"ग्यारह बरस, ग्यारह महीने और ग्यारह दिन ब्रज में रहने के बाद, अब मथुरा जाना है कृष्ण। बहुत हुआ बचपन, बहुत बजा ली बांसुरी, बहुत भीग लिए प्रेम में, बहुत भिगो दिया भक्ति में सबको, अब बचपना छोड़ो और कर्म की ओर प्रवृत्त करो अपने मन को" अक्रूर जी ने कदाचित यही कहा होगा, यही दैवीय प्रेरणा हुई होगी।
वर्तमान समय में भी यही बात प्रासंगिक जान पड़ती है, देखो जगत तुम्हारे लड्डू गोपाल स्वरूप, तुम्हारी बांसुरी, तुम्हारे नृत्य, तुम्हारे संगीत, तुम्हारे अल्हड़, नटखट स्वरूप के मोह से बाहर ही नहीं आ पा रहा है। हमें भी तुम्हारे उस स्वरूप से प्रेम है, किंतु जो मां अपने शिशु को गोद से नहीं उतारती वह उसे जीवन पथ पर चलना भी नहीं सिखा सकती न।
हे मधुसूदन तुमने तो अपने जीवन में हर भाव को साधने की शिक्षा दी है, तुम तो पूर्ण अवतार हो न, तो यह जगत तुम्हारे अधूरे स्वरूप की आराधना ही करता रहेगा क्या। तुम्हारा तो पूरा जीवन ही मनुष्य जीवन के विभिन्न पक्षों के साथ पूर्णता पाता है, तुम किसी एक भाव की साधना को कहां मान्य करते हो। जिस जगत की आंखे खोलने के लिए तुमने अवतार लिया था वह जगत तो रास, रंग भक्ति के एक पक्ष में ही डूबा हुआ है,
हां भक्ति कहां गलत है, भक्ति का सौंदर्य तो अनूठा है, और वह भी तुम जैसे कला पुरुष की, तुम्हारी भक्ति न की जाए तो किसकी करे कोई, तुम हो ही इतने आकर्षक, मोहना जिसके मोह से कौन बचा भला, समस्त कलाएं जहां आश्रय पाती हों, जहां जीवन का आनंद दर्शन पाता हो वह तो है ही आराध्य, किंतु हे सखे तुम्हारा स्वयं का जीवन मात्र आनंद का अध्याय तो नहीं, और उससे केवल आनन्द ही तो नहीं मिलता, यथार्थ के कठोर धरातल पर चुभने वाले कांटे भी तो हैं, हां यह अलग बात है कि तुमको भजने वाला उन कंटकों में भी आनंद खोज लेता है, यह तुम्हारी भक्ति की शक्ति है।
किंतु तुमने केवल भक्ति ही तो नहीं सिखाई थी, उद्धव के ज्ञान को अपमानित करने की मंशा नहीं थी तुम्हारी, ज्ञान के अहंकार को पराजित करने का भाव था, ज्ञान को केवल प्रेम पराजित कर सकता है। उद्धव के ज्ञान के अहंकार को तो तुम स्वयं अपने ज्ञान से पराजित कर देते, किंतु वहां वह अहंकार का युद्ध होता, फिर उद्धव वैसे समर्पित न हो पाते जैसा समर्पण प्रेम से पराजित होकर उनमें घटित हुआ।
बुद्धिमानों, ज्ञानी पुरुषों के रूखे, सूखे, कुटिल बौद्धिक धरातल पर प्रेम की भावना के बीज बोने का जतन आज भी प्रासंगिक लगता है, आज भी बुद्धिमानों को भाव के, प्रेम के उस अध्याय की, उस उपदेश की आवश्यकता है जो कभी उद्धव जी को थी। तुमने भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग सबकी शिक्षा दी है न। अर्जुन को वैराग्य का ज्ञान नहीं दिया तुमने, ठीक वैसे ही गोपियों को ज्ञानमार्ग नहीं बताया, उद्धव को कर्मयोग नहीं बताया, गोपियों को प्रेमयोग बताया, उद्धव को ज्ञानयोग और अर्जुन को कर्मयोग।
