जलवायु परिवर्तन-शहरीकरण जैसे कारकों के अलावा वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए युद्ध भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं। हाल ही में अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन युद्ध ने खेत से थाली तक की पूरी खाद्य सप्लाई को चोट पहुंचाने का काम किया है।
युद्ध की भेंट चढ़ी खेत, करोड़ों की भूख शांत होती...
नेचर फूड में छपे एक अध्ययन के अनुसार, साल 2000 से 2020 के बीच युद्ध वाले इलाकों में करबी 2.49 लाख वर्ग किलोमीटर खेती की जमीन तबाह हो गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इस बर्बाद हुई जमीन में इतना अनाज पैदा हो सकता था, जिससे दुनियाभर के 25.5 करोड़ लोगों की सालाना न्यूनतम भोजन जरूरत को पूरी की जा सकती थी।
6 प्रतिशत खेती-बाड़ी की जमीन युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में
रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध प्रभावित क्षेत्र पूरी दुनिया की कुल जमीन का सिर्फ 3 प्रतिशत हैं, लेकिन साल 2020 में दुनिया की 6 प्रतिशत से अधिक खेती-बाड़ी की जमीन इन्हीं इलाकों में थी। शांति वाले इलाकों की तुलना में इन अशांत क्षेत्रों में खेती का नुकसान 23.7 प्रतिशत अधिक रहा। इसका सबसे बुरा असर पश्चिमी और पूर्वी अफ्रीका के संग दक्षिण-पूर्व एशिया में देखने को मिला।
बारूदी सुरंगों और तबाही से यूक्रेन की खेती को नुकसान
यूक्रेन यूरोप की खाद्य जरूरत को पूरा करने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन , CSIS की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध की वजह से साल 2025 के मुकाबले साल 205 में यूक्रेन से अनाज के निर्यात में करीब 35 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली।
संस्था के मुताबिक, यूक्रेन की लगभग 10 लाख हेक्टेयर खेती की जमीन पर लैंडमाइंस का खतरा मंडरा रहा है। इसके अलावा, काखोवका बांध के टूट जाने से 6 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई व्यवस्था ठप हो गई। यह कारण है कि एक बार युद्ध की जद में आने वाली जमीन पर दोबारा फसल उगाना काफी मुश्किल हो जाता है
भारत के खाद उत्पादन और निर्यात पर भी दबाव
अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद खाद के लिए आयात पर निर्भर देशों के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी हो गई थी। तैयार खाद के अलावा गैस की सप्लाई पर असर पड़ने से भारत का मासिक यूरिया उत्पादन लुढ़क गया था। इस तनाव ने भारत के कृषि निर्यात को भी झटका पहुंचाया है।
महंगाई और अनाज उत्पादन में गिरावट की आशंका
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के आंकड़ों के अनुसार, मार्च-अप्रैल 2026 में दुनिया भर में खाने वाले तेल की कीमतों में 5.1 प्रतिशत और गेहूं के दाम में 4.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। संगठन के मुताबिक, वर्तमान में दुनिया भर के करीब 31.8 करोड़ लोग गंभीर रूप से खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। हालात को देखते हुए एफएओ ने अनुमान जताया है कि वर्ष 2026 में पूरी दुनिया के कुल अनाज उत्पादन में 2.1 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।