती हैं।

1. ऊंचे ढांचे पर लगाए जाते हैं सौर पैनल
सौर पैनलों को जमीन से पर्याप्त ऊंचाई पर लगाया जाता है, ताकि उनके नीचे फसल उगाई जा सके। इससे किसान जरूरत के मुताबिक खेत में काम कर सकते हैं और कृषि मशीनों को भी वहां चलाने की सुविधा मिल सकती है। पैनलों की ऊंचाई और उनके बीच की दूरी खेत में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों और फसल की जरूरतों के हिसाब से तय की जाती है।

2. फसलों को मिलती है आंशिक छाया
सौर पैनल कुछ हिस्सों में धूप को रोकते हैं। गर्म और शुष्क क्षेत्रों में यह आंशिक छाया फसलों को तेज गर्मी से बचाने और मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद कर सकती है। हालांकि, छाया की मात्रा ज्यादा होने पर फसल की बढ़वार पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। इसलिए सही फसल और पैनल की बनावट का चुनाव अहम है।

3. एक ही जमीन से दो तरह का उत्पादन
इस व्यवस्था में किसान खेत से फसल भी हासिल कर सकते हैं और उसी जमीन पर लगे सौर पैनलों से बिजली भी बना सकते हैं। इस बिजली का इस्तेमाल सिंचाई और कृषि कार्यों में किया जा सकता है। अगर जरूरत से ज्यादा बिजली बनती है और उसे ग्रिड में बेचने की व्यवस्था उपलब्ध है, तो किसान को अतिरिक्त कमाई का मौका मिल सकता है।
 
भारत में एग्री-वोल्टाइक की स्थिति
भारत में एग्री-वोल्टाइक की स्थिति - फोटो : सोशल मीडिया
भारत में एग्री-वोल्टाइक की स्थिति
भारत में एग्री-वोल्टाइक तकनीक को लेकर कई परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2025 तक देश में एग्री-वोल्टाइक की 36 परियोजनाएं चालू थीं। इनकी कुल स्थापित क्षमता 37.54 मेगावाट थी। इसके अलावा 10 पायलट परियोजनाएं विकसित की जा रही थीं।

इन परियोजनाओं में अलग-अलग तरह के मॉडल अपनाए गए हैं। कहीं सौर पैनलों को ऊंचे ढांचे पर लगाया गया है, तो कहीं फसलों की कतारों के बीच जगह छोड़कर पैनल लगाए गए हैं। कुछ परियोजनाओं में सूर्य की दिशा के अनुसार पैनलों की स्थिति बदलने वाली तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

भारत में अलग-अलग जलवायु और कृषि परिस्थितियां होने के कारण एग्री-वोल्टाइक के लिए एक ही मॉडल हर जगह कारगर नहीं हो सकता। इसलिए विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग, शोध और किसानों को प्रशिक्षण देना जरूरी है, ताकि इस तकनीक को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाया जा सके।
एग्री-वोल्टाइक में भारत के लिए कितनी संभावना?
एग्री-वोल्टाइक में भारत के लिए कितनी संभावना? - फोटो : गांव जंक्शन
एग्री-वोल्टाइक में भारत के लिए कितनी संभावना?
भारत में एग्री-वोल्टाइक के विस्तार की बड़ी संभावनाएं बताई गई हैं। उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, देश में इस तकनीक के जरिए सौर ऊर्जा उत्पादन की क्षमता 3,000 गीगावाट से लेकर करीब 14,000 गीगावाट तक हो सकती है। यह अनुमान कृषि भूमि और सौर ऊर्जा की संभावनाओं को ध्यान में रखकर लगाया गया है। वास्तविक क्षमता जमीन की उपयुक्तता, तकनीकी व्यवस्था, लागत और खेती पर पड़ने वाले असर के आधार पर तय होगी।

किसानों के लिए इसका एक बड़ा फायदा आय के अलग-अलग स्रोत तैयार करना हो सकता है। रिपोर्ट में कुछ परिस्थितियों में प्रति एकड़ सालाना कमाई करीब 60,000 रुपये से बढ़कर एक लाख रुपये से अधिक होने की संभावना बताई गई है। हालांकि, यह हर किसान के लिए तय आय नहीं है।

