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पशुपालन संग ऊर्जा उत्पादन: 125 घरों को बायोगैस सप्लाई, किसान की बढ़ी कमाई, LPG से आधी लागत में बनता है खाना

गांव जंक्शन डेस्क, गुवाहाटी Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 06 Apr 2026 08:53 PM IST
सार

यूपी के एक गांव में किसान आधारित मॉडल ने खेती और पशुपालन को ऊर्जा से जोड़ते हुए मिसाल पेश की है। गोबर से तैयार बायोगैस के जरिये 125 से अधिक घरों में सस्ती व स्वच्छ रसोई गैस उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे किसानों की आय और गांव की आत्मनिर्भरता दोनों बढ़ी हैं। जानिए, विस्तार से...

रोजाना 3000 किलो गोबर को प्रोसेस करके यह प्लांट 125 घरों को पाइपलाइन से गैस पहुंचाता है।
रोजाना 3000 किलो गोबर को प्रोसेस करके यह प्लांट 125 घरों को पाइपलाइन से गैस पहुंचाता है। - फोटो : एआई
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विस्तार
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यह कहानी उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के गांव एकौनी गांव की है, जहां पशुपालन संग ऊर्जा उत्पादन का एक अनोखा मॉडल सामने आया है। यहां पशुपालन से निकलने वाले गोबर को बायोगैस में बदलकर गांव की रसोई तक पहुंचाया जा रहा है। यह पहल स्थानीय किसान परिवार की सोच और तकनीकी सहयोग का परिणाम है।

200 गायों की डेयरी बनी ऊर्जा का आधार
स्थानीय किसान नागेंद्र प्रताप सिंह पिछले कई वर्षों से करीब 200 गायों की डेयरी का संचालन कर रहे हैं। पहले गोबर निस्तारण बड़ी समस्या थी, लेकिन अब यही गोबर ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बन गया है। उनके बेटे चंद्रप्रकाश सिंह ने तकनीकी समाधान खोजते हुए बायोगैस प्लांट की स्थापना करवाई। 

125 घरों में हो रही गैस सप्लाई
वर्ष 2016 में शुरू हुई इस परियोजना को एक पुणे स्थित कंपनी के सहयोग से विकसित किया गया, जिसकी लागत करीब 85 लाख रुपये रही। यह बायोगैस प्लांट रोजाना करीब 3000 किलोग्राम गोबर प्रोसेस करता है और 125 परिवारों को पाइपलाइन के जरिए गैस उपलब्ध कराता है। सुबह और शाम 2.5-2.5 घंटे गैस सप्लाई होती है और प्रति माह खर्च करीब 400 रुपये आता है, जो LPG से लगभग आधा है।

खेती और पर्यावरण को दोहरा लाभ
इस मॉडल से न केवल किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा हुआ है। गोबर से निकलने वाली मीथेन गैस को कैप्चर कर स्वच्छ ईंधन के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे प्रदूषण में कमी आई है।

बढ़ा रोजगार, बढ़ी आत्मनिर्भरता 
इस परियोजना से गांव में रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं और आसपास के गांवों के लोग भी इस मॉडल को अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं। करीब 25 नए घर हाल ही में इस बायोगैस नेटवर्क से जुड़े हैं। यह पहल दिखाती है कि खेती और पशुपालन को तकनीक से जोड़कर ऊर्जा, आय और पर्यावरण - तीनों क्षेत्रों में सुधार किया जा सकता है। यह मॉडल ग्रामीण भारत में आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास का मजबूत उदाहरण बनकर उभरा है।
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