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अब DM का इंतजार नहीं करेंगे गांव: आपदा से लड़ने की कमान संभालेंगी पंचायतें, 20 राज्यों के लिए तैयार मॉडल प्लान

शिरीष खरे Published by: Devesh Saraswat Updated Tue, 20 Jan 2026 09:50 AM IST
सार

बाढ़, चक्रवात और भूकंप जैसी आपदाओं के समय अक्सर देखा गया है कि संकट से निपटने की पहली कड़ी गांव ही होेते हैं। इसी सोच के तहत अब आपदा प्रबंधन की कमान ग्राम पंचायतों को दी जा रही है। यह पहल देश के सभी गांवों को तैयारी, त्वरित प्रतिक्रिया और पुनर्वास का मजबूत केंद्र बनाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

बाढ़ से चक्रवात तक गांव खुद संभालेंगे मोर्चा।
बाढ़ से चक्रवात तक गांव खुद संभालेंगे मोर्चा। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में पिछले मानसून के दौरान आई बाढ़ कोई असाधारण घटना नहीं थी। हर मानसून में यहां बाढ़ आना आम हो चुका है। इस साल भी जिले के कई गांवों में पानी घुसा, फसलें डूबीं और संपर्क मार्ग टूट गए। इस दौरान देखने में आया कि राहत शिविर जिला प्रशासन ने नहीं, बल्कि स्थानीय ग्राम पंचायतों और ग्रामीण स्वयंसेवकों ने पहले तैयार किए। आपदा की स्थिति में पंचायत भवन, स्कूल और सामुदायिक हॉल अस्थायी आश्रय बने। खास बात यह थी कि यह व्यवस्था किसी लिखित योजना का परिणाम नहीं थी, बल्कि परिस्थितियों से उपजी सामुदायिक प्रतिक्रिया थी। इस अनुभव ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा कि आपदा प्रबंधन की सबसे पहली और प्रभावी इकाई कौन है।

कोविड-19 महामारी के दौरान गांवों में यह साफ दिखा कि ग्राम पंचायतें संकट के समय कितनी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। क्वारंटीन (संगरोध) व्यवस्था, राशन वितरण और निगरानी का काम पंचायतों ने संभाला। इसी तरह, सूखा हो या चक्रवात, राहत कार्यों की शुरुआत अक्सर पंचायत स्तर से होती है। इसके बावजूद पंचायतों को न तो पर्याप्त संसाधन मिलते हैं और न ही स्पष्ट अधिकार।

बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के बीच अब आपदा प्रबंधन की कमान गांवों के हाथों में देने की तैयारी है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में 20 राज्यों में मॉडल ग्राम विकसित करने की घोषणा को देखा जाना चाहिए। सरकार का दावा है कि इन गांवों को बुनियादी ढांचे, सेवाओं और स्थानीय क्षमता निर्माण के लिहाज से मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा। इस पहल में आपदा प्रबंधन को भी एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में शामिल करने की बात कही गई है।

यहां यह बात भी अहम है कि भारत सरकार के ग्रामीण आपदा जोखिम प्रबंधन ने राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण सुदृढ़ीकरण परियोजना के तहत 20 राज्यों के 81 आपदा प्रभावित जिलों में हर जिले से 20 ग्राम पंचायतों को चुना है ताकि उन्हें मॉडल ग्राम पंचायत के रूप में विकसित कर आपदा प्रबंधन की दक्षता बढ़ाई जा सके। इसके लिए लगभग 500 करोड़ रुपये से अधिक के बजट का प्रावधान है।

