भारत ने दुनिया की सबसे बड़ी दुग्ध उत्पादन प्रणाली खड़ी की है, जो किसी बड़े औद्योगिक फार्म से नहीं, बल्कि लाखों छोटे और सीमांत किसानों की मेहनत से बनी है। भारत आज भी दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। वर्ष 2025-26 में भारत का दुग्ध उत्पादन करीब 26.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है। लेकिन, डेयरी क्षेत्र में भारत की सफलता की कहानी अब नए मोड़ पर खड़ी है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ज्यादा दुग्ध उत्पादन कैसे करें, बल्कि अब इस पर फोकस करने का समय है कि जो दुग्ध उत्पादन हो रहा है, उससे ज्यादा मूल्य कैसे प्राप्त करें। इससे भी अहम है कि उस मूल्य को किसानों की बेहतर आमदनी और वैश्विक बाजार में मजबूत पकड़ में कैसे बदला जाए।
निर्यात बढ़ा, पर आयात भी जारी
डेयरी व्यापार के आंकड़े कुछ अहम संकेत देते हैं। पिछले एक दशक में भारत का डेयरी निर्यात काफी बढ़ा है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव भी खूब रहा है। निर्यात का मूल्य 2015-16 के करीब 25.8 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 70 करोड़ डॉलर से ज्यादा हो गया। इससे भी दिलचस्प बात यह है कि भारत का डेयरी व्यापार एक अजीब विरोधाभास दिखाता है। भारत जहां डेयरी उत्पाद निर्यात करता है, वहीं कुछ खास डेयरी उत्पाद और इनग्रेडिएंट्स आयात भी करता है। वर्ष 2025-26 में डेयरी आयात करीब 9 करोड़ डॉलर का रहा। इसका मतलब यह नहीं कि भारत के पास दूध की कमी है। असली कमी दूध के उत्पादन के बाद की प्रक्रिया में है। भारत की डेयरी नीति अब तक दुग्ध उत्पादन बढ़ाने, पशुओं की उत्पादकता और किसानों की आय पर केंद्रित रही है, और ये सब जरूरी भी हैं। पर, अंतरराष्ट्रीय डेयरी बाजार को सिर्फ भरपूर दूध से ज्यादा चाहिए, उसे लगातार बनी रहने वाली गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा, ट्रेसेबिलिटी (उत्पाद के स्रोत से लेकर उसकी पूरी यात्रा का पता लगाना), भरोसेमंद आपूर्ति, कुशल प्रोसेसिंग, प्रतिस्पर्धी लागत और बाजार के हिसाब से उत्पाद बनाने की क्षमता चाहिए। यहीं भारत को चुनौती का सामना करना पड़ता है। किसान भले अच्छी गुणवत्ता का दूध पैदा करे, पर अगर दूध इकट्ठा करने की व्यवस्था कमजोर है, ठंडा रखने की सुविधा नाकाफी है, जांच भरोसेमंद नहीं है, प्रोसेसिंग महंगी है या ट्रेसेबिलिटी नहीं है, तो अंतिम उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता। इसलिए, निर्यात के सवाल को पूरी वैल्यू चेन में देखना होगा, जिसमें पशु स्वास्थ्य और चारे से लेकर दुग्ध संग्रहण, प्रोसेसिंग, प्रमाणन और लॉजिस्टिक्स तक शामिल है।
आयात में छिपा अधिक आय का अवसर
घरेलू उत्पादन की तुलना में भारत का डेयरी आयात बहुत मामूली है, पर उसकी संरचना बेहद अहम है। देश जो चीजें आयात करता है, जैसे व्हे और व्हे उत्पाद, कैसीन और उसके उपोत्पाद, खास किस्म के चीज़ और अन्य डेयरी इनग्रेडिएंट्स, ये वही उत्पाद हैं, जिनमें प्रति लीटर दूध से मिलने वाला मूल्य पारंपरिक उत्पादों से कहीं ज्यादा हो सकता है। यह भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर है। डेयरी आयात को सिर्फ घरेलू उत्पादकों के लिए प्रतिस्पर्धा मानने के बजाय नीति-निर्माताओं को यह पूछना चाहिए कि दुनिया के सबसे बड़े दूध भंडार वाला देश इन उच्च-मूल्य वाले इनग्रेडिएंट्स को प्रतिस्पर्धी तरीके से ज्यादा क्यों नहीं बना पाता? इसका जवाब तकनीक, प्रोसेसिंग क्षमता, पैमाने, उत्पाद विकास, गुणवत्ता प्रणाली और बाजार से जुड़ाव में छिपा है। इन कमियों को दूर करने से आयात पर निर्भरता भी घटेगी और साथ ही नए निर्यात अवसर भी बनेंगे।
मात्रा नहीं, मूल्य पर प्रतिस्पर्धा
भारत के लिए वैश्विक डेयरी बाजार के हर हिस्से पर दबदबा बनाना मुश्किल है। सामान्य वस्तुओं (कमोडिटी उत्पादों) के मामले में भारत को उन देशों से मुकाबला करना पड़ता है, जिनके पास बड़े पैमाने की उत्पादन प्रणाली, स्थापित निर्यात ढांचा और प्रोसेसिंग व लॉजिस्टिक्स लागत कम है। भारत को ज्यादा चुनिंदा निर्यात रणनीति चाहिए। घी, कुछ पारंपरिक डेयरी उत्पाद, विशिष्ट किस्म के चीज़, मिल्क प्रोटीन, व्हे उत्पाद और अन्य उच्च-मूल्य वाले डेयरी इनग्रेडिएंट्स जैसे उत्पादों को मजबूत करने की काफी गुंजाइश है, जहां भारत के पास पहले से क्षमता है या बढ़त हासिल करने की संभावना है। लक्ष्य हर चीज का ज्यादा निर्यात करना नहीं, बल्कि उन उत्पादों और बाजारों की पहचान करना होना चाहिए, जहां भारत टिकाऊ प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बना सके। इसके लिए बाजार की बेहतर जानकारी चाहिए। निर्यातकों को केवल दामों की नहीं, बल्कि उपभोक्ता की पसंद, नियामक जरूरतों, टैरिफ, स्वच्छता मानकों, प्रतिस्पर्धियों और लॉजिस्टिक्स लागत की भी जानकारी चाहिए। हर बाजार में बिना सोचे-समझे प्रतिस्पर्धा करने के बजाय मध्य-पूर्व, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य उभरते क्षेत्रों पर लक्षित रणनीति ज्यादा असरदार हो सकती है।
गुणवत्ता बने प्रतिस्पर्धात्मक ताकत
भारत को प्रमुख डेयरी निर्यातक देशों की सूची में मजबूत जगह बनाने के लिए गुणवत्ता को सिर्फ नियामक मुद्दा नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक ताकत बनाना होगा। अंतरराष्ट्रीय खरीदार अब खाद्य सुरक्षा, अवशेष, पशु स्वास्थ्य, ट्रेसेबिलिटी और एकरूपता की गारंटी चाहते हैं। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसी प्रणाली चाहिए, जो खेत से शुरू होकर निर्यात गंतव्य तक जाए। इसलिए, भारत को खेत-से-निर्यात तक मजबूत गुणवत्ता आश्वासन ढांचा चाहिए। सहकारी समितियां, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और निजी प्रोसेसर इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। छोटे उत्पादकों को एक साथ जोड़कर वे बेहतर पशु-स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्ता जांच, चिलिंग, ट्रेसेबिलिटी और तकनीक तक पहुंच आसान बना सकते हैं। यह खास तौर पर जरूरी है, क्योंकि छोटे किसानों पर आधारित भारत की डेयरी व्यवस्था को केवल एक कमजोरी नहीं समझना चाहिए। सही संस्थाएं अगर लाखों उत्पादकों को आधुनिक वैल्यू चेन से जोड़ दें, तो यह बड़ी ताकत बन सकती है।
निर्यात का फायदा किसान तक पहुंचे
