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महाराष्ट्र: गन्ने की पैदावार पर कंडुआ रोग की मार, 70% तक नुकसान संभव, वैज्ञानिकों ने किसानों को किया सतर्क

गांव जंक्शन डेस्क, पुणे Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 12 May 2026 02:55 PM IST
सार

महाराष्ट्र में गन्ने की फसल पर व्हिप स्मट रोग का खतरा बढ़ता जा रहा है। वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों के अनुसार, यह रोग रैटून फसल में अधिक नुकसान पहुंचाता है और उत्पादन में 70 प्रतिशत तक गिरावट ला सकता है। वैज्ञानिकों ने रोगमुक्त बीज, प्रतिरोधी किस्मों और समय पर फसल प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि कंडुआ रोग पौधा गन्ना और रैटून दोनों फसलों को प्रभावित करता है, लेकिन रैटून फसल में इसका असर अधिक गंभीर होता है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि कंडुआ रोग पौधा गन्ना और रैटून दोनों फसलों को प्रभावित करता है, लेकिन रैटून फसल में इसका असर अधिक गंभीर होता है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट के कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि व्हिप स्मट रोग महाराष्ट्र में गन्ने की फसल के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। पश्चिम महाराष्ट्र में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम है, जबकि खानदेश, मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों में रोग का प्रकोप अधिक देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में औसतन करीब 10 प्रतिशत गन्ना फसल इस रोग से प्रभावित होती है।

रैटून फसल को ज्यादा नुकसान
वैज्ञानिकों ने बताया कि यह रोग पौधा गन्ना और रैटून दोनों फसलों को प्रभावित करता है, लेकिन रैटून फसल में इसका असर अधिक गंभीर होता है। अध्ययनों के मुताबिक, व्हिप स्मट रोग से पौधा गन्ने की पैदावार में 29 प्रतिशत तक और रैटून फसल में 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इससे चीनी रिकवरी पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

इन किस्मों में ज्यादा प्रकोप
विशेषज्ञों के अनुसार, मराठवाड़ा क्षेत्र में Co 86032 और VSI 08005 जैसी गन्ना किस्मों में रोग के मामले अधिक सामने आए हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि गर्मियों के मौसम में रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ता है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।

वैज्ञानिकों ने किसानों को दी ये सलाह
डॉ. गणेश कोटगिरे, डॉ. ए. डी. कडलाग और जी. ई. आत्रे सहित वैज्ञानिकों ने किसानों को रोगमुक्त बीज सामग्री का उपयोग करने और प्रतिरोधी किस्मों को अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि बुवाई से पहले बीज सेट्स का फफूंदनाशी दवाओं से उपचार किया जाए और खेतों की नियमित निगरानी की जाए। संक्रमित पौधों को जड़ों सहित निकालकर नष्ट करने की भी सलाह दी गई है, ताकि रोग का फैलाव रोका जा सके।

सिंचाई और नमी प्रबंधन पर जोर
विशेषज्ञों ने किसानों को गर्मियों में नियमित सिंचाई करने, रैटून फसल में समय पर कृषि कार्य करने और फसल अवशेषों को मल्च के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि इन उपायों को अपनाकर किसान फसल नुकसान कम कर सकते हैं और उत्पादन के साथ चीनी रिकवरी भी सुरक्षित रख सकते हैं।
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