जो जिसके योग्य था वही दर्शन दिया है न तुमने, तुम गुणग्राहक हो, पात्र चुनते हो, फिर कृपा करते हो। किंतु कभी ऐसा हो कि संसार ज्ञानयोग छोड़कर, कर्मयोग छोड़कर केवल प्रेम योग या भक्ति योग में रत हो जाए तो... क्या यह तुम्हारे संपूर्ण दर्शन को सीमित दृष्टि से समझना न हुआ। नहीं तुम्हारी शिक्षा को गलत ढंग से ग्रहण कर रहा है यह जगत, तुमने अर्जुन को भक्तियोग बताया किंतु उसमें भ्रमित नहीं होने दिया, तुमने अर्जुन को रास की कथा नहीं सुनाई, न अर्जुन को गोपीगीत सुनाया, तुमने अर्जुन को वैराग्य का पाठ भी नहीं सुझाया, तुमने अर्जुन को राजयोग, कर्मयोग सिखाया।
प्रकृति में यदि सब एक ही भाव साधने लगे तो व्यतिक्रम निश्चित है, ठीक वैसे ही जिसका जो कर्तव्य है वह छोड़कर यदि किसी एक भाव में निष्ठ हो जाए संपूर्ण धरा और मानविकी तो उथल पुथल मच जाएगी, यदि सभी प्रेमी हो जाएं, सभी भक्त होकर नृत्य करने लगें, सभी ज्ञानी हो जाएं, सभी योद्धा हो जाएं तो यह सृष्टि चल नहीं पाएगी। योद्धा अपना युद्ध छोड़कर नृत्य करने लगे प्रसाद बांटने लगे तो राष्ट्र की सुरक्षा का दायित्व कौन निभाएगा, भक्त यदि तलवार लेकर निकल पड़े तो पराजय निश्चित है।
इन दिनों श्रीकृष्ण तुम्हारे प्रियजन केवल नृत्य और शृंगार में ही कृष्ण को देख पा रहे हैं, वे तुम्हारे युगांधर स्वरूप को बिसरा रहे हैं, जहां तुमने उन्हें कर्म को ही कृष्ण मानने की आज्ञा दी थी, तुमने जिस निराकार सर्वशक्तिमान स्वरूप के प्रदर्शन किया था, वह अब आकार के रूप में ही पूजा जा रहा है। वहां केवल आकार रह गया है, तुम उसमें से तीरोहित हो गए हो। तुम्हारी बांसुरी, तुम्हारा माखन, तुम्हारे सौंदर्य ने तुम्हारे योद्धा स्वरूप, बुद्धि स्वरूप, ज्ञान स्वरूप सुदर्शन धारी, वीर, तेजोमय, प्रलयंकारी, शत्रु के मन में भय का संचार कर देने वाले, न्यायप्रिय, कूटनीतिज्ञ श्री कृष्ण को विस्थापित कर दिया है।
बांसुरी का स्वर और पाञ्चजन्य का भैरव स्वर दोनों ही अति प्रिय स्वर हैं। किंतु बांसुरी बजाते समय पाञ्चजन्य का स्वर, और पांचजन्य की आवश्यकता के समय बांसुरी के स्वर की प्रासंगिकता नहीं दिखाई देती। गौओं को चराते हुए हाथ की छड़ी भी लुभाती है किंतु जब तुम्हारी तर्जनी के सुदर्शन की आवश्यकता हो अन्याय के बंधन काटने के लिए तब छड़ी को त्याग देने का संदेश तुम्हारा ही है न।
जिस वाणी से गीत गुनगुनाते तुम प्रेम पुरुष बन लुभाते हो, उसी दिव्य वाणी से जब आवश्यकता हो तो भीषण हुंकार का स्वर भी उच्चारित करने का मार्ग तुम्हीं ने बताया है न, जिन पैरों में घुँघरू बांध रास रचाते हो उन्हीं पैरों से दौड़ते हुए कंस की छाती पर आघात करने का संदेश भी दिया है न तुमने, जिन हाथों से राधिका का शृंगार करते हो उन्हीं हाथों में अश्व की वल्गाएं थामी थीं न तुमने, द्वारकाधीश बन जिनसे राजसुख पाया था वहीं से सुदामा की दरिद्रता दूर करने दौड़ पड़े थे न, कभी सीधे युद्ध में उपस्थित हुए तो कभी रणछोड़ बनने का दर्शन भी दिया है न तुमने, कभी मौन होकर लांछन सहे तो कभी गरज कर प्रतिकार किया तुमने दामोदर।
तो क्या आज तुम्हारे भक्त केवल नृत्य करेंगे, केवल प्रसाद चखेंगे, केवल परिक्रमा करेंगे, केवल बांसुरी बजाएंगे, केवल श्रृंगार करेंगे, ठीक है वह भी तो एक ढंग है तुम्हारी भक्ति का, किंतु उनमें पाञ्चजन्य के स्वर के लिए साहस कब दोगे, उन्हें उनके पुरुषार्थ के पथ पर कब लेकर जाओगे, उनके हाथ में समय की वल्गाएं थमाने का क्या समय नