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आदिवासियों की अनूठी धनतेरस: सोना-चांदी बेमोल, गाय-बैल को मानते हैं लक्ष्मी, पशुधन का श्रृंगार, गोवंश की पूजा

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Fri, 06 Nov 2026 03:51 PM IST
सार

धनतेरस पर आमतौर पर बर्तन या फिर सोने-चांदी की खरीदारी होती है, वहीं राजस्थान के कोटड़ा में गाय-बैलों को नहलाकर गुड़-रोटी खिलाई जाती है। दिवाली से पहले 'खोदा' के गीत और नृत्य यहां के त्योहार को खास बनाते हैं। जानिए, गोवंश की पूजा की यह अनूठी परंपरा...

धनतेरस पर रुपया-पैसा, सोने-चांदी की पूजा के बजाय गाय-बैलों को अपना धन क्यों मानते हैं आदिवासी।
धनतेरस पर रुपया-पैसा, सोने-चांदी की पूजा के बजाय गाय-बैलों को अपना धन क्यों मानते हैं आदिवासी। - फोटो : एआई
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विस्तार
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धनतेरस का नाम आते ही लोगों के मन में सोना-चांदी, नए बर्तन और खरीदारी का ख्याल आता है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और लोग मां लक्ष्मी की पूजा के लिए नई चीजें खरीदते हैं। लेकिन राजस्थान के उदयपुर जिले के आदिवासी बहुल कोटड़ा इलाके में धनतेरस का रंग कुछ अलग होता है।

यहां के आदिवासी समाज के लिए गाय-बैल ही असली धन हैं। वे इन्हीं में मां लक्ष्मी का रूप देखते हैं और इस दिन अपने पशुधन की पूजा करते हैं।

यह परंपरा बताती है कि खेती-किसानी और पशुपालन पर निर्भर समाज के लिए समृद्धि का अर्थ केवल धन-दौलत नहीं, बल्कि घर के पशु और उनसे जुड़ी आजीविका भी है। यही वजह है कि यहां धनतेरस पर सोने-चांदी की खरीदारी से ज्यादा गोवंश के सम्मान और देखभाल को महत्व दिया जाता है।

नदी-तालाब में स्नान, फिर गुड़-रोटी का भोग
धनतेरस के दिन आदिवासी परिवार सुबह से ही अपने घरेलू मवेशियों की देखभाल में जुट जाते हैं। गायों और बैलों को नदी या तालाब पर ले जाकर नहलाया जाता है। दूसरे पालतू पशुओं को भी स्नान कराया जाता है। इसके बाद गायों को रोटी और गुड़ खिलाया जाता है। इस दिन पशुओं के प्रति खास अपनापन देखने को मिलता है। 

मान्यता और परंपरा के मुताबिक, धनतेरस पर यदि किसी की गाय दूसरे के खेत में जाकर फसल चर भी लेती है, तो लोग इसे बुरा नहीं मानते। पशुओं को इस दिन विशेष छूट देने के पीछे उनके प्रति सम्मान और स्नेह का भाव है।
गीत, नृत्य और सामूहिक भोज के जरिए गांव के लोग त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।
गीत, नृत्य और सामूहिक भोज के जरिए गांव के लोग त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। - फोटो : एआई
दिवाली पर गोवंश का रंग-बिरंगा श्रृंगार
धनतेरस के बाद दिवाली के दूसरे दिन भी गोवंश की पूजा का सिलसिला जारी रहता है। इस दिन गायों को बाड़े में ही मीठी प्रसादी और नारियल चढ़ाया जाता है। इसके बाद उनका खास श्रृंगार किया जाता है। गायों के सींगों पर सुनहरा रंग लगाया जाता है और सिर पर मोर पंख सजाए जाते हैं। गले में घुंघरू और घंटियां बांधी जाती हैं। 

रंग-बिरंगे रंगों से सजी गायें और बैल गांवों में उत्सव का आकर्षण बन जाते हैं। यह केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि पशुओं के प्रति कृतज्ञता जताने का तरीका भी है। खेती से लेकर घर की आजीविका तक में साथ निभाने वाले इन मूक साथियों को सम्मान देने की यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

'खोदा' के गीतों से गूंजते हैं गांव
कोटड़ा की दिवाली केवल पूजा और रोशनी तक सीमित नहीं है। यहां त्योहार से आठ-दस दिन पहले ही गांवों और आसपास के फलां (छोटी ग्रामीण बस्तियों) में 'खोदा' की परंपरा शुरू हो जाती है। यह लोकनाट्य जैसा आयोजन है, जिसमें दस से पंद्रह महिलाएं और पुरुष रात के समय समूह बनाकर घर-घर जाते हैं और नेग मांगते हैं। 

इसमें एक महिला या पुरुष पात्र 'खोदा' बनता है। वह फटे-पुराने कपड़े से अपना चेहरा ढककर हाथ में लकड़ी लेता है। फिर नाचते-गाते हुए घरों के दरवाजे पर पहुंचता है और लकड़ी को जोर-जोर से ठोकता है। समूह के लोग गीत गाते हुए मौसम और उपलब्धता के हिसाब से कद्दू, चवला, मक्का या पैसे मांगते हैं। घर-घर से जुटाई गई सामग्री से घुघरी बनाई जाती है। बाद में इसे समूह के सदस्यों और बच्चों में बांट दिया जाता है। 

इस तरह गीत, नृत्य और सामूहिक भोज के जरिए गांव के लोग त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।

पशुधन ही जीवन और लोकसंस्कृति का आधार
भारत के कई ग्रामीण और कृषि प्रधान इलाकों में गाय और बछड़े की पूजा की परंपरा रही है। महाराष्ट्र में इसे वसु बारस और कई क्षेत्रों में गोवत्स द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। इन परंपराओं में गाय के साथ उसके बछड़े की पूजा भी की जाती है। हालांकि अलग-अलग राज्यों और समुदायों में पूजा की तिथि, विधि और रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं।

कोटड़ा के आदिवासी समाज की धनतेरस पर गोवंश पूजा भी इसी व्यापक सांस्कृतिक भाव से जुड़ी है। यहां गाय-बैल केवल पालतू पशु नहीं, बल्कि खेती, परिवार की जरूरतों और ग्रामीण जीवन के भरोसेमंद साथी हैं। उनके प्रति सम्मान जताने का यह तरीका बताता है कि लोकजीवन में धन की परिभाषा बाजार से नहीं, बल्कि प्रकृति, मेहनत और जीवन के साथ जुड़े रिश्तों से तय होती है।
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