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Maharashtra: विदर्भ-मराठवाड़ा को सिंचाई परियोजनाओं से नई उम्मीदें, नदी जोड़ योजनाएं बदलेंगी तस्वीर

शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 19 May 2025 01:28 PM IST
सार

महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा अंचल सूखे की मार तथा किसानों की आत्महत्याओं के कारण चर्चा में बने रहे हैं। इस कृषि संकट से निजात दिलाने के लिए, राज्य सरकार इन दोनों अंचलों पर फोकस करते हुए, सिंचाई परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है। 

विदर्भ और मराठवाड़ा अंचल के किसान खाद्य उत्पादकता बढ़ाने के लिए सिंचाई सुविधाओं पर अधिक निर्भर हैं।
विदर्भ और मराठवाड़ा अंचल के किसान खाद्य उत्पादकता बढ़ाने के लिए सिंचाई सुविधाओं पर अधिक निर्भर हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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गर्मियों की शुरुआत के साथ महाराष्ट्र को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ता है। इस साल भी राज्य के 32 प्रमुख बांधों में मार्च के महीने में जल स्तर में 18% गिरावट दर्ज की गई। केंद्रीय जल आयोग द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों में इस चिंताजनक स्थिति को उजागर किया गया है। वर्तमान में, इन 32 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण केवल 32.10% बचा है। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के लिए दर्ज किए गए औसत स्तर से काफी कम है। इसके विपरीत, 146 प्रमुख जलाशयों में राष्ट्रीय औसत 36.16% है, और उपलब्ध जल संसाधनों के मामले में महाराष्ट्र अन्य अधिकांश राज्यों से काफी पीछे है। 

महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र सूखे की मार से ग्रस्त रहे हैं। किसानों की आत्महत्याओं के कारण भी मराठा राज्य के ये दोनों अंचल चर्चा में रहे हैं। इस कृषि संकट से निजात दिलाने के लिए, राज्य सरकार ने खास तौर पर इन दोनों अंचलों पर फोकस करते हुए, सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता देने का फैसला लिया है। जहां एक ओर नदी जोड़ परियोजना को महत्व दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर, राज्य की नई जल नीति के तहत सिंचाई की सूक्ष्म योजनाएं लागू की जा रही हैं।

महाराष्ट्र में, खास तौर से विदर्भ और मराठवाड़ा अंचल के किसान खाद्य उत्पादकता बढ़ाने के लिए सिंचाई सुविधाओं पर अधिक निर्भर हैं। इसके अलावा, महाराष्ट्र औद्योगिक रूप से उन्नत राज्य है और यहां उद्योगों में भी पानी की मांग बहुत अधिक है।  इस समस्या का समाधान सरकार नदी जोड़ परियोजना में देख रही है। 

सिंचाई परियोजनाओं का जाल 
गोदावरी बेसिन के वैनगंगा नदी उप-बेसिन में प्रचुर जल संसाधन होने के बावजूद, विदर्भ को इसके पानी से सिंचाई का भरपूर लाभ नहीं मिल पाता और यह क्षेत्र काफी पिछड़ा हुआ है। अब सरकार वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिए कदम बढ़ाती दिख रही है।

यह सिंचाई परियोजना विदर्भ के भविष्य के लिए परिवर्तनकारी सिद्ध हो सकती है। साथ ही, इससे कृषि क्षेत्र और रोजगार के सृजन की नई संभावनाएं भी खुल सकती हैं। इन प्रस्तावित परियोजनाओं में, पूर्व-पश्चिम विदर्भ वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना, मराठवाड़ा-दमनगंगा-एकदारे गोदावरी नदी जोड़ परियोजना, उत्तरी महाराष्ट्र (नासिक) दमनगंगा-वैतरणा गोदावरी नदी जोड़ परियोजना, उत्तरी महाराष्ट्र नार-पार गिरणा नदी जोड़ परियोजना और मुंबई महानगर क्षेत्र को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई दमनगंगा-पिंजल नदी जोड़ परियोजना शामिल हैं। 

जल संकट से निपटने का रोडमैप
पूर्वी विदर्भ की तुलना में पश्चिम विदर्भ में पानी की कमी अत्यधिक देखने को मिलती है। पूर्वी विदर्भ में वैनगंगा नदी में कई सहायक नदियां मिलती हैं। गोसीखुर्द राष्ट्रीय परियोजना भी वैनगंगा नदी पर ही स्थित है। इसकी भंडारण क्षमता पूरी हो जाने पर अतिरिक्त पानी आगे बह जाता है। पश्चिमी विदर्भ में नदियां तुलनात्मक रूप से छोटी और कम हैं। इसीलिए, आवश्यकतानुसार पानी उपलब्ध नहीं हो पाता। लिहाजा, विदर्भ में जल की कमी को दूर करने के लिए सरकार गोसीखुर्द परियोजना से उपलब्ध अतिरिक्त जल को पश्चिमी विदर्भ के सूखा प्रभावित क्षेत्रों की ओर मोड़ने के लिए एक व्यापक योजना पर तैयारी कर रही है। इसके लिए, वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना ने आकार ले लिया है।

राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने राष्ट्रीय स्तर पर तथा राज्यों के भीतर अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण की योजना बनाई है। एजेंसी के सुझाव के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ने विदर्भ के जल संकट को दूर करने के लिए, वैनगंगा (गोसीखुर्द)-नलगंगा (पूर्णा) नदी जोड़ परियोजना को साकार करने का रोडमैप बनाया है।

