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खाद्य सुरक्षा में पशुधन की भूमिका : सिर्फ अनाज नहीं, प्रोटीन और ग्रामीण आय भी जरूरी, जानें

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 06 Sep 2026 03:45 PM IST
सार

  • खाद्य सुरक्षा का मतलब सिर्फ अनाज और कैलोरी नहीं, बल्कि पर्याप्त प्रोटीन और पोषण भी है।
  • पशुधन क्षेत्र 2014-15 से करीब 7-7.4% सालाना की दर से बढ़ रहा है।
  • कृषि GVA में पशुधन क्षेत्र की हिस्सेदारी 30% से अधिक है।
  • दूध की प्रति व्यक्ति खपत 1970 के 107 ग्राम से बढ़कर 2022-23 में 459 ग्राम प्रतिदिन हुई।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में खाद्य सुरक्षा की चर्चा लंबे समय से इस बात के इर्द-गिर्द रही है कि देश में सभी लोगों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध हो। हरित क्रांति ने देश को पर्याप्त कैलोरी उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभाई। हालांकि, खाद्य सुरक्षा का मतलब केवल पेट भरना नहीं है। इसमें पौष्टिक भोजन, सस्ता प्रोटीन और ग्रामीण परिवारों की स्थिर आय भी शामिल होनी चाहिए। ऐसे में पशुधन क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। 

बिजनेस लाइन में Gocarin के संस्थापक और CEO रामानुज पांडा की पब्लिश रिपोर्ट के अनुसार, पशुधन उद्योग वर्ष 2014-15 से हर साल करीब 7-7.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और कृषि क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन (GVA) में इसका योगदान 30 प्रतिशत से अधिक है। इसके बावजूद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) अभी भी मुख्य रूप से अनाज पर केंद्रित हैं।

कैलोरी की कमी दूर हुई, अब प्रोटीन पर ध्यान जरूरी
भारत ने भोजन की कैलोरी संबंधी जरूरत को काफी हद तक पूरा कर लिया है, लेकिन प्रोटीन की उपलब्धता अभी भी एक बड़ी चुनौती है। दूध, अंडे और मांस प्रोटीन के आसानी से उपलब्ध स्रोत हैं। इसलिए बेहतर पोषण सुनिश्चित करने में पशुपालन की अहम भूमिका है।

भारत में दूध की उपलब्धता इसका एक अच्छा उदाहरण है। वर्ष 1970 में प्रति व्यक्ति दूध की खपत करीब 107 ग्राम प्रतिदिन रह गई थी। इसके बाद ऑपरेशन फ्लड और सहकारी समितियों के विस्तार से डेयरी क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया। ‘अमूल दूध पीता है इंडिया’ जैसे अभियानों ने भी इसमें योगदान दिया। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2022-23 में प्रति व्यक्ति दूध की खपत बढ़कर 459 ग्राम प्रतिदिन हो गई।

पशुधन सिर्फ भोजन नहीं, कमाई का साधन भी
डेयरी क्षेत्र की सफलता को अब पोल्ट्री, छोटे पशुधन और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में भी दोहराया जा सकता है। सहकारी समितियों ने किसानों को संगठित बाजार से जोड़ने के साथ-साथ पोषण सुधारने में भी मदद की है।

पशुधन केवल भोजन उपलब्ध कराने का साधन नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण परिवारों के लिए कमाई का महत्वपूर्ण जरिया भी है। छोटे और भूमिहीन किसानों के लिए पशुपालन ऐसा आर्थिक संसाधन है, जिससे बिना जमीन के मालिक बने भी आय अर्जित की जा सकती है। इससे ग्रामीण महिलाओं को भी आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।

संकट के समय सबसे ज्यादा जोखिम
विडंबना यह है कि जिन परिवारों की आय पशुधन पर सबसे ज्यादा निर्भर है, उन्हें प्राकृतिक आपदा या बीमारी जैसे संकट के समय सबसे कम सुरक्षा मिलती है। बीमा और कर्ज तक उनकी पहुंच अभी भी सीमित है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन और पशुधन बीमा योजना जैसी पहल के बावजूद स्थिति में और सुधार की जरूरत है।

किसी बीमारी या महामारी के फैलने पर छोटे किसान अपनी सबसे बड़ी संपत्ति यानी पशुधन खो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन भी इस जोखिम को बढ़ा रहा है। उदाहरण के लिए, 2025 में पंजाब में आई बाढ़ के दौरान करीब 1,000 बड़े पशुओं और 35,000 पोल्ट्री पक्षियों की मौत की बात सामने आई थी। साथ ही चारे की आपूर्ति को भी नुकसान पहुंचा था। फसल नुकसान की तुलना में पशुधन के नुकसान का रिकॉर्ड और मुआवजा अभी भी काफी कम है।

बाजार की कीमतों का जोखिम भी बड़ी चुनौती
पशुधन क्षेत्र के सामने एक बड़ी समस्या नीतियों का अलग-अलग हिस्सों में बंटा होना है। पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन और आपदा प्रबंधन से जुड़ी योजनाएं अलग-अलग तरीके से संचालित होती हैं। इससे पशुधन क्षेत्र के लिए एक व्यापक नीति बनाना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम भी किसानों पर रहता है। 

अनाज उत्पादकों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी व्यवस्था का लाभ मिलता है, लेकिन दूध और पशुधन उत्पादक बाजार की कीमतों में होने वाले बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। इसलिए व्यापक खाद्य सुरक्षा नीति में पशुधन क्षेत्र को शामिल करते हुए कर्ज और बीमा की आसान सुविधा, चारे की उपलब्धता, मजबूत सहकारी समितियां, बेहतर बाजार ढांचा और आपदा के समय उचित मुआवजा सुनिश्चित करने की जरूरत है।

खाद्य सुरक्षा में पशुधन को मिले अहम स्थान
भारत को अनाज और पशुधन आधारित खाद्य सुरक्षा में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। देश को खाद्य सुरक्षा की परिभाषा को और व्यापक बनाने की जरूरत है। प्रति व्यक्ति कृषि योग्य जमीन लगातार कम हो रही है। ऐसे में पोल्ट्री और छोटे पशुधन के जरिए कम जमीन में भी प्रोटीन उपलब्ध कराया जा सकता है। साथ ही पशुपालन ग्रामीण परिवारों को आर्थिक संकट से उबरने में भी मदद कर सकता है।

भारत ने डेयरी और अंडा उत्पादन के क्षेत्र में संस्थागत प्रयासों के फायदे देखे हैं। अब इसी अनुभव का इस्तेमाल पशुधन क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में भी किया जाना चाहिए। पशुधन को केवल कृषि के सहायक क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जा सकता। पोषण, ग्रामीण आय और आपदाओं से निपटने की क्षमता को मजबूत करने के लिए इसे भारत की खाद्य सुरक्षा नीति के केंद्र में लाने की जरूरत है।

 
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