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From A Cowshed With 5 To 150 Cattle Earning Lakhs From Cow Dung And Cow Urine Alongside Milk
5 से 150 गोवंश की गोशाला तक : दूध संग गोबर और गोमूत्र से लाखों की कमाई, गोशाला में बनते हैं 18 तरह के उत्पाद
पंकज जोशी, कृषि पत्रकार
Published by: Devesh Saraswat
Updated Sun, 18 Oct 2026 01:16 PM IST
सार
महाराष्ट्र के बीड जिले में उमा औटे ने पांच गायों से शुरुआत कर आज 150 से ज्यादा गायों की बड़ी गोशाला खड़ी कर दी है। गोमूत्र, गोबर, पंचगव्य और दूध से कई उत्पाद बनाकर उन्होंने दिखाया है कि गाय पालन दूध के साथ ही कमाई के कई रास्ते खोल सकता है।
गोशाला के हर संसाधन के उपयोग से लाखों का कारोबार खड़ा किया।
- फोटो : गांव जंक्शन
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित बीड की पहचान लंबे समय तक गन्ना मजदूरों के जिले के तौर पर होती रही है। अब खेती के नए प्रयोग इस परंपरागत तस्वीर को बदल रहे हैं। इसी जिले के एक छोटी-सी गोशाला में कभी सिर्फ पांच गोवंश हुआ करते थे। एक व्यस्क गाय और चार बछड़े। सवाल था, इन्हें परिवार की कमाई का जरिया कैसे बनाया जाए? गोपालक उमा सुनील औटे के पास उस वक्त इसका जवाब नहीं था, लेकिन इन पांच गोवंश ने आगे चलकर उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। आज उनका नाम 'सार्थक सिद्धि' से जुड़ा है। गोमूत्र, गोबर, पंचगव्य और दूध से कई उत्पाद बनाकर उन्होंने साबित किया कि गाय से कमाई सिर्फ दूध तक सीमित नहीं रहती। बीड के सुशीवडगांव की रहने वाली उमा ने डी.एड. की पढ़ाई की थी और स्कूल में नौकरी भी की। गोपालन का उन्हें अनुभव नहीं था, लेकिन पति सुनील औटे की पशुपालन में रुचि के चलते घर में गायें आईं और धीरे-धीरे उमा का भी गोपालन से लगाव बढ़ता गया।
पांच दिन के प्रशिक्षण ने बदल दी सोच
पांच गायों से शुरू हुआ उमा सुनील औटे का यह सफर आज करीब 150 गायों की गोशाला तक पहुंच चुका है। लेकिन, इस कहानी की असली जान गायों की बढ़ती संख्या में नहीं, बल्कि गाय से मिलने वाले हर संसाधन की कीमत पहचानने में छिपी है। साल 2013 में उमा औटे को नागपुर की एक गोशाला में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। पति ने उन्हें यह कहकर साथ ले लिया था कि 'चलो, घूमने चलते हैं।' लेकिन, पांच दिन के इस प्रशिक्षण से लौटते वक्त उनके पास सिर्फ नया अनुभव नहीं था, बल्कि एक नए काम की दिशा भी थी। वहां उन्हें गोपालन, चारा उत्पादन, पंचगव्य से बनने वाले उत्पाद और गोपालन से कमाई के अलग-अलग तरीकों की जानकारी मिली। घर लौटकर उमा ने प्रयोग शुरू किए। शुरुआत बहुत छोटी थी। उन्होंने खुद दंतमंजन और साबुन बनाकर देखा और पहले खुद इस्तेमाल किया। जब भरोसा बैठा, तो दूध लेने आने वाले ग्राहकों को भी ये उत्पाद देने लगीं। यहीं से इस कहानी में पहला बड़ा मोड़ आया।
दूध के साथ गोमूत्र और गोबर की भी कीमत
किसान के लिए गाय का मतलब आमतौर पर होता है दूध, खेत के लिए खाद और खेती में काम आने वाला पशुधन। उमा औटे ने इसी सोच को थोड़ा आगे बढ़ाया। उन्होंने गोमूत्र से अर्क और स्प्रे तैयार किए। गोबर से खाद, वर्मी कम्पोस्ट और अग्निहोत्र के लिए गोबर की लकड़ियां बनाईं। गोबर से दंतमंजन, साबुन, फेसपैक, गोघृत, गोनाइल जैसी कई चीजें भी तैयार होने लगीं। गोबर से गणेश प्रतिमाएं और सजावटी सामान बनाने का सफल प्रयोग हुआ और पंचगव्य आधारित दंतमंजन, साबुन, फेसपैक पर भी काम किया गया। गोमूत्र से अर्क तैयार करने के लिए उन्होंने करीब 40 हजार रुपये की एक मशीन भी लगवाई। आज उनकी गोशाला में करीब 17 से 18 तरह के उत्पाद बनते हैं। एक ही गाय से मिलने वाले संसाधन को उन्होंने अलग-अलग उत्पादों में बदल दिया यानी एक संसाधन से कमाई के कई रास्ते खुल गए।
बाजार मिला विज्ञापन से नहीं, भरोसे से
गांव में कोई उत्पाद बनाना एक चुनौती है और उसे बाजार तक पहुंचाना दूसरी। कई किसान अच्छा उत्पाद तो तैयार कर लेते हैं, लेकिन ग्राहक तक पहुंच नहीं बना पाते। उमा औटे ने इस दिक्कत का रास्ता अलग ढंग से निकाला। पहले खुद उत्पाद इस्तेमाल किए, फिर दूध लेने आने वाले ग्राहकों और गो-प्रेमियों को इनके बारे में बताया। लोगों ने खरीदा, पसंद आया तो आगे और लोगों को बताया। इस तरह, धीरे-धीरे ग्राहकों की संख्या बढ़ती गई। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की मांग बढ़ी, तो उन्हें नए ग्राहक जोड़ने का मौका मिला। वाट्सएप के जरिये ग्राहक समूह बनाए गए, आयुर्वेदिक डॉक्टरों और दूसरे लोगों से भी संपर्क साधा गया। हालांकि, उमा औटे का फेसबुक या किसी दूसरे सोशल मीडिया मंच पर कोई खाता ही नहीं है। फिर भी उन्होंने सिर्फ वाट्सएप के सहारे अपना पूरा ग्राहक नेटवर्क खड़ा कर लिया। उनके लिए मार्केटिंग का मतलब महंगा विज्ञापन नहीं, बल्कि सही ग्राहक तक सही उत्पाद पहुंचाना था।
गोबर से गणेश प्रतिमा तक
गोबर से बनी गणेश प्रतिमाएं इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा हैं, जो महाराष्ट्र के गणेश उत्सव को पर्यावरण अनुकूल बनाने की कोशिश भी हैं। शुरुआत में सांचे से प्रतिमा बनाना आसान नहीं रहा, इसलिए हाथ से मूर्ति बनाने का प्रयोग शुरू हुआ। इसमें कई अड़चनें आईं, लेकिन प्रयोग रुका नहीं। पहले सिर्फ 12-13 प्रतिमाएं बनाई गईं, लेकिन पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमा का यह विचार लोगों को खूब भाया और धीरे-धीरे मांग बढ़ने लगी। इन प्रतिमाओं की खासियत यह है कि इन्हें घर में ही बाल्टी, टब या गमले में विसर्जित किया जा सकता है, और बाद में उस पानी को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। आज बीड से निकलकर इन गणेश प्रतिमाओं की मांग छत्रपति संभाजीनगर, जालना, पुणे, सोलापुर और कोल्हापुर तक पहुंच चुकी है। कुछ संस्थाओं और आवासीय परिसरों ने भी इन्हें बड़ी संख्या में मंगाया। पुणे से एक प्रतिमा कनाडा तक भेजी गई, जहां इसे पर्यावरण-अनुकूल मूर्ति के तौर पर सम्मान मिला और वहां के एक स्थानीय अंग्रेजी अखबार में भी इसकी खबर छपी।