450 किलोमीटर लंबा नेटवर्क
वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना के तहत भंडारा से बुलढाणा जिले तक नहरों, सुरंगों और जलाशयों का 426.54 किलोमीटर लंबा नेटवर्क बनाया जाएगा।   87,342.86 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली वैनगंगा-नलगंगा परियोजना से लगभग 3.75 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी। इसके जरिये, नागपुर की 92,326 हेक्टेयर, वर्धा की 56,646 हेक्टेयर, अमरावती की 83,571 हेक्टेयर, यवतमाल की 15,895 हेक्टेयर, अकोला की 84,625 हेक्टेयर और बुलढाणा की 38,214 हेक्टेयर भूमि सिंचाई के अंतर्गत आएगी। इसके अलावा, रबी सीजन के दौरान पानी के उपयोग को सुविधाजनक बनाने के लिए 31 भंडारण टैंक भी बनाए जाएंगे।

नकदी फसलों के लिए वरदान
सरकार की मंशा है कि ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर संतुलित विकास कायम रखा जाएगा। दूसरी तरफ, भूजल स्तर बढ़ेगा, जिससे पर्यावरण अनुकूल वातावरण बनेगा। नए जलाशयों के निर्माण से पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। सोयाबीन का रकबा संतुलित रहेगा, जबकि रबी सीजन के दौरान गेहूं, चना और सूरजमुखी का उत्पादन बढ़ेगा। कपास की खेती बढ़ेगी और नागपुर तथा वर्धा जिलों में इसका क्षेत्रफल 60 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। निविदा प्रक्रिया पूरी हो चुकी है तथा सर्वेक्षण कार्य प्रगति पर है। साथ ही, इसे नियंत्रित और संचालित करने के लिए तीन बोर्ड काम कर रहे हैं।

20 परियोजनाओं की तैयारी
पिछले साल केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि दमनगंगा-पिंजल नदी जोड़ परियोजना की डीपीआर तैयार है। इस परियोजना से मुंबई को सुचारू जलापूर्ति सुनिश्चित होगी। वहीं, पार-तापी-नर्मदा नदी जोड़ परियोजना की डीपीआर भी तैयार है। ये दोनों अंतरराज्यीय परियोजनाएं महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों को जोड़ेंगी। इधर, महाराष्ट्र ने 20 नदी जोड़ो परियोजनाओं पर रिपोर्ट तैयार की है।
 
बता दें कि अगस्त 1980 में तत्कालीन सिंचाई मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में योजना तैयार की थी, जिसके तहत जल को अतिरिक्त बेसिनों से जल की कमी वाले बेसिनों में स्थानांतरित किया जाना था। इस परियोजना में लगभग तीन हजार भंडारण बांधों के नेटवर्क के माध्यम से भारत की 37 नदियों को जोड़कर जल-समृद्ध बेसिनों से जल-विहीन बेसिनों में पानी स्थानांतरित करने की परिकल्पना की गई थी। उद्देश्य यही था कि भारत में नदियों को जोड़ने से महाराष्ट्र जैसे पश्चिमी भारत के राज्यों के सूखाग्रस्त क्षेत्रों और बिहार, असम आदि बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों को भुखमरी से बचाने में मदद मिलेगी। 

नई जल नीति में सूक्ष्म सिंचाई पर फोकस 
महाराष्ट्र जल नीति में पानी की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर, उपलब्ध पानी के उपयोग पर प्राकृतिक सीमाएं, प्रबंधन में त्रुटियों के कारण जल संसाधनों का अपर्याप्त उपयोग, भूजल स्तर में गिरावट व पानी की गुणवत्ता में कमी और इनके प्रभावी समाधान के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। यह जल नीति कई उद्देश्यों पर केंद्रित हैजल की कमी और सूखे का समाधान, स्वच्छ और पर्याप्त जल आपूर्ति, समान जल वितरण, पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, जल की गुणवत्ता बनाए रखना और वितरण में उत्पादकता और दक्षता बढ़ाना, साथ ही एकीकृत जल प्रबंधन सुनिश्चित करना शामिल है।

इस नीति का ध्यान जल आपूर्ति प्रणाली में लोगों को शामिल करने, स्वच्छता कार्यक्रमों की योजना बनाने तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की आवश्यकताओं के अनुसार, जल प्रबंधन के उद्देश्यों को प्राप्त करने पर केंद्रित है। इस नीति में सूक्ष्म सिंचाई और इसे बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया गया है। एक  महत्वपूर्ण लक्ष्य सरकार द्वारा नहरों के माध्यम से जलापूर्ति में कमियों को दूर करने तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए जल परीक्षण कराना है।

नीति में शून्य अपशिष्ट जल का लक्ष्य निर्धारित किया गया है तथा प्रतिवर्ष दस लाख घन मीटर जल का उपयोग करने वाले उद्योगों के लिए इसकी रिपोर्ट करना अनिवार्य कर दिया गया है। उद्योगों को उन क्षेत्रों में भूजल का उपयोग करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है, जहां भूजल का अत्यधिक दोहन और निष्कर्षण किया गया है, वर्षा जल संचयन को भी अनिवार्य कर दिया गया है।

जल संसाधनों की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए जागरूकता का प्रसार, आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग, वाष्पीकरण की दर को कम करना तथा जल संरक्षण निधि उपलब्ध कराना आवश्यक होगा। इस नीति में, ऐसे बिंदुओं को शामिल किया गया है, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रस्तावित सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप हैं। 


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