Nutrition in India: भारत ने पिछले छह दशकों में खाद्य उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। देश अब पर्याप्त मात्रा में अनाज, दूध, फल और सब्जियों का उत्पादन कर रहा है। लेकिन अब चुनौती सिर्फ हर व्यक्ति का पेट भरने की नहीं है, बल्कि लोगों को सही पोषक तत्वों वाला संतुलित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की है।
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में कृषि और खाद्य व्यवस्था को केवल इस आधार पर नहीं परखा जा सकता कि देश में कितना अनाज पैदा हो रहा है। यह भी देखना होगा कि लोगों की थाली में कितना पौष्टिक और विविध भोजन पहुंच रहा है।
खाद्य उत्पादन में भारत ने हासिल की बड़ी सफलता
पिछले कई दशकों में भारत ने खाद्य उत्पादन बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश आज दुनिया के करीब 25 फीसदी दूध की आपूर्ति करता है। भारत में बागवानी फसलों का उत्पादन 369 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। वहीं, खाद्यान्न उत्पादन भी तेजी से बढ़ा है। साल 2015-16 में खाद्यान्न उत्पादन 251.5 मिलियन टन था, जो 2024-25 में बढ़कर रिकॉर्ड 357.7 मिलियन टन हो गया।
FAO के अनुमान के मुताबिक, ऐसे भारतीय लोगों की हिस्सेदारी जो स्वस्थ आहार का खर्च नहीं उठा सकते, 2017 में 59.8 फीसदी से घटकर 2025 में 35.5 फीसदी रह गई है। यह भारत की खाद्य सुरक्षा की दिशा में बड़ी उपलब्धि है, लेकिन पोषण की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है।
अब समस्या कैलोरी की नहीं, सही पोषण की है
भारत में अब चुनौती केवल पर्याप्त कैलोरी उपलब्ध कराने की नहीं है। लोगों को सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन, खनिज और अन्य जरूरी पोषक तत्व मिलना भी जरूरी है। यानी देश को अब ऐसी खाद्य व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें सही भोजन का उत्पादन हो, वह सही जगह तक पहुंचे और हर परिवार उसे खरीदने में सक्षम हो।
बच्चों में कुपोषण घटा, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं
- फोटो : गांव जंक्शन
बच्चों में कुपोषण घटा, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण NFHS-6 (2023-24) के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों में कुपोषण की स्थिति में सुधार हुआ है। बच्चों में Stunting यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई की समस्या 2005-06 में 48 फीसदी थी, जो 2023-24 में घटकर 29.3 फीसदी रह गई। Underweight यानी उम्र के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों की हिस्सेदारी 42.5 फीसदी से घटकर 31.8 फीसदी हो गई।
Wasting में सुधार की रफ्तार धीमी रही है। गंभीर रूप से कमजोर बच्चों यानी Severe Wasting में अधिक स्पष्ट गिरावट दर्ज की गई है। इससे पता चलता है कि बच्चों के पोषण की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में बच्चे पोषण संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
दूसरी तरफ बढ़ रहा मोटापा
भारत के पोषण की तस्वीर का दूसरा पहलू भी तेजी से सामने आ रहा है। एक ओर कुपोषण है तो दूसरी ओर Overnutrition यानी जरूरत से ज्यादा और असंतुलित भोजन से होने वाला मोटापा बढ़ रहा है। 2023-24 में 15 से 49 वर्ष की 30.7 फीसदी महिलाएं Overweight या Obese पाई गईं। 2005-06 में यह आंकड़ा केवल 12.6 फीसदी था। पुरुषों में भी अधिक वजन और मोटापे की समस्या बढ़ी है। खास बात यह है कि यह समस्या केवल अमीर परिवारों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्गों में भी बढ़ रही है।
योजनाओं का फोकस सिर्फ कैलोरी पर नहीं, डाइट क्वालिटी पर हो
- फोटो : गांव जंक्शन
एक ही परिवार में कुपोषण और मोटापा
भारत में अब Double Burden of Malnutrition (DBM) की समस्या भी सामने आ रही है। इसका मतलब है कि एक ही परिवार में एक तरफ बच्चा कुपोषण का शिकार हो और दूसरी तरफ मां Overweight या Obese हो। ऐसे परिवारों की हिस्सेदारी 2015-16 में 5.96 फीसदी से बढ़कर 2019-21 में 7.57 फीसदी हो गई। यह समस्या शहरी भारत में अपेक्षाकृत ज्यादा दिखाई देती है। हालांकि ग्रामीण परिवारों में भी इस समस्या के बढ़ने की रफ्तार तेज रही है। इससे यह धारणा भी कमजोर होती है कि कुपोषण केवल गांवों की समस्या और मोटापा केवल शहरों की समस्या है। अब दोनों समस्याएं एक साथ मौजूद हैं।
योजनाओं का फोकस सिर्फ कैलोरी पर नहीं, डाइट क्वालिटी पर हो
