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Study Climate Has Played A Role In Shaping Civilization Culture Agriculture Society And Dynasties
CLIMATE CHANGE: सभ्यता, संस्कृति, कृषि, समाज और राजवंशों को आकार देने में रही है जलवायु की भूमिका
डॉ. निमिष कपूर
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 20 Dec 2024 10:01 AM IST
सार
पिछले 2000 साल के कालखंड में सभ्यता, संस्कृति, कृषि एवं समाज को आकार देने के साथ-साथ कई राजवंशों के बनने और बिगड़ने में भी जलवायु परिवर्तन का योगदान रहा है। इतिहास के इन परिवर्तनों से सबक लेकर भविष्य की मजबूत राह तैयार की जा सकती है।
कई भारतीय राजवंशों के बनने और बिगड़ने में भी जलवायु ने अहम भूमिका निभाई है।
- फोटो : गांव जंक्शन
हजारों सालों से जलवायु में बदलाव होते रहे हैं और इस बदलती जलवायु के कारण अलग-अलग कालखंड की वनस्पतियां, मानसून का स्वरूप, कृषि, सामाजिक व्यवस्था, सत्ता और मानव इतिहास बदलता रहा है। यहां तक कि कई भारतीय राजवंशों के बनने और बिगड़ने में भी जलवायु ने अहम भूमिका निभाई है। गुप्त साम्राज्य और गुर्जर प्रतिहार जैसे शक्तिशाली राजवंशों का उत्थान और पतन जलवायु परिवर्तनों से जुड़ा हुआ था। समय के साथ होते रहे इन बदलावों के निशान पुरातन जलवायु की परतों में आज भी दफ़न हैं, जिन्हें पुराविज्ञानी अपने गहन अध्ययन के जरिए वर्तमान समय और समाज के सामने उजागर करते रहते हैं, ताकि हम इतिहास से सबक सीखकर भविष्य के पर्यावरण, कृषि और समाज के लिए एक मजबूत जमीन तैयार कर सकें।
मानव इतिहास में जलवायु की भूमिका
लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने भारतीय उपमहाद्वीप में पिछले 2,000 वर्षों के ग्रीष्मकालीन मानसून पैटर्न का विश्लेषण करके इतिहास की परतों में छिपे इसी तरह के सबक अपने अध्ययन में उजागर किए हैं। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अंजली त्रिवेदी के नेतृत्व किए गए इस अध्ययन में पाया गया है कि जलवायु से प्रेरित वनस्पतीय परिवर्तनों ने पिछले 2000 वर्षों के कालखंड में भारतीय उपमहाद्वीप में मानव इतिहास को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है। जलवायु परिवर्तन से लड़ने के साथ इसके शमन के तरीके खोजने के लिए वैज्ञानिक प्रयास कर रहे हैं। ऐतिहासिक जलवायु पैटर्न को समझकर भविष्य में संभावित बदलावों की भविष्यवाणी करने के लिहाज से इस अध्ययन को अहम माना जा रहा है।
पुरातन जलवायु का अध्ययन भविष्य की चुनौतियों से लड़ने में सहायक हो सकता है।
- फोटो : गांव जंक्शन
उत्थान और पतन में भूमिका
विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में जलवायु में गर्म और ठंडे प्रकरण आते रहे हैं, जिनमें रोमन वॉर्मिंग पीरियड, डार्क एज कोल्ड पीरियड, मध्यकालीन गर्म अवधि और लघु हिमयुग शामिल हैं। इन परिवर्तनों ने वनस्पति और खेती के पैटर्न को प्रभावित किया, जिससे मानव समाज पर भी असर पड़ा। इन बदलावों के कारण मानव प्रवास (माइग्रेशन) हुआ। गुप्त साम्राज्य और गुर्जर प्रतिहार और चोल साम्राज्य जैसे शक्तिशाली राजवंशों के उत्थान और पतन का हवाला देते हुए, शोधकर्ताओं ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन ने प्रमुख भारतीय राजवंशों के उत्थान और पतन को प्रभावित किया है। जैसे-जैसे मानसून कमजोर हुआ और सूखा पड़ा, इन राजवंशों को संघर्षों और आंतरिक विघटन का सामना करना पड़ा, जो अंततः उनके पतन का कारण बना।
अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि पिछली दो सहस्राब्दियों के दौरान कई महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं ने भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यता और संस्कृति को प्रभावित किया है, जिसके कारण मानव समाजों को अपनी बस्तियों को स्थानांतरित करने के लिए बाध्य होना पड़ा। उदाहरण के लिए, गुप्त साम्राज्य (1710–1400 वर्ष पूर्व) और गुर्जर प्रतिहार (1200-860 वर्ष पूर्व) जैसे राजवंशों का उत्थान और पतन मुख्य रूप से जलवायु परिस्थितियों और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की स्थिति पर काफी हद तक निर्भर था। 1480 साल पहले हूण आक्रमणकारियों का मध्य एशिया से आकर भारत पर आक्रमण करना भी यहां की अनुकूल जलवायु परिस्थितियों और मध्य एशिया में उत्पन्न हुई शुष्क जलवायु परिस्थितियों के कारण हुआ था। इसी तरह, 949 साल पहले मुहम्मद गजनवी का आक्रमण और 777 साल पहले चोल साम्राज्य का पतन भी जलवायु परिवर्तन और वैश्विक गर्मी के कारण हुआ था।
भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया के पुरातन जलवायु अध्ययनों के वितरण को दर्शाता मानचित्र।