तैयार किया जाएगा स्थानीय नेटवर्क
सरकार ने मॉडल ग्राम पंचायतों के ढांचे में स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित किया है कि स्थानीय योजनाओं के निर्माण में आपदा जोखिम न्यूनीकरण को प्राथमिकता मिले। यह केवल आपदा के समय राहत प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पहले से तैयारी, जोखिम मूल्यांकन और सामुदायिक समन्वय पर जोर देगी। खास बात यह है कि मॉडल ग्राम पंचायतों को ऐसे कौशल और उपकरण दिए जाएंगे, जिससे वे स्थानीय विकास योजनाओं को आपदा प्रबंधन के समन्वित भाग के रूप में तैयार कर सकें। इस तरह आपदा न केवल घटना के रूप में, बल्कि एक सतत स्थानीय विकास चुनौती के रूप में भी मान्यता पाएगी।

इस पहल की खास बात यह है कि इसे क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण से लागू किया जा रहा है। यानी केवल एक पंचायत को अकेले विकसित करने पर केंद्रित नहीं, बल्कि निकटवर्ती ग्राम पंचायतों के समूह को एक साथ शामिल करके एक समग्र स्थानीय नेटवर्क तैयार किया जाएगा। इस नेटवर्क के ज़रिये जोखिम साझा करने, स्थानीय संसाधनों के सामूहिक उपयोग और संयुक्त आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को बढ़ाया जा सकेगा। दरअसल, सरकार का मानना है कि ऐसा करने से सीखने और दूसरे प्रभावित जिलों में दोहराने की प्रक्रिया आसान हो जाएगी।

चुनौतियों के साथ ये हैं समाधान
यह पहल एक सकारात्मक शुरुआत है, पर इसे लागू करने में कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं। पहला, अभ्यास और प्रशिक्षण का अभाव है। ग्राम पंचायतें पारंपरिक रूप से विकास और प्रशासनिक कामकाज में तो सक्रिय रही हैं, मगर आपदा प्रबंधन के तकनीकी आयामों जैसे जोखिम आकलन, आपदा चेतावनी प्रणालियों का संचालन और सामुदायिक संवाद में अभी पर्याप्त क्षमता नहीं रखतीं। लिहाजा, समाधान के तौर पर नीति यह मानती है कि स्थानीय प्रतिनिधियों और स्वयंसेवकों के लिए व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे, जिससे ग्राम पंचायतों की क्षमता में वृद्धि हो सके।

दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती संसाधन और तकनीकी सहायता का निरंतर उपलब्ध होना है। ग्राम पंचायतों को केवल अधिकार देकर ही महारथ हासिल नहीं होती, उन्हें डिजिटल सूचना प्रणालियां, डेटा तक पहुंच और समयबद्ध फंडिंग व्यवस्था भी चाहिए। इसीलिए, नीति में ई‑ग्राम स्वराज, ग्राम मानचित्र और अन्य राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग निर्धारित किया गया है ताकि आपदा प्रबंधन की योजना, खर्च और आवश्यक सूचनाएं पंचायतों तक सीधे पहुंच सकें। यह कदम यदि सही ढंग से लागू होता है तो स्थानीय निर्णय प्रक्रिया को जानकारी-संपन्न और जवाबदेह बनाया जा सकता है।

तीसरी चुनौती समन्वय की है। प्राकृतिक आपदा का सामना केवल ग्राम स्तर पर नहीं होता, बल्कि जिला और राज्य स्तर की एजेंसियों के साथ तालमेल भी आवश्यक है। नीति में स्पष्ट रूप से यह दिखाया गया है कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ग्राम पंचायत योजनाओं के साथ काम करेंगे, जिससे स्थानीय और उच्च स्तरीय कार्यों में तालमेल बना रहे।

इन पहलुओं की समीक्षा करने से यह स्पष्ट होता है कि सरकारी योजना केवल आदर्श उदाहरण बनाना नहीं चाहती, बल्कि ग्राम पंचायतों को निर्णय लेने के साथ ही संसाधन प्रबंधन और आपदा जोखिम की स्थानीय समझ देने की कोशिश भी कर रही है। इससे ग्राम स्तर की तैयारी और सामुदायिक सहभागिता को मजबूती मिल सकेगी।

ग्रामसभा की भूमिका होगी अहम
सबसे पहला लाभ ग्रामसभा की भूमिका से जुड़ा है। इसके तहत आपदा प्रबंधन से जुड़ी स्थानीय योजनाएं ग्रामसभा के माध्यम से तैयार और अनुमोदित होंगी। इससे निर्णय प्रक्रिया केवल पंचायत सचिव या सरपंच तक सीमित नहीं रहती। इससे जोखिमों की पहचान, प्राथमिक जरूरतें और संसाधनों का उपयोग सामूहिक सहमति से तय होगा। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आपदा के समय बाहरी एजेंसियों के आने से पहले गांव को स्वयं निर्णय लेने का अवसर मिलेगा।

महिला समूहों का भी योगदान
इसी तरह, एक बड़ा लाभ महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय नेटवर्क को औपचारिक भूमिका देने से जुड़ा है। सरकारी ढांचे में इन्हें केवल आजीविका या बचत समूह के रूप में नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन की सक्रिय इकाई के रूप में देखा गया है। राहत सामग्री का वितरण, सामुदायिक रसोई, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा स्वास्थ्य निगरानी जैसे कामों में इन समूहों की भूमिका तय की गई है। इसका लाभ यह है कि आपदा के समय प्रशासन को नए नेटवर्क खड़े नहीं करने होंगे।

आपदा और पलायन का संबंध
एक लाभ आपदा और पलायन के संबंध को नीति स्तर पर स्वीकार करने से भी जुड़ा है। लंबे समय तक आपदा को एक अस्थायी संकट माना जाता रहा, जबकि इसका असर ग्रामीण आबादी के स्थायी विस्थापन के रूप में सामने आता है। नई सोच यह मानती है कि यदि गांव आपदा के बाद जल्दी सामान्य स्थिति में लौट आते हैं तो मजबूरी में होने वाला पलायन रोका जा सकता है। आजीविका बहाली, स्थानीय रोजगार और बुनियादी सेवाओं की शीघ्र बहाली को आपदा प्रबंधन का हिस्सा मानने से यह नीति केवल राहत नहीं, बल्कि स्थिरता का साधन बनती है।

वित्तीय व्यवस्था और जवाबदेही
चौथा लाभ वित्तीय व्यवस्था और जवाबदेही से जुड़ा है। मॉडल ग्राम ढांचे में पंचायत स्तर पर सीमित लेकिन स्पष्ट वित्तीय अधिकार तय किए गए हैं। आपदा के समय छोटे निर्णयों के लिए जिला या राज्य स्तर की मंजूरी का इंतजार न करना पड़े, इस पर जोर है। साथ ही, खर्च की निगरानी और रिकॉर्ड को डिजिटल माध्यम से दर्ज करने की व्यवस्था बताती है कि पारदर्शिता को नीति का अनिवार्य हिस्सा माना गया है। इससे एक ओर संसाधनों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित होती है, दूसरी ओर दुरुपयोग की आशंका कम होती है।

अंतत: यह पहल राष्ट्रीय स्तर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण भारत की आपदा तैयारी केवल बड़ी योजनाओं या बजट आवंटन से नहीं तय होती। यह निर्णय लेने की क्षमता, स्थानीय नेतृत्व का सशक्तिकरण और संसाधनों का समय पर उपयोग पर निर्भर करती है। यही सब कारक मिलकर प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। 

आंकड़ों में नई पहल

  • 20 राज्य : पहले चरण में शामिल
  • 20 मॉडल गांव : शुरुआत
  • 81 आपदा प्रभावित जिले : चयन
  • 20 ग्राम पंचायतें हर जिले से : मॉडल के रूप में विकसित
  • 500 करोड़ रुपये से अधिक : अनुमानित बजट
  • 3 प्रमुख चरण :
  • आपदा से पहले तैयारी
  • आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया
  • आपदा के बाद पुनर्वास

 


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