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क्या सलाद बन सकता है सेहत का दुश्मन?: फल-सब्जियों से कैंसर के दावे की क्या है हकीकत, जानिए पूरी सच्चाई

जस्टिन स्टेबिंग Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 12 May 2026 02:36 PM IST
सार

सुबह का नाश्ता हो या रात का खाना - माताएं हमेशा कहती रही हैं, "हरी सब्जी खाओ, फल खाओ, तंदुरुस्त रहोगे।" दशकों से विज्ञान भी यही कहता आया है। लेकिन, कुछ समय पहले एक अध्ययन ने ऐसा दावा किया, जिसने दुनियाभर के लोगों की नींद उड़ा दी। इसमें दावा किया गया कि फल और सब्जियां युवाओं में फेफड़े के कैंसर की वजह बन सकती हैं। सोशल मीडिया पर यह खबर जंगल की आग की तरह फैली। लेकिन, क्या वाकई आपकी थाली में जहर है? आइए परत-दर-परत समझते हैं…

बड़े और विश्वसनीय शोध बताते हैं कि फल-सब्जियां कैंसर का कारण नहीं, बल्कि उससे बचाव का प्रभावी माध्यम हैं।
बड़े और विश्वसनीय शोध बताते हैं कि फल-सब्जियां कैंसर का कारण नहीं, बल्कि उससे बचाव का प्रभावी माध्यम हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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एक अध्ययन ने दावा किया कि फल और सब्जियां युवाओं में फेफड़े के कैंसर की वजह बन सकती हैं। इस दावे ने दुनियाभर में हलचल मचा दी। लेकिन, विशेषज्ञ इस निष्कर्ष को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा नहीं मानते। अध्ययन में सिर्फ 187 मरीज थे, कीटनाशकों का प्रत्यक्ष माप नहीं हुआ और निष्कर्ष अनुमान पर आधारित था। दशकों के बड़े और विश्वसनीय शोध अब भी यही कहते हैं कि फल और सब्जियां कैंसर का कारण नहीं, बल्कि उससे बचाव का सबसे भरोसेमंद जरिया हैं।

वह अध्ययन, जिसने मचाई सनसनी
यह सारा हंगामा एक छोटे से शोध से शुरू हुआ, जिसमें केवल 187 ऐसे युवाओं को शामिल किया गया था, जिन्हें फेफड़े का कैंसर हुआ था। इनमें से अधिकांश धूम्रपान नहीं करते थे। जब उनसे खानपान के बारे में पूछा गया तो कई ने बताया कि वे भरपूर मात्रा में फल, सब्जियां और साबुत अनाज खाते थे। बस इसी से शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इन खाद्य पदार्थों में मौजूद कीटनाशकों के अवशेष कैंसर से जुड़े हो सकते हैं और फिर शुरू हो गया विवाद।

अनुमान को बना दिया अध्ययन का निष्कर्ष
यहीं पर विज्ञान और सनसनी के बीच की लकीर खिंचती है। इस अध्ययन में कीटनाशकों का प्रत्यक्ष और वैज्ञानिक माप नहीं किया गया। शोधकर्ताओं ने केवल औसत आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया कि इन खाद्य पदार्थों में संभावित रूप से कीटनाशक रहे होंगे। यह वैसा ही है जैसे किसी के घर के पास अस्पताल होने से यह मान लिया जाए कि अस्पताल ही बीमारी का कारण है।

इसके अलावा, यह अध्ययन पूर्वव्यापी था यानी पहले से बीमार पड़ चुके लोगों से उनकी पुरानी आदतों के बारे में पूछा गया। इस तरह के अध्ययन यह कभी साबित नहीं कर सकते कि बीमारी का असली कारण क्या था। इसमें स्मृति की चूक, अन्य जीवनशैली कारक और संयोग जैसे सभी का प्रभाव हो सकते हैं।

दशकों का विज्ञान बनाम एक छोटा अध्ययन
एक तरफ यह 187 लोगों का अध्ययन है, दूसरी तरफ दशकों से हजारों-लाखों लोगों पर किए गए दीर्घकालिक शोध हैं। ये बड़े अध्ययन बार-बार, लगातार और स्पष्ट रूप से यही नतीजा देते हैं कि जो लोग पौधों पर आधारित भोजन अधिक करते हैं, वे न केवल अधिक स्वस्थ रहते हैं बल्कि लंबा जीवन भी जीते हैं। उनमें हृदय रोग, स्ट्रोक और कई प्रकार के कैंसर का खतरा भी कम पाया गया है। छोटे अध्ययनों में संयोग और अन्य कारकों का प्रभाव कहीं ज्यादा होता है, इसलिए उनके आधार पर बड़े निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।

कीटनाशकों की चिंता जायज, लेकिन घबराएं नहीं 
यह सच है कि फल और सब्जियों पर कीटनाशकों के कुछ अवशेष रह सकते हैं। यह भी सच है कि जो लोग लंबे समय तक और बड़ी मात्रा में इनके सीधे संपर्क में आते हैं - जैसे खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर, जिनमें कुछ बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन, यहां खुराक और संपर्क की मात्रा निर्णायक भूमिका निभाती है। घर में आम नागरिक जितनी मात्रा में फल और सब्जियां खाता है, उससे उसे कैंसर होगा - यह दावा विज्ञान की कसौटी पर टिकता नहीं है।

तो क्या करें - थाली से सलाद हटाएं या नहीं?
जवाब साफ है - बिल्कुल नहीं। बल्कि फल और सब्जियां धोकर खाएं, जैविक विकल्प उपलब्ध हों तो अपनाएं, लेकिन घबराकर इन्हें खाना बंद करने की भूल न करें। संतुलित और पौधों पर आधारित आहार ही बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में सबसे भरोसेमंद और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध विकल्प है। एक छोटे, अपूर्ण अध्ययन की सनसनीखेज व्याख्या के आधार पर मां की सदियों पुरानी सलाह को नहीं छोड़ना चाहिए। विज्ञान आज भी उन्हीं के साथ खड़ा है। -द कन्वर्सेशन
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