राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला तुम्बा किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन सकता है। कड़वे फल वाली इस बेल को स्थानीय स्तर पर इंद्रायण के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की पत्रिका इंडियन हॉर्टिकल्चर के सितंबर-अक्टूबर 2026 के अंक में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, तुम्बा में औषधीय उपयोग की संभावनाएं हैं। कम पानी और अधिक तापमान में जीवित रहने की इसकी क्षमता को देखते हुए सूखे और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में इसके उत्पादन और व्यावसायिक उपयोग की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।
कम पानी और रेतीली मिट्टी में भी उग सकता है तुम्बा
आईसीएआर के शोध के मुताबिक, तुम्बा एक ऐसा औषधीय पौधा है जिसका अभी तक पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाया है। इसकी खासियत यह है कि यह कम पानी, अधिक तापमान और कम उपजाऊ मिट्टी में भी जीवित रह सकता है। इस वजह से पश्चिमी राजस्थान जैसे सूखे और रेतीले इलाकों में इसके उत्पादन की संभावनाएं हैं।
जिन क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण खेती करना चुनौतीपूर्ण होता है, वहां तुम्बा एक उपयोगी विकल्प बन सकता है। हालांकि, इसके उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए खेती की उपयुक्त तकनीक और पैदावार से जुड़े पहलुओं पर काम करना जरूरी होगा।
तुम्बा में मिले औषधीय गुण, वैज्ञानिक जांच जरूरी
शोध के अनुसार, तुम्बा में कई तरह के जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। इसके अर्क में मधुमेहरोधी, रेचक, सूजनरोधी और रोगाणुरोधी गुणों की संभावनाएं सामने आई हैं। इसी वजह से आयुर्वेद और दूसरी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है।
हालांकि, इन संभावित औषधीय गुणों को आधुनिक चिकित्सा में प्रमाणित उपचार मानने से पहले वैज्ञानिक जांच जरूरी है। शोध में इसकी प्रभावशीलता, सुरक्षित खुराक और संभावित दुष्प्रभावों का आकलन करने की जरूरत बताई गई है। इसलिए, मधुमेह या किसी अन्य बीमारी के इलाज के लिए चिकित्सकीय सलाह के बिना तुम्बा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
व्यावसायिक खेती और प्रसंस्करण से बढ़ सकती है कीमत
आईसीएआर के शोध के मुताबिक, तुम्बा की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देकर इसके आर्थिक उपयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए उपयुक्त किस्मों की पहचान, खेती की सही तकनीक, पैदावार बढ़ाने के उपाय और प्रसंस्करण पर काम करने की जरूरत है। इसके साथ ही बाजार में इसकी मांग को समझना भी जरूरी होगा।
तुम्बा से जुड़े उपयोगी घटकों का प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन करके बाजार में उतारा जाए, तो इस वनस्पति का आर्थिक महत्व बढ़ सकता है। इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलने की संभावना है।
स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बन सकते हैं
शोध के अनुसार, तुम्बा का बेहतर व्यावसायिक उपयोग किसानों की आय बढ़ाने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने में भी मदद कर सकता है। इसके लिए केवल प्राकृतिक रूप से उगने वाले पौधे पर निर्भर रहने के बजाय इसकी खेती, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच बनाने पर ध्यान देना होगा। हालांकि, इसके लिए उपयुक्त खेती तकनीक विकसित करने और बाजार की मांग के अनुरूप काम करने की जरूरत होगी। इन पहलुओं पर काम होने से राजस्थान के सूखे और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में तुम्बा के आर्थिक उपयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है।