निर्यात से किसानों को भी फायदा होना चाहिए। ऐसी निर्यात रणनीति का कोई औचित्य नहीं, जो विदेशी मुद्रा तो कमाए, पर डेयरी किसानों की आमदनी न बढ़ाए। असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक सकारात्मक चक्र बने। बेहतर उत्पादकता से बेहतर दुग्ध गुणवत्ता, फिर कुशल एकत्रीकरण, फिर ज्यादा मूल्यवर्धन, फिर मजबूत बाजार, और अंततः किसानों को ज्यादा व स्थिर आमदनी। निर्यात की मांग बेहतर आहार, पशु स्वास्थ्य और उत्पादकता बढ़ाने में किसानों को निवेश करने के लिए प्रेरित कर सकती है, बशर्ते गुणवत्ता में सुधार का इनाम उन्हें सही दाम के रूप में मिले। यहीं भारत की डेयरी व्यापार रणनीति को उसकी ग्रामीण विकास रणनीति से जोड़ना जरूरी हो जाता है।
पांच प्राथमिकताओं वाली रणनीति
भारत को अब डेयरी व्यापार के लिए स्पष्ट मध्यम-अवधि रणनीति चाहिए, जो पांच प्राथमिकताओं पर केंद्रित होनी चाहिए। पहली, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना। इसमें उत्पादकता, चारा, पशु स्वास्थ्य, प्रोसेसिंग दक्षता, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स लागत, सब मायने रखते हैं। दूसरी, मूल्यवर्धन को तेज करना। निवेश को पारंपरिक दुग्ध उत्पादों से आगे बढ़कर व्हे, मिल्क प्रोटीन, कैसीन, विशेष इनग्रेडिएंट्स, पोषण उत्पादों और विशिष्ट डेयरी खाद्य पदार्थों की ओर ले जाना चाहिए। तीसरी, गुणवत्ता और ट्रेसेबिलिटी मजबूत करना। अंतरराष्ट्रीय मानकों को सिर्फ अनुपालन की शर्त नहीं, बल्कि बाजार-सक्षम बनाने वाले ढांचे के रूप में देखा जाना चाहिए। चौथी, उत्पादों और बाजारों को रणनीतिक तरीके से लक्षित करना। भारत को यह पहचानना चाहिए कि वह लागत, गुणवत्ता, विविधता या निकटता के आधार पर कहां प्रतिस्पर्धा कर सकता है। पांचवीं, संस्थागत समन्वय मजबूत करना। दुग्ध उत्पादन, पशु स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, मानक, प्रोसेसिंग और व्यापार, ये सब अलग-अलग संस्थाओं द्वारा संभाले जाते हैं। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी डेयरी उद्योग के लिए इन सभी प्रणालियों को साथ मिलकर काम करना जरूरी है।
नई श्वेत क्रांति मूल्य की होगी
भारत यह साबित कर चुका है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बन सकता है। अगली श्वेत क्रांति अलग होनी चाहिए, यह मूल्य-वर्धन, तकनीक, गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता की क्रांति होनी चाहिए। भारत के डेयरी क्षेत्र की सफलता अब सिर्फ कितने मिलियन टन दूध बना, इससे नहीं आंकी जानी चाहिए, बल्कि इससे आंकी जानी चाहिए कि हर लीटर दूध से कितना मूल्य निकला, कितने उन्नत उत्पाद बने, कितने बाजारों तक पहुंच बनी और अंततः डेयरी किसानों तक कितनी आमदनी पहुंची।
भारत के पास दूध है, किसान हैं और जीवंत घरेलू बाजार है। अब जरूरत है कि इन ताकतों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी डेयरी उत्पादों और वैल्यू चेन में कैसे बदला जाए। भारतीय डेयरी का भविष्य एक और मिलियन टन दूध से नहीं, बल्कि इस बात से तय होना चाहिए कि हर लीटर दूध से कितना ज्यादा मूल्य बनाया जा सकता है।