कमाई इस बात पर निर्भर करेगी कि खेत में कौन-सी फसल उगाई जा रही है, सौर संयंत्र लगाने में कितना खर्च हुआ है, बिजली का इस्तेमाल या बिक्री किस दर पर हो रही है और फसल की पैदावार पर क्या असर पड़ता है। इसलिए किसान को एग्री-वोल्टाइक अपनाने से पहले शुरुआती निवेश, रखरखाव, फसल की संभावित पैदावार और बिजली बेचने से होने वाली आय का आकलन करना चाहिए।
किन राज्यों में ज्यादा संभावनाएं?
किन राज्यों में ज्यादा संभावनाएं? - फोटो : सोशल मीडिया
किन राज्यों में ज्यादा संभावनाएं?
एग्री-वोल्टाइक की संभावनाएं तलाशने के लिए जमीन, जलवायु, खेती और सौर ऊर्जा से जुड़े संसाधनों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) आधारित राष्ट्रीय आकलन में पर्यावरण, कृषि और तकनीकी मानकों को ध्यान में रखते हुए करीब 4.735 करोड़ हेक्टेयर ‘प्रतिबंधित फसल भूमि’ की पहचान एग्री-वोल्टाइक के लिए उपयुक्त क्षेत्र के रूप में की गई है। यह आकलन सावधानीपूर्ण मानकों के आधार पर तैयार किया गया है।

फलों, सब्जियों, मसालों और औषधीय पौधों की खेती को सौर पैनलों के साथ जोड़ने की संभावनाएं बताई गई हैं। हालांकि, किसी भी फसल का चुनाव स्थानीय जलवायु, धूप की जरूरत, पानी की उपलब्धता और पैनलों से मिलने वाली छाया के आधार पर किया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश को एग्री-वोल्टाइक की अधिक संभावनाओं वाले राज्यों में शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों में देश की अनुमानित एग्री-वोल्टाइक बिजली उत्पादन क्षमता का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा विकसित करने की संभावना है। इसके पीछे कृषि भूमि की उपलब्धता, अच्छी सौर रोशनी और अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियां प्रमुख कारण हैं।

वहीं, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल में भी मध्यम स्तर की संभावनाएं बताई गई हैं। देश के दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य हिस्सों में सौर ऊर्जा, जमीन और बागवानी से जुड़े संसाधनों का मेल इस तकनीक के विस्तार के लिए अनुकूल माना गया है।
 
पीएम-कुसुम योजना के तहत देशभर में 10 लाख से अधिक सोलर पंप लगाए जा चुके हैं।
पीएम-कुसुम योजना के तहत देशभर में 10 लाख से अधिक सोलर पंप लगाए जा चुके हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
एग्री-वोल्टाइक को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहल
केंद्र सरकार खेती में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं, शोध और तकनीकी विकास पर काम कर रही है। एग्री-वोल्टाइक के विस्तार में इन पहलों की भूमिका अहम हो सकती है।

1. पीएम-कुसुम योजना
प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान यानी पीएम-कुसुम योजना की शुरुआत फरवरी 2019 में हुई थी। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना, डीजल पर निर्भरता कम करना और किसानों को ऊर्जा से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

मंत्रालय के अनुसार, इस योजना में करीब 34,422 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान बताया गया है। योजना के तहत विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ने को बढ़ावा दिया जाता है।

सौर पंपों से किसानों को सिंचाई के लिए बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। वहीं, सौर ऊर्जा उत्पादन की कुछ व्यवस्थाओं में किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई के अवसर भी बन सकते हैं। हालांकि, योजना के तहत मिलने वाली सहायता और पात्रता संबंधित घटक और लागू दिशा-निर्देशों पर निर्भर करती है।

2. एग्री-वोल्टाइक के लिए उत्कृष्टता केंद्र
राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के साथ मिलकर एग्री-वोल्टाइक के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया है। इसका उद्देश्य इस तकनीक पर शोध करना, प्रदर्शन परियोजनाएं विकसित करना और लोगों को प्रशिक्षण देना है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में 100 किलोवाट क्षमता की एग्री-वोल्टाइक प्रणाली से जुड़ी पायलट परियोजना भी शुरू की गई है। ऐसी परियोजनाओं से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग फसलों और कृषि परिस्थितियों में सौर पैनलों के साथ खेती कैसे की जा सकती है।