गोबर अब समस्या नहीं, कारोबार है
गांवों में पशुपालन के साथ बड़ी मात्रा में गोबर भी जमा होता है, जिसका निपटारा कई बार समस्या बन जाता है। लेकिन, उमा औटे की कहानी गोबर को कचरा नहीं, बल्कि कच्चे माल के तौर पर देखने की मिसाल है। वह बताती हैं कि गोबर से खाद, वर्मी कम्पोस्ट, गोबर की लकड़ियां, सजावटी सामान और गणेश प्रतिमाएं तक बनाई जा सकती हैं।
यहां खेती और पशुपालन के बीच एक दिलचस्प चक्र भी दिखता है। गोशाला के लिए करीब ढाई एकड़ जमीन पर हरा चारा उगाया जाता है, गर्मियों के लिए कड़बा (जवार-मकई), बाजरा, सोयाबीन, तुअर की भूसी और चने का भूसा जमा किया जाता है। पशुओं के गोबर से बनी खाद खेत में जाती है और खेत का चारा पशुओं के काम आता है; दोनों एक-दूसरे को सहारा देते हैं।
उमा का यह काम परिवार तक सीमित नहीं रहा, आसपास के लोगों को भी रोजगार मिला है। ग्रामीण महिलाओं के पास पारंपरिक हुनर तो होते ही हैं, बस जरूरत प्रशिक्षण, कच्चे माल, बाजार और संगठन की होती है। आज खेती में उत्पादन लागत, बाजार भाव और मौसम की अनिश्चितता जैसी चुनौतियां बनी रहती हैं, ऐसे में एक फसल या उत्पाद पर निर्भर रहने के बजाय पशुपालन, प्रसंस्करण, जैविक इनपुट और सीधी बिक्री को खेती से जोड़ना कमाई के कई आधार खड़े कर सकता है।
कमाई के आंकड़े बताते हैं दूसरा पहलू
करीब 150 पशुओं की देखभाल आसान नहीं है। चारा, पानी, स्वास्थ्य और रहन-सहन की पूरी व्यवस्था की जरूरत होती है। उमा औटे की गोशाला में इसके लिए अलग योजना बनाई गई है। साल भर चारा-पानी की उपलब्धता, जर्सी गायों-बछड़ों-बीमार पशुओं के लिए अलग व्यवस्था, पानी पीने के लिए हौद, और समय पर टीकाकरण-इलाज सब कुछ सुनिश्चित किया जाता है। उमा औटे बताती हैं, अकेले गोबर की खाद से करीब दो लाख रुपये और गणेश प्रतिमाओं की बिक्री से डेढ़ से दो लाख रुपये तक की कमाई हो जाती है। इसके अलावा, दूध और दुग्ध उत्पादों से भी आमदनी होती है।
बायोगैस और कृषि-पर्यटन शुरू करने की तैयारी
उमा औटे अब आगे की तैयारी में भी जुटी हैं। गोशाला में जमा होने वाले गोबर को देखते हुए एक बड़े बायोगैस प्रोजेक्ट की योजना है, साथ ही गोबर की खाद का बाजार और बड़ा करने की कोशिश भी जारी है। गोशाला परिसर में कृषि-पर्यटन केंद्र बनाने का भी विचार है। यह योजना आगे बढ़ती है, तो यह गोशाला सिर्फ पशुपालन की जगह नहीं रह जाएगी, बल्कि उत्पादन, प्रशिक्षण, पर्यटन और ग्रामीण अनुभव का पूरा केंद्र बन सकती है। उमा औटे की कहानी का मूल संदेश यही है कि किसानों को 'एक उत्पादन, एक आय' की सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है।
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