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नरक चतुर्दशी की अनोखी रीत : यम का चौमुखा दीया, अपामार्ग का पौधा और भोर में उबटन, छोटी दिवाली के अनोखे रिवाज

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Fri, 06 Nov 2026 06:55 PM IST
सार

छोटी दिवाली यानी नरक चतुर्दशी पर देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अनूठी लोकपरंपराएं निभाई जाती हैं। कहीं दक्षिण दिशा में यमराज के नाम का चौमुखा दीया जलता है तो कहीं पुराने सूप और टूटे बर्तनों को पीटकर अलक्ष्मी को विदा किया जाता है। उबटन से स्नान और अपामार्ग के पौधे का इस्तेमाल भी इस पर्व की खास परंपराओं में शामिल है।

नरक चतुर्दशी को है यम का दीया जलाने की परंपरा।
नरक चतुर्दशी को है यम का दीया जलाने की परंपरा। - फोटो : एआई
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विस्तार
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दीपावली की जगमगाहट से ठीक एक दिन पहले आने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली, रूप चौदस और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। आमतौर पर इसे दीप जलाने और घर सजाने का दिन माना जाता है, लेकिन इसके साथ कई ऐसी लोकपरंपराएं जुड़ी हैं, जिनके बारे में जानकर हैरानी होती है।

कहीं मृत्यु के देवता यमराज के नाम पर दीया जलाया जाता है तो कहीं घर की महिलाएं पुराने सूप और टूटे बर्तनों को पीटकर दरिद्रता को बाहर का रास्ता दिखाती हैं। शरीर पर उबटन लगाने और एक खास पौधे से स्नान करने की परंपरा भी इस दिन को अलग पहचान देती है।

दक्षिण दिशा में यम के नाम का दीया
नरक चतुर्दशी पर यमराज के नाम से दीपदान करने की परंपरा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन यमराज के निमित्त दीप जलाने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। इसे यम दीपदान कहा जाता है।

कई घरों में मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके चौमुखा यानी चार बत्तियों वाला दीपक जलाया जाता है। दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना जाता है। कुछ ग्रामीण इलाकों में यह दीया घर के गंदे कोने या कूड़े के ढेर यानी घूरे पर भी रखा जाता है। लोकविश्वास है कि इससे घर की दरिद्रता और बीमारियां दूर होती हैं। इस परंपरा में दीपक की लौ के साथ घर में सुख, स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना भी जुड़ी है।

उबटन और तेल मालिश से निखरता है रूप
रूप चौदस के नाम से जुड़ी एक प्रमुख परंपरा शरीर की शुद्धि और सौंदर्य से संबंधित है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर तिल या सरसों के तेल से मालिश करने और जड़ी-बूटियों से बने उबटन से स्नान करने का रिवाज है।

कई परिवारों में इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है। माना जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने से शरीर की शुद्धि होती है और रूप निखरता है। लोकमान्यता यह भी है कि इस दिन सूर्योदय के बाद तक सोते रहने से पुण्य का क्षय होता है। इसीलिए छोटी दिवाली की सुबह जल्दी उठकर स्नान करने की परंपरा निभाई जाती है।

अपामार्ग के पौधे से जुड़ी अनोखी रस्म
नरक चतुर्दशी की एक कम चर्चित परंपरा अपामार्ग के पौधे से जुड़ी है। इसे कई जगह लटजीरा या चिचड़ी भी कहते हैं। कुछ परंपराओं में स्नान करते समय इस पौधे को सिर के ऊपर तीन बार घुमाया जाता है। इस दौरान विशेष मंत्र या प्रार्थना भी की जाती है।

लोकविश्वास है कि ऐसा करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है और अकाल मृत्यु का संकट टलता है। आयुर्वेद और पारंपरिक वनस्पति ज्ञान में अपामार्ग का अपना स्थान रहा है। हालांकि इस रस्म का धार्मिक महत्व लोकमान्यताओं से जुड़ा है, इसे किसी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित सुरक्षा उपाय के तौर पर नहीं देखना चाहिए।

छोटी दिवाली, बड़े सांस्कृतिक अर्थ
नरक चतुर्दशी की इन परंपराओं में दीपदान, स्वच्छता, शरीर की देखभाल और घर से पुरानी अनुपयोगी चीजें हटाने जैसे कई भाव एक साथ दिखाई देते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इनके तरीके और मान्यताएं बदल सकती हैं, लेकिन मूल भावना जीवन में शुभता और खुशहाली लाने की है।

यही वजह है कि छोटी दिवाली केवल दीप जलाने का त्योहार नहीं, बल्कि लोकविश्वासों और सदियों पुराने रीति-रिवाजों का भी उत्सव है।

(डिस्क्लेमर: लेख में बताए गए उपाय पारंपरिक लोकमान्यताओं और धार्मिक विश्वासों पर आधारित हैं।) 
 
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