26 सितंबर से 10 अक्तूबर तक चलने वाले श्राद्ध पक्ष में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध-पिंडदान जैसे रीति रिवाज पूरे करते हैं। वहीं, श्राद्ध पक्ष के दौरान भोजन, वस्त्र और अन्न दान भी लाभकारी माना जाता है। इस पक्ष में लोग गायों को पूड़ी, हलवा और दूसरी तेल के पकवान भारी मात्रा में खिलाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह खाना गायों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। दरअसल खाद्य तेल से बने भोजन खाने से गोवंश रूमन एसिडोसिस की चपेट में आ सकते हैं। पेट में बनने वाला यह एसिड गायों की आंतो में एडिट को काफी ज्यादा बढ़ा देता है, जिससे गायों के पाचन तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है।
इस बीमारी के गंभीर होने पर तेजाब खून में मिल सकता है। ऐसी स्थिति में गोवंश के फेफड़े और दिल काम करना बंद कर देते हैं, जिससे उन्हें सांस लेने में भारी दिक्कत होने लगती है और आखिर में मौत भी हो सकती है।
कैसे शरीर को नुकसान पहुंचाता है तैलीय भोजन?
अमर उजाला कि रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा पशुपालन एवं डेयरी विभाग के निदेशक डॉ. प्रेम सिंह कहते हैं कि गायों के पेट में भोजन को पचाने के लिए कुछ सूक्ष्म जीव काम करते हैं। जब गायों को पूड़ी या हलवा जैसा खाद्य तेल से पका भोजन दिया जाता है, तो इन सूक्ष्म जीवों पर वसा (चिकनाई/फैट) की एक परत चढ़ जाती है। इस वजह से ये जीव अपना काम करना और भोजन पचाना बंद कर देते हैं और गोवंश के पेट में गैस बनने लगती है।
बीमारी के लक्षण कैसे पहचानें?
इस समस्या की चपेट में आने पर गोवंश में कुछ खास लक्षण दिखाई देते हैं। अगर गाय अपना सिर नीचे करके बैठी है, चलते समय लंगड़ा रही है या फिर बैठकर जुगाली नहीं कर रही है, तो यह बीमारी का संकेत हो सकता है। इसके अलावा, बीमार गोवंश का पेट फूल जाता है और उसके पेट से पानी जैसी आवाज आने लगती है। इस स्थिति में दुधारू गायों का दूध उत्पादन भी घट जाता है। वे सुस्त हो जाती हैं और चारा खाना कम कर देती हैं।
लक्षण दिखने पर क्या करें प्राथमिक उपचार?
गोवंश में बीमारी के लक्षण दिखने पर तुरंत उनका प्राथमिक उपचार किया जाना चाहिए। उपचार के रूप में पीड़ित गाय को गुनगुने पानी के साथ 50 से 100 ग्राम तक मीठा सोडा देना चाहिए। इसके साथ ही, इस दौरान गोवंश को भोजन में केवल सूखी घास या सूखी तूड़ी ही खाने को दें। इस उपाय से गोवंश का हाजमा दोबारा दुरुस्त होने में मदद मिलेगी।