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Home› Dugdhshala› Up Tribal Women Are Scripting Success Stories By Joining Shgs And Working With Mahua And Millets Earning Lak

UP: पहले रोजगार की कमी, अब लाख रुपये तक की कमाई, महुआ और मोटे अनाज ने ऐसे बदली महिलाओं की जिंदगी...

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Sun, 12 Jul 2026 08:03 PM IST
सार

  • सोनभद्र की महिलाएं महुआ और श्रीअन्न के उत्पाद बनाने का काम कर रही हैं।
  • स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़कर महिलाओं को रोजगार और कारोबार का मौका मिला है।
  • महुआ के लड्डू, मिलेट कुकीज और नमकीन जैसे उत्पाद बाजार में बेचे जा रहे हैं।

महुआ और मोटे अनाजों से महिलाओं ने शुरू किया व्यापार
महुआ और मोटे अनाजों से महिलाओं ने शुरू किया व्यापार - फोटो : गांव जंक्शन (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और आसपास के जनजातीय इलाकों की महिलाएं महुआ और श्रीअन्न से उत्पाद बनाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार की सीमा से सटे इन क्षेत्रों में कभी बुनियादी सुविधाओं का अभाव था, लेकिन अब राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की मदद से यहां की आदिवासी महिलाएं सफल ग्रामीण उद्यमी बन रही हैं।

विकास और सुविधाओं से बदली तस्वीर
सोनभद्र की मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) जागृति अवस्थी के अनुसार, यह क्षेत्र पहले विकास की कई चुनौतियों और रोजगार की कमी से जूझ रहा था। सरकार की ओर से सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा जैसी सुविधाओं के विस्तार और सरकारी योजनाओं की पहुंच के बाद हालात बदले हैं। उनके मुताबिक, जिन गांवों में विकास की रफ्तार धीमी थी, वहां अब महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पाद बाजार तक पहुंच रहे हैं, जिससे परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।

श्रीअन्न से बन रहे कई पौष्टिक उत्पाद
सरकारी पहल के तहत महिलाओं को प्रशिक्षण, आर्थिक मदद और पैकेजिंग की सुविधाएं दी जा रही हैं। इसके चलते श्रीअन्न अब केवल खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत हिस्सा बन गया है। एसएचजी से जुड़ी महिलाएं रागी मिलेट लड्डू, अलसी के लड्डू, मिलेट कुकीज, मिलेट बिस्किट और मिलेट नमकीन जैसे कई पौष्टिक उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों की स्थानीय बाजार में अच्छी मांग है, जिससे रोजगार के नए अवसर भी बढ़े हैं।

घोरावल में महिलाएं कर रहीं 50 हजार तक की बिक्री
सोनभद्र के घोरावल विकास खंड में 'दुर्गा स्वयं सहायता समूह' की 15 से अधिक महिलाएं मिलेट्स से जुड़े खाद्य उत्पाद बना रही हैं। यह समूह हर महीने 40 से 50 हजार रुपये के उत्पाद बेचता है। इस बिक्री से समूह की प्रत्येक महिला को साल भर में करीब एक लाख रुपये तक की अतिरिक्त आमदनी हो रही है। यह समूह अब आसपास के गांवों की महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन गया है।

म्योरपुर में महुआ और सांवा बना रोजगार का माध्यम
सोनभद्र के आदिवासी बहुल म्योरपुर विकास खंड के लिलासी गांव में 'खुशबू आजीविका स्वयं सहायता समूह' भी इसी बदलाव का उदाहरण है। समूह की सदस्य सुनीता देवी के मुताबिक, उनकी टीम की 14 महिलाएं मिलकर महुआ के लड्डू और सांवा जैसे पारंपरिक उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों को स्थानीय बाजार के अलावा बाहर से भी ऑर्डर मिल रहे हैं। इस समूह में सुनीता के साथ प्रियंका, संगीता, जिरमन, सोनकुंवर, पुष्मतिया, मलावती, हीरामनी और रीना जैसी महिलाएं शामिल हैं।

सीडीओ जागृति अवस्थी ने बताया कि ग्रामीण आजीविका मिशन के जरिए महिलाओं को केवल आर्थिक गतिविधियों से ही नहीं, बल्कि स्वरोजगार और कौशल विकास से भी जोड़ा जा रहा है। इसी का नतीजा है कि जनजातीय क्षेत्रों की महिलाएं अपने उत्पादों के जरिए स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही हैं।


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