3. इंडिया एग्री-वोल्टाइक अलायंस
इंडिया एग्री-वोल्टाइक अलायंस (IAA) की शुरुआत 2023 में हुई थी। यह राष्ट्रीय सौर ऊर्जा महासंघ (NSEFI) के नेतृत्व में काम करने वाला एक ऐसा मंच है, जो खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन को एक साथ बढ़ावा देने पर ध्यान देता है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस अलायंस से 40 से अधिक सदस्य जुड़े हैं। यह सरकारी विभागों, उद्योग जगत और दूसरे संबंधित पक्षों के साथ मिलकर नीति, शोध और जमीनी स्तर पर परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का काम करता है।

अलायंस का उद्देश्य जानकारी और तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराना, पायलट परियोजनाओं को बढ़ावा देना और ऐसे कारोबारी मॉडल तैयार करने में मदद करना है, जिनसे जमीन का बेहतर इस्तेमाल हो सके। इसके जरिए किसानों की आय में विविधता लाने और ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने की संभावनाएं भी तलाश की जा रही हैं।
 
राज्यों में भी चल रही हैं सौर ऊर्जा से जुड़ी पहल
राज्यों में भी चल रही हैं सौर ऊर्जा से जुड़ी पहल - फोटो : सोशल मीडिया
राज्यों में भी चल रही हैं सौर ऊर्जा से जुड़ी पहल
केंद्र सरकार के साथ कई राज्य सरकारें भी खेती में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग योजनाएं चला रही हैं। 
  • महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना 2.0: इस योजना के तहत करीब 35,000 एकड़ सरकारी और निजी जमीन पर 16,000 मेगावाट क्षमता की सौर ऊर्जा परियोजनाएं विकसित करने का लक्ष्य बताया गया है। इसका उद्देश्य कृषि उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति में मदद करना है।
  • गुजरात की किसान सूर्योदय योजना: इस योजना का उद्देश्य किसानों को कृषि कार्यों के लिए दिन में बिजली उपलब्ध कराना है। रिपोर्ट के मुताबिक, चरणबद्ध तरीके से सौर और अन्य गैर-पारंपरिक ऊर्जा संयंत्रों के जरिए सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक, यानी अधिकतम 16 घंटे बिजली आपूर्ति की योजना है।
  • कर्नाटक की सूर्य रायथा योजना: इस योजना के तहत सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंपों को बढ़ावा दिया जाता है। इससे किसानों को खेतों में पानी देने के लिए सौर बिजली का इस्तेमाल करने और अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होने पर उससे कमाई करने के अवसर मिल सकते हैं।

इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य खेती में ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करना और सौर बिजली का इस्तेमाल बढ़ाना है। एग्री-वोल्टाइक के विस्तार के लिए भी ऐसी पहल उपयोगी आधार तैयार कर सकती हैं।
 
सोलर सिंचाई पंप योजना
सोलर सिंचाई पंप योजना - फोटो : सोशल मीडिया
खेती और स्वच्छ ऊर्जा को जोड़ने से खुल सकते हैं नए रास्ते
एग्री-वोल्टाइक भारत में खेती और स्वच्छ ऊर्जा को एक साथ आगे बढ़ाने का अवसर दे सकती है। एक ही जमीन पर फसल उत्पादन और बिजली बनाने से भूमि का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। उपयुक्त परिस्थितियों में पैनलों की छाया मिट्टी की नमी बचाने में मदद कर सकती है। इसके साथ ही, सौर बिजली का इस्तेमाल सिंचाई और दूसरे कृषि कार्यों में किया जा सकता है।

लेकिन इस तकनीक को सफल बनाने के लिए केवल सौर पैनल लगाना पर्याप्त नहीं है। फसल की जरूरत, मिट्टी, पानी, स्थानीय मौसम, मशीनों के इस्तेमाल और परियोजना की लागत का ध्यान रखना होगा। किसानों को यह भी समझना होगा कि सौर पैनलों से मिलने वाली छाया उनकी फसल के लिए कितनी उपयुक्त है और बिजली उत्पादन से संभावित कमाई कितनी होगी।

सरकारी योजनाओं, वैज्ञानिक शोध, स्थानीय स्तर पर परीक्षण और किसानों की भागीदारी से एग्री-वोल्टाइक को बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता है। यदि इसे सही योजना और उपयुक्त तकनीक के साथ अपनाया जाए, तो यह खेती की उत्पादकता, किसानों की आर्थिक सुरक्षा और देश की स्वच्छ ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में योगदान दे सकती है।
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