पूस की रात उतर चुकी है। अब माघ की धूप धरती पर फैल रही है। सहसा ठिठुरती देह पर किसी ने लिहाफ डाल दी हो। हवा में अभी भी सर्दी की नमी है। पर, उसके भीतर वसंत की आहट भी घुलने लगी है। खेतों में पीली सरसों का रंग पसरा है। गेंहूँ की फसल हौले-हौले झूम रही हैं। धरती धानी चुनर ओढ़े है। मटर के दाने गदा गए हैं। मेढ़ों पर अलसी के नीले फूल खिल गए हैं। बाजार में नयका आलू आ गया है। शकरकंद भूने जा रहे हैं। बोरसी की आँच में। ताल-पोखर दमक उठे हैं। सुनहली किरणों से। सूरजदेव दक्षिणायन की निद्रा से जागे हैं। तनिक अलसाये हैं। उत्तरायण की ओर यात्रा आरंभ करते हैं। धीरे-धीरे। हौले-हौले। दरअसल यह संक्रमण का काल है। मौसम मानो अपने भीतर संतुलन खोजता। इसी में आता है, मकर संक्रांति का पर्व।
संक्रांति की आस्था और अर्थ
सूर्य का उत्तरायण होना केवल खगोलीय घटना नहीं, यह चेतना का नवप्रकाश भी है। लोककथाएँ कहती हैं, यह देवताओं के जागरण का दिन है। मानो पूरा ब्रह्मांड नई दिशा में चल पड़ा हो। इसी भाव से गंगा-स्नान और दान की परंपरा जुड़ी है। यहाँ आध्यात्मिकता और सामाजिकता दोनों का मेल दिखाई देता है।
भारतीय लोक जीवन में यह दिन किसी घटना की तरह नहीं, एक भाव की तरह आता है। जीवन की थकान में जैसे कोई नया उत्साह भर देता है। खेतों में काम करते किसान। आंगन में चूल्ह सुलगाती महिलाएँ। द्वार पर खेलते बच्चे। मुंडेर पर पक्षी। बथान में पशु। सबके व्यवहार में इस दिन कुछ खास होता है। आकाश स्वच्छ। घाम गुनगुनी। मन में अपने आप एक उजास उतरता है। माघ का यह महीना ही ऐसा है। ठंड की कठोरता और वसंत की कोमलता दोनों एक साथ रहते हैं। लोकमानस अंगुरी पर दिन गिनता है। गइल माघ, दिन उनतीस बाकि।
लोक उत्सव के विविध रूप
लोक का यह उत्सव हर जगह, हर अंचल में अलग नाम और रंग लेकर आता है। असम में यह ‘माघ बिहू’ कहलाता है। खरिहान में आग जलाकर नव अन्न के स्वागत में पूरा गाँव रात्रिभोज करता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यही दिन ‘खिचड़ी पर्व’ बनकर आता है। खदकते अदहन में पक रही दाल और चावल का संगीत। गंगा नहान के बाद सूर्य को अँजुरी भर जल अर्पित करने की परंपरा। सब मिलकर इसे जीवन का उत्सव बना देते हैं। महाराष्ट्र में तिल और गुड़ की मिठास से भरे लोग परस्पर मिलते हैं। गुजरात और राजस्थान का आकाश इन दिनों पतंगों से भर जाता है। दक्षिण भारत में यह ‘पोंगल’ बनता है। सूर्य देवता को अर्पित प्रथम अन्न के साथ, किसान अपनी मेहनत का उत्सव मानाते हैं। पंजाब में यही दिन ‘माघी’ के रूप में आता है। लोहड़ी के अग्नि उत्सव के तुरंत बाद सब खेतों, खुले मैदानों और गाँवों में नई ऋतु के स्वागत में शामिल होते हैं। पर, इन सब विविध रूपों में क्या साझा है? एक ही तत्व, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता। हमारे पूर्वजों ने इस उत्सव को किसी देवता के भय या अनुग्रह से नहीं जोड़ा, बल्कि सृष्टि के सहज नियमों से जोड़ा। जीवन का आधार प्रकृति है। यह भावना भारतीय संस्कृति में गहराई तक बसी है।
लोक हृदय का संदेश
मकर संक्रांति का सूर्योदय एक प्रतीक है कि जैसे सूर्य उत्तर की दिशा में बढ़ता है, वैसे ही मनुष्य को भी अंधकार से प्रकाश, जड़ता से गति और निराशा से आशा की ओर बढ़ना चाहिए। यह संक्रमण का पर्व है। ऋतु का ही नहीं, जीवन का भी। इसी दिन से काल बदलता है। नया पतरा आता है। परंपराएँ जागृत होती हैं।
खिचड़ी मेला
गोरखनाथ पीठ में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा भी इसी भावना का विस्तार है। वहाँ यह ‘दान’ नहीं, ‘साझेदारी’ का प्रतीक है। पड़ोसी नेपाल से भी खिचड़ी आती है। खिचड़ी चढ़ाई जाती है। फिर वही जनता में बाँटी जाती है। जैसे भक्ति और समरसता एक ही थाल में परोसी जा रही हो। हमारे पूर्वांचल में मकर संक्रांति केवल भोजन या स्नान का पर्व नहीं। यह संवाद का अवसर है। लोग महीनों बाद एक-दूसरे से मिलते हैं। मनई तो मनई, पशुओं भी नहलाया जाता है। सजाया जाता है। बच्चे तिल-गुड़-चावल की लाई-धोंधा-तिलवा-तिलकुट से झोले भरते हैं। माघी मेले लगते हैं। प्रयाग में। गोरखपुर, बनारस, अयोध्या जी, बासी, त्रिवेणी, सोनपुर जैसे नगरों में आज भी ‘खिचड़ी मेले’ लगते हैं। जहाँ धर्म, व्यापार और लोकजीवन एक ही जगह मिलते हैं।
खिंचड़ी भेजने की लोक परंपरा
बिहार-उत्तर प्रदेश में खिंचड़ी भेजने की लोक परंपरा है। पारिवारिक स्नेह, सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक बंधन का जीवंत प्रतीक है। बहु-बेटियों को खिंचड़ी भेजी जाती है। चावल, चूड़ा, लाई, गुड़, मौसमी सब्ज़ी व नये वस्त्र। दही भी। कब शुरू हुई यह धारा? क्या सोच रही होगी? इस परंपरा की जड़ें पारिवारिक बंधन में हैं। खिचड़ी के बहाने संवाद का सिलसिला। मोबाइल के युग से पहले मायके की खोज-खबर का सार्थक माध्यम। मायके से खिचड़ी के साथ, सनेस भी आता था। संवदिया के साथ। बचपन की यादें उमड़ आती होंगी। पर, पुरखों की खिचड़ी भेजने की परंपरा अब कमजोर पड़ रही है।
विज्ञान और परंपरा का संगम
यदि कोई इस पर्व को केवल विश्वास का उत्सव माने, तो वह आधा अंश ही देखेगा। यह शरीर और ऋतु के विज्ञान का भी साक्ष्य है। माघ का समय मौसम के परिवर्तन का होता है। सर्दी अभी है। पर, सूर्य की गर्मी लौटने लगी है। शरीर को ऐसे में ऊष्मा और पाचन दोनों की आवश्यकता होती है। उड़द-मूंग दाल, चावल, घी और अदरक से बनी खिचड़ी शरीर को संतुलित पोषण देती है। न भारी, न हल्की। आज विज्ञान कहता है कि यह पूर्ण प्रोटीन का स्रोत है। लेकिन हमारे पूर्वजों ने यह ज्ञान किसी प्रयोगशाला में नहीं, अनुभव और संवेदना से पाया था। उन्होंने देखा कि कैसे ऋतु और शरीर का संबंध गहरा है? भोजन उसी के अनुसार होना चाहिए। यही भारतीय स्वास्थ्य-दर्शन का मूल है। प्रकृति के साथ तालमेल।
आज की जरूरत
मकर संक्रांति का सार इसी तालमेल में है। सूर्य, ऋतु, शरीर और समाज। सब मिलकर जैसे एक सुर में गाते हैं। यही भारतीयता की सुंदरता है कि यहाँ जीवन के हर स्तर पर संगति खोजी जाती है। खिचड़ी का थाल इसी भाव का प्रतीक है। आज दुनिया के बड़े हिस्से में ‘फास्ट फूड संस्कृति’ जीवन का प्रतीक बन गई है। ऐसे में खिचड़ी जैसे व्यंजन हमें वापस अपने मूल से जोड़ते हैं। यह केवल अतीत की याद नहीं, भविष्य की दिशा है। पश्चिम अब ‘माइंडफुल ईटिंग’ की बात करता है। हमारे पूर्वजों ने इसे हजारों वर्ष पहले एक संस्कार बना दिया था। सादा भोजन, स्वच्छ मन और आभारपूर्ण दृष्टि। खिचड़ी उसी दृष्टि की याद दिलाती है।
पर, इसकी असल सीखावन क्या है? यह उत्सव हमें सिखाता है कि जीवन में हर परिवर्तन भय नहीं, नवजीवन का संकेत है। सूर्य हर वर्ष दक्षिण से उत्तर की ओर लौटता है। फिर पुनः वही यात्रा दोहराता है। पर हर बार दुनिया नई हो जाती है। खेतों में नयी फसल, घरों में नई उम्मीद, मन में नई ऊर्जा। यही है, मकर संक्रांति का रहस्य। स्थायित्व में गति और गति में स्थायित्व का संतुलन।
भारत की समृद्ध कृषि परंपरा इसी संतुलन को जीती आई है। यहाँ वर्ष केवल गणना नहीं, खेती का चक्र है। पूस में विश्राम, माघ में तैयारी, फागुन में प्रत्याशा। इस क्रम में संक्रांति वह बिंदु है जहाँ मनुष्य और प्रकृति का संवाद होता है। वह धरती को धन्यवाद देता है, बीते वर्ष की थकान उतारता है और आने वाले वसंत के स्वागत के लिए खुद को तैयार करता है।
नवसंकल्प का लोकदर्शन
माघ की यह धूप जब धरती पर उतरती है, तो उसमें केवल प्रकाश नहीं, करुणा भी होती है। सर्दी, अंधकार और कठिनाई जीवन का अंत नहीं हैं। इनके भीतर ही नवजीवन का बीज पलता है। खिचड़ी की भाप में वही स्नेह, वही कृतज्ञता सजीव है। यह पर्व हमें बार-बार सिखाता है कि भारतीय जीवन का सच्चा स्वाद सादगी में है। यहाँ दाल-चावल मिलकर भोजन बनते हैं, और मनुष्य-प्रकृति मिलकर जीवन। मकर संक्रांति हमें यही बताती है कि सूरज के साथ-साथ हमें भी यात्रा करनी चाहिए। अपने भीतर के अंधकार से बाहर, अपनी जड़ता से आगे, अपने भीतर की ऊष्मा की ओर। यही इस पर्व का लोकदर्शन है। खिचड़ी का, सूर्य का और जीवन का।