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धनतेरस पर झाड़ू लाती है सुख की बहार: सोने की चमक पर भारी 'सींक-श्रृंगार', झाड़ू क्यों है महालक्ष्मी का प्रतीक

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Fri, 06 Nov 2026 06:11 PM IST
सार

जब कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी की सुनहरी शाम ढलती है, तो समूचा देश दीयों की झिलमिलाती रोशनी से नहाने को मचल उठता है। धनतेरस आते ही अमूमन आँखें सोने-चांदी की दुकानों पर जाकर टिक जाती हैं, लेकिन इस तड़क-भड़क के बीच भारतीय लोकमानस की बेहद शांत और गहरी रीत सांस लेती है। वह रीत है - घर में एक नई 'झाड़ू' और 'साबुत धनिया' लाने की। 

रंग-बिरंगी सींक की झाड़ू और उन्हें खरीदते लोग और पीछे दीपावली की रौनक।
रंग-बिरंगी सींक की झाड़ू और उन्हें खरीदते लोग और पीछे दीपावली की रौनक। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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सोने-चांदी के समानांतर कीमती साधारण-सी 'झाड़ू' को साक्षात महालक्ष्मी का आशीष माना गया है। धनतेरस का त्योहार लोक के इस आध्यात्मिक और व्यावहारिक पक्ष से जोड़ता है, जहां खुशहाली की शुरुआत घर की भौतिक स्वच्छता से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर की दरिद्रता को बुहारने से होती है। यह लोकमानस के सहज विश्वास और ऋतु-परिवर्तन के उत्सव को बयां करती है।

यह सोचना कितना विस्मयकारी है न, कि जहाँ कुबेर और धनवंतरि जैसे देवताओं का आवाहन हो रहा हो, वहाँ सींकों से बनी एक साधारण सी झाड़ू को साक्षात महालक्ष्मी का आसन मानकर पूजा जाता है! यही तो हमारे लोक की खूबसूरती है, जो महँगी धातुओं के मुक़ाबले सहजता को सबसे बड़ा 'धन' स्वीकार करती है।

क्यों बनी झाड़ू महालक्ष्मी का प्रतीक
धार्मिक ग्रंथों और दादी-नानी की कहानियों की मानें तो झाड़ू केवल धूल साफ करने का जरिया नहीं है, यह घर से 'अलक्ष्मी' यानी दरिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर खदेड़ने का अस्त्र है। प्राचीन ग्रंथों में भी इसके महत्व के सूत्र मिलते हैं।

लोकमान्यता कहती है कि जिस तरह स्वच्छ और व्यवस्थित घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है, ठीक उसी तरह जब धनतेरस पर नई झाड़ू से घर की पहली सफाई होती है, तो संचित हो चुकी पुरानी सुस्ती और कंगाली घर की देहरी पार कर जाती है। यह परंपरा याद दिलाती है कि समृद्धि का पहला नियम ही पवित्रता है।

धनिये के वो बीज, जिनमें छुपा है बरकत का अंकुर
झाड़ू के साथ ही धनतेरस की शाम एक और चीज़ के बिना अधूरी है—वह है 'साबुत धनिया'। लोक परंपरा में धनिये को खुशहाली और संपन्नता का सूचक माना गया है। 'धनिया' शब्द में ही 'धन' छुपा है। इस दिन धनिया खरीदकर माता लक्ष्मी और भगवान धनवंतरि के चरणों में अर्पित किया जाता है।

दिवाली की मुख्य पूजा के बाद इन बीजों को घर के बगीचे या गमले की मिट्टी में बिखेर दिया जाता है। लोक का यह अटूट विश्वास है कि इन बीजों से निकलने वाले हरे-भरे पौधे जितने घने और स्वस्थ होंगे, उस घर में साल भर उतनी ही आर्थिक उन्नति और बरकत कदम चूमेगी।

ये हैं लोकाचार के कुछ खास प्रचलित नियम... 
इस सरल-सी झाड़ू को घर लाने और रखने के रिवाज बेहद कौतुक जगाने वाले हैं, जो ग्रामीण अंचलों में आज भी बड़ी शिद्दत से निभाए जाते हैं :
• खड़ी नहीं, लेटी हुई लक्ष्मी : घर में झाड़ू को कभी भी खड़ा करके नहीं रखा जाता। माना जाता है कि खड़ी झाड़ू घर में कलह और 'शत्रु बाधा' लाती है। इसलिए इसे हमेशा सम्मानपूर्वक जमीन पर लिटाकर रखा जाता है।
• नजरों से दूर, बरकत के पास : जैसे घर के गहनों और पैसों को तिजोरी में छुपाकर रखा जाता है, वैसे ही धनतेरस से लेकर भाईदूज तक झाड़ू को किसी कोने में छिपाकर रखने की रीत है। बाहर से आने वाले किसी भी अतिथि की नज़र सीधे झाड़ू पर नहीं पड़नी चाहिए।
• शनि और शुक्र का अनूठा मेल : कई घरों में धनतेरस पर झाड़ू लाकर उसके हैंडल पर सफेद या काला धागा बांधने का रिवाज है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, झाड़ू शुक्र का प्रतीक है और काला धागा शनि का। इन दोनों का यह मिलन घर की आर्थिक स्थिरता को मजबूत करता है और बुरी नज़र को सोख लेता है।
• चरण स्पर्श का निषेध : चूंकि झाड़ू को लक्ष्मी माना गया है, इसलिए लोकजीवन में इस पर कभी पैर नहीं रखा जाता। यदि अनजाने में पैर लग भी जाए, तो तुरंत हाथ जोड़कर क्षमा मांगी जाती है।

बाजार का उमंग भरा लोक-उत्सव...
धनतेरस के दिन बाजार का नजारा देखने लायक होता है। जहां एक तरफ बर्तनों और सोने की दुकानों पर भीड़ होती है, वहीं फुटपाथ पर रंग-बिरंगे रिबनों से बंधी 'सींक वाली' और 'फूल वाली' झाड़ू के ऊंचे-ऊंचे ढेर सजे होते हैं। अमीर हो या गरीब, हर कोई पूरी श्रद्धा के साथ कम से कम एक झाड़ू जरूर खरीदता है।

कुछ क्षेत्रों में तो तीन झाड़ू एक साथ खरीदने का नियम है। इस दिन खरीदी गई नई झाड़ू की बाकायदा कुमकुम, हल्दी और अक्षत से पूजा की जाती है, फिर दिवाली के अगले दिन से इसका उपयोग शुरू होता है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि त्योहार केवल वैभव के प्रदर्शन का नाम नहीं है।

यह जमीन से जुड़े रहकर, उन छोटी और उपेक्षित चीजों के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है, जो हमारे दैनिक जीवन को सुचारू और स्वच्छ बनाती हैं।

(डिस्क्लेमर : यह जानकारी लोकमान्यताओं पर आधारित है।)
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