- फोटो : डॉ. अंजलि त्रिवेदी
जलवायु के साथ बदली दुनिया
रोमन वॉर्मिंग पीरियड (2500-1600 वर्ष पूर्व) में, जो दुनिया के सबसे गर्म दौर में से एक था, भारतीय उपमहाद्वीप में अधिक वर्षा हुई। इस दौरान पश्चिमी क्षत्रप (1915–1535 वर्ष पूर्व) जो इंडो-सीथियन (शक) शासक थे, के शासनकाल के दौरान जलवायु ने वर्षा को बढ़ावा दिया, लेकिन धीरे-धीरे तापमान के बदलावों ने सूखा, बाढ़, और समुद्री स्तर में वृद्धि जैसे संकटों को जन्म दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि कई प्रमुख बंदरगाह जैसे भरूच, जो व्यापार के लिए अहम थे, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुए। इसके बाद, डार्क एज कोल्ड पीरियड (1600-1050 वर्ष पूर्व) में उत्तरी गोलार्ध में शीत जलवायु का दौर प्रारंभ हुआ। इस काल के आरंभिक चरण में गुप्त साम्राज्य (1710-1400 वर्ष पूर्व) की समृद्धि चरम पर थी। परंतु डार्क एज कोल्ड पीरियड के उत्तरार्ध में भारत ने लगातार सूखे का सामना किया, जिससे साम्राज्य को आर्थिक क्षति पहुंची। इन विपरीत परिस्थितियों के साथ-साथ उत्तर से हूणों के आक्रमण ने गुप्त साम्राज्य के पतन को सुनिश्चित कर दिया।
मध्यकालीन गर्म अवधि (1050-650 वर्ष पूर्व) में दक्षिण भारत का चोल साम्राज्य समुद्री व्यापार का सर्वोच्च केंद्र बन गया। लेकिन, इस काल के अंत में समुद्र स्तर में वृद्धि और मानसून की अस्थिरता ने चोल साम्राज्य के व्यापार को गंभीर क्षति पहुंचाई। इससे उत्पन्न आर्थिक संकट ने साम्राज्य को कमजोर कर दिया। लिटिल आइस एज या लघु हिमयुग (650-100 वर्ष पूर्व) के दौरान, विजयनगर और मुग़ल साम्राज्य ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेला। विजयनगर साम्राज्य ने 14वीं सदी में अच्छे मौसम की स्थिति का लाभ उठाया, लेकिन 17वीं सदी के अंत में सूखे की घटनाओं ने इसे कमजोर कर दिया। मुग़ल साम्राज्य भी जलवायु परिवर्तन के असर से बच नहीं सका और उसकी कृषि, अकाल और सामाजिक संकटों से घिरी रही।
गंगा के मैदान में दबी तलछट
परागकणों की जीवाश्म और अन्य पुरातात्विक डाटा की मदद से पुरातन जलवायु रिकॉर्ड के आधार पर गंगा के मैदान में पिछली दो सहस्राब्दियों के दौरान वनस्पति पैटर्न और जलवायु में होने वाले परिवर्तनों का विस्तार से अध्ययन किया गया है। इस शोध में, शोधकर्ताओं ने एक खास मॉडल का भी सहारा लिया गया है, जो जलवायु परिवर्तन और उसके कारण वनस्पतियों पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ-साथ मानव इतिहास को बेहतर समझने में मदद करता है। इसी से पता चला है कि भारतीय उपमहाद्वीप में जलवायु परिवर्तन ने केवल पर्यावरण, बल्कि मानव सभ्यताओं और राजवंशों को भी प्रभावित किया है। इस अध्ययन में, उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित सरसपुखरा झील से निकाले गए तलछट और परागकणों (जो मिट्टी और तलछट में फूलों के जीवाश्म के रूप में संरक्षित होते हैं) के विश्लेषण और अन्य जैविक संकेतकों के उपयोग से शोधकर्ताओं ने पिछले 2000 वर्षों के जलवायु पैटर्न को समझने के लिए उसका पुनर्निर्माण किया है। इसके साथ ही, भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाओं के साथ जलवायु परिवर्तनों के संबंध का अध्ययन किया गया है।
भविष्य के लिए सबक
शोधकर्ताओं ने पाया है कि 1800 से 1600 वर्ष पहले इस क्षेत्र में मजबूत भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून था, जबकि 1600 से 1350 वर्ष पहले इस मानसून की स्थिति मध्यम थी। करीब 1350 से 1200 वर्ष पहले, मानसून की स्थिति कमजोर हो गई, जिसके परिणामस्वरूप सूखा और शुष्क वनस्पति ने वर्चस्व बनाया। इस दौरान बबूल, सेमल और आम जैसे कई महत्वपूर्ण वनस्पति समूहों में बदलाव हुआ। इस बात से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल पर्यावरण और वनस्पति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह मानव सभ्यता के विकास और पतन की प्रक्रिया को भी आकार देता रहा है। इसीलिए, ऐतिहासिक जलवायु पैटर्न को समझना आज के जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
यह अध्ययन न केवल ऐतिहासिक जलवायु पैटर्न की जानकारी प्रदान करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे जलवायु परिवर्तन कृषि और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव डाल सकता है। कृषि पद्धतियों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढालकर, अधिक उपयुक्त फसलों की पहचान करने से उत्पादकता को बनाए रखने में मदद मिल सकती है और आर्थिक लचीलापन, आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित किया जा सकता है।
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