छत्तीसगढ़, जिसे धान का कटोरा कहा जाता है, अब अपनी खेती को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की तैयारी कर रहा है। रायपुर में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के क्षेत्रीय कार्यालय की स्थापना हो रही है। केंद्र सरकार के इस फैसले ने किसानों, छोटे व्यापारियों और उद्यमियों के मन में नई उम्मीदें जगा दी हैं। यह कार्यालय न सिर्फ छत्तीसगढ़ के धान, कोदो, कुटकी और बस्तर के चावल जैसे उत्पादों को वैश्विक बाजारों में ले जाएगा, बल्कि टमाटर, काजू, आलू और टाऊ जैसी विविध फसलों को भी नई पहचान देगा।
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत कार्यरत एपीडा का मकसद फसलों और खाद्य उत्पादों को विदेशी बाजारों में बेचने में मदद करना है। यह संस्था फल, सब्जियां, डेयरी उत्पाद, मिठाइयां, दालें, चावल, मसाले शहद और ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स के निर्यात को बढ़ावा देती है। एपीडा किसानों को ट्रेनिंग, क्वालिटी सर्टिफिकेशन, पैकेजिंग और मार्केटिंग की सुविधा भी प्रदान करता है ताकि उनके उत्पाद वैश्विक मानकों पर खरे उतर सकें।
धान के कटोरे में फसलों की विविधता
छत्तीसगढ़ में खेती का मतलब लंबे समय से सिर्फ धान रहा है। सरकार एमएसपी पर धान खरीदती है, जिसके कारण ज्यादातर किसान इसे ही उगाते हैं। वर्ष 2024-25 में राज्य में करीब 14.20 लाख टन अधिशेष चावल पैदा हुआ, जिसे सरकार को एमएसपी से कम दाम पर बेचना पड़ रहा है। वहीं, छत्तीसगढ़ में खेती की विविधता इसकी ताकत भी है। जशपुर में टमाटर, बस्तर में चावल और काजू, सरगुजा में चाय और धमतरी में मखाना जैसी फसलों की खेती हो रही है।
समस्या यह है कि इन फसलों की मार्केटिंग और निर्यात की सुविधा नहीं होने से किसानों को भारी नुकसान होता है। उदाहरण के लिए, जशपुर में टमाटर की कीमतें इस साल 1-2 रुपये प्रति किलो तक गिर गईं, जिससे किसानों को फसल मवेशियों को खिलानी पड़ी या फिर उन्होंने खेतों में ही फसल छोड़ दी। एपीडा का रायपुर कार्यालय इस समस्या का समाधान बन सकता है। यह न सिर्फ धान और मिलेट्स जैसे उत्पादों को वैश्विक बाजारों में ले जाएगा, बल्कि टमाटर, काजू और आलू जैसी फसलों को भी निर्यात के लिए तैयार करेगा। इससे किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिलेगा और उनकी आय में इजाफा होगा।
छत्तीसगढ़ के लिए एपीडा की भूमिका
एपीडा देश भर में फैले क्षेत्रीय कार्यालयों के जरिए अपनी सेवाएं देता है। एपीडा के 15 क्षेत्रीय कार्यालय हैं, जो मुंबई, बंगलूरू, अहमदाबाद, हैदराबाद, कोलकाता, गुवाहाटी, वाराणसी, चंडीगढ़, भोपाल, चेन्नई, कोच्चि, त्रिपुरा, श्रीनगर, जम्मू और लद्दाख में हैं। अब रायपुर में भी इसका नया क्षेत्रीय कार्यालय खुलने जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
टमाटर का निर्यात : जशपुर टमाटर उत्पादन में अग्रणी है, लेकिन कीमतें गिरने से किसान परेशान हैं। एपीडा टमाटर को प्रोसेस करके टोमैटो प्यूरी या सॉस जैसे उत्पादों के रूप में निर्यात करने में मदद कर सकता है। इससे नुकसान कम होगा और किसानों को बेहतर दाम भी मिलेगा।
काजू और श्री अन्न : बस्तर और रायगढ़ में काजू की खेती बढ़ रही है। एपीडा 2021 से काजू को अपने दायरे में शामिल करके इसके निर्यात को बढ़ावा दे रहा है। कोदो-कुटकी जैसे श्री अन्न की मांग भी दुनिया में बढ़ी है और एपीडा इन्हें जैविक प्रमाणीकरण के साथ विदेश भेज सकता है।
मखाना और चाय : धमतरी में मखाना की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसे एपीडा वैश्विक सुपरफूड के रूप में प्रचारित कर सकता है। जशपुर की चाय भी निर्यात की संभावनाएं रखती है।
स्थानीय रोजगार : एपीडा की मदद से फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और कोल्ड स्टोरेज बनेंगे, जिससे गांवों में नौकरियां बढ़ेंगी। यह विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में युवाओं के लिए फायदेमंद होगा।
किसानों की बदलती सोच
छत्तीसगढ़ के किसान जब दूसरी फसलों की ओर रुख करते हैं तो मार्केटिंग और निर्यात की सुविधा न होने से उनकी मेहनत बर्बाद हो जाती है। उदाहरण के लिए, आलू और टाऊ जैसी फसलों की मांग स्थानीय स्तर पर या पड़ोसी राज्यों तक सीमित है और बिना प्रोसेसिंग के इन्हें लंबे समय तक स्टोर करना मुश्किल होता है। एपीडा का रायपुर कार्यालय इन समस्याओं का समाधान दे सकता है। यह किसानों को नई तकनीकों, जैसे- कोल्ड स्टोरेज और मूल्य संवर्धित उत्पाद (जैसे- आलू के चिप्स या टोमैटो सॉस) बनाने की ट्रेनिंग देगा। इससे किसान नई फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित होंगे।
वैश्विक बाजार में बढ़ेगी छत्तीसगढ़ की पैठ
एपीडा ने भारत के कृषि निर्यात को वर्ष 2024-25 में 50 अरब डॉलर से ऊपर पहुंचाया है, जिसमें 51 फीसदी हिस्सा इसके उत्पादों का है। छत्तीसगढ़ के जीआई टैग वाले बस्तर चावल, कोदो-कुटकी और ऑर्गेनिक शहद को जापान, यूएई, सऊदी अरब और यूरोप जैसे देशों में भेजा जा सकता है। एपीडा ने हाल ही में अनार को ऑस्ट्रेलिया और अनानास यूएई भेजा है। छत्तीसगढ़ के उत्पाद भी ऐसी ही सफलता की कहानी लिख सकते हैं।
कोल्ड स्टोरेज और रसद तंत्र की कमी
एपीडा के पास कई अवसर हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। छत्तीसगढ़ में कोल्ड स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स यानी रसद तंत्र की कमी एक समस्या है। मगर, छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में लॉजिस्टिक्स हब विकसित करने के लिए निजी निवेशकों को 140 करोड़ रुपये तक सब्सिडी देने की घोषणा की है। इसका उद्देश्य छत्तीसगढ़ को लॉजिस्टिक्स हब के रूप में स्थापित करना है।
यह सब्सिडी न्यूनतम 5 एकड़ भूमि पर विकसित किए जाने वाले लॉजिस्टिक्स हब के लिए बुनियादी ढांचे की लागत (भूमि को छोड़कर) का 40% कवर करती है। परिवहन हब के लिए भी प्रोत्साहन उपलब्ध हैं। 1 जुलाई, 2025 को घोषित यह नीति लॉजिस्टिक्स के बुनियादी ढांचे में निजी निवेश को प्रोत्साहित करेगी। दूसरी बात ये है कि छत्तीसगढ़ में किसान जो भी उगाते हैं, अमूमन खेती का तरीका पारंपरिक होता है। छोटे किसानों को अंतरराष्ट्रीय मानकों की जानकारी कम होती है। एपीडा का दावा है कि वह इन समस्याओं को हल करने के लिए काम कर रहा है।
केंद्र की इस पहल के कुछ फायदे इस प्रकार हैं :
- बुनियादी ढांचा विकास : एपीडा भी कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए सब्सिडी देगा, जिससे लॉजिस्टिक्स में सुधार होगा।
- जागरूकता और प्रशिक्षण : एपीडा वर्कशॉप और सेमिनार आयोजित करेगा, जिसमें किसानों को ऑर्गेनिक खेती व निर्यात की प्रक्रिया समझाई जाएगी।
- डिजिटल मंच : एपीडा का फार्मर कनेक्ट पोर्टल किसानों और निर्यातकों को जोड़ेगा, जिससे उन्हें नए बाजार मिलेंगे।
कृषि को ऐसे बढ़ावा देता है एपीडा
परीक्षण और गुणवत्ता प्रमाणीकरण : एपीडा फसलों और खाद्य उत्पादों की क्वालिटी को अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से जांचता है। यह फाइटो-सैनिटरी सर्टिफिकेट, ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन और फूड टेस्टिंग जैसी सुविधाएं देता है। रायपुर में अब ये सुविधाएं स्थानीय स्तर पर मिलेंगी, जिससे किसानों को दूर नहीं जाना पड़ेगा।
प्रशिक्षण और कौशल विकास : किसानों और छोटे उद्यमियों को आधुनिक खेती, पैकेजिंग और मार्केटिंग की ट्रेनिंग भी एपीडा देता है। मसलन, बस्तर के किसानों को ऑर्गेनिक चावल या कोदो-कुटकी की खेती के लिए नई तकनीकों की जानकारी मिल सकेगी।
निर्यात के लिए मार्केटिंग : एपीडा अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों और क्रेता-विक्रेता सम्मेलन का आयोजन भी करता है। इससे छत्तीसगढ़ के उत्पादों को जापान, यूएई, सऊदी अरब और यूरोप जैसे बाजारों में जगह मिलेगी।
अनुदान और वित्तीय सहायता : खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, कोल्ड स्टोरेज और पैक हाउस जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए भी एपीडा सब्सिडी देता है। यह छोटे और मझोले उद्यमों को भी सपोर्ट करता है, जिससे छत्तीसगढ़ में रोजगार के नए मौके बनेंगे।
जैविक खेती को बढ़ावा
एपीडा का राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) जैविक उत्पादों को प्रमाणित करता है। छत्तीसगढ़ में बस्तर और सरगुजा जैसे इलाकों में जैविक खेती की अपार संभावनाएं हैं। यहां जैविक उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा दिया जाए तो किसानों को फायदा हो सकता है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने रायपुर में एपीडा कार्यालय की स्थापना की घोषणा को ऐतिहासिक बताया है। उन्होंने कहा, एपीडा का यह कार्यालय हमारी ‘वोकल फॉर लोकल टू ग्लोबल’ की सोच को साकार करेगा।