भारत में पोषण सुधारने के लिए पहले से कई योजनाएं चल रही हैं। इनमें आंगनवाड़ी केंद्र, स्कूल फीडिंग प्रोग्राम और पोषण अभियान जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन योजनाओं के जरिए लाखों लोगों तक पहुंच बनाई जा रही है। अब जरूरत इन योजनाओं के फोकस को और व्यापक बनाने की है। सिर्फ यह सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है कि लोगों को पर्याप्त कैलोरी मिले। भोजन में दाल, मोटे अनाज, फल, सब्जियां, दूध, अंडे और अन्य पोषक खाद्य पदार्थों की विविधता भी बढ़ानी होगी। यानी ऐसी नीतियों की जरूरत है जो एक साथ कुपोषण और मोटापे, दोनों से निपट सकें।
ग्रामीण परिवारों के खाने के खर्च में बड़ा बदलाव
भारत में लोगों के भोजन पर खर्च करने के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है। ग्रामीण इलाकों में कुल घरेलू खर्च में भोजन की हिस्सेदारी पहली बार 50 फीसदी से नीचे आ गई है। कभी ग्रामीण परिवारों के भोजन के बजट में अनाज की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई हुआ करती थी। अब यह घटकर लगभग 5 फीसदी रह गई है। शहरी भारत में भी खाने की आदतों में बदलाव देखने को मिल रहा है। यहां Beverages और Processed Food अब भोजन के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा बन गए हैं। इस श्रेणी पर खर्च 2011-12 में करीब 9 फीसदी से बढ़कर 2023-24 में 11 फीसदी से ज्यादा हो गया। वहीं, अनाज पर होने वाला खर्च लगभग आधा रह गया है।
कृषि नीति में भी बदलाव की जरूरत
खाने की पसंद और मांग बदल रही है, लेकिन भारत की खाद्य नीति में बदलाव की रफ्तार उतनी तेज नहीं है। सरकारी खरीद और इनपुट सब्सिडी का बड़ा हिस्सा अभी भी गेहूं और चावल पर केंद्रित है। दूसरी ओर, दालें, तिलहन, मोटे अनाज, फल और सब्जियां आने वाले समय में भोजन की मांग बढ़ाने वाले प्रमुख क्षेत्र हैं, लेकिन इन्हें अपेक्षाकृत कम संस्थागत समर्थन मिलता है। ऐसे में कृषि नीति को भी लोगों की बदलती पोषण जरूरतों के हिसाब से बदलने की जरूरत है।
पैकेज्ड फूड पर लग सकता है लाल चेतावनी लेबल
पोषण के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण कदम Front-of-Pack Labelling (FOPL) को लेकर सामने आया है। 29 अगस्त 2026 को FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने ज्यादा Added Sugar, Saturated Fat या Salt वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर लाल रंग के Hexagonal Warning Labels लगाने की सिफारिश की है। यह कदम लोगों को पैकेट के सामने ही यह समझने में मदद कर सकता है कि किसी खाद्य पदार्थ में चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा अधिक है या नहीं।
प्रस्ताव के अनुसार, पहले चरण में उन उत्पादों पर चेतावनी लेबल लगाने की योजना है, जो दो या उससे अधिक पोषक तत्वों की तय सीमा से ज्यादा हों। इसमें ज्यादा मीठे पेय भी शामिल होंगे। दूसरे चरण में इनमें से किसी एक पोषक तत्व की सीमा से ज्यादा मात्रा वाले उत्पादों पर भी चेतावनी लागू की जा सकती है। FSSAI का कहना है कि चरणबद्ध तरीके से इसे लागू करने से उपभोक्ताओं को इसे अपनाने का समय मिलेगा और खाद्य उद्योग को अपने उत्पादों में बदलाव करने का अवसर भी मिलेगा।
लेकिन खुले और स्ट्रीट फूड पर अब भी सवाल
Front-of-Pack Labelling की पहल महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी एक सीमा भी है। यह नियम मुख्य रूप से पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर लागू होगा। भारत में बड़ी मात्रा में लोग खुले में बिकने वाले स्नैक्स, स्ट्रीट फूड और बिना ब्रांड वाले खाद्य पदार्थ भी खाते हैं। इन पर ऐसी चेतावनी व्यवस्था लागू करना आसान नहीं है। यही खाद्य पदार्थ मोटापे और Lifestyle Diseases की बढ़ती समस्या में भी योगदान दे सकते हैं। इसलिए पोषण नीति को केवल पैकेज्ड फूड तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।
2047 तक सिर्फ अनाज का रिकॉर्ड नहीं, संतुलित थाली भी जरूरी
भारत ने पिछले 60 वर्षों में अपनी कृषि व्यवस्था को इस तरह विकसित किया कि देश में पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध हो सके। अब अगले 25 वर्षों में लक्ष्य को और आगे बढ़ाने की जरूरत है। भारत को ऐसी Food System तैयार करनी होगी, जो सही खाद्य पदार्थों का उत्पादन करे, उन्हें बेहतर तरीके से बाजार तक पहुंचाए और हर परिवार को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराए। 2047 का विकसित भारत केवल रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन से तय नहीं होगा। असली सफलता तब होगी, जब देश के हर व्यक्ति की थाली सिर्फ भरी हुई नहीं, बल्कि पोषण से भरपूर और संतुलित होगी।
(लेखक नई दिल्ली स्थित ICAR-राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र एवं नीति अनुसंधान संस्थान से जुड़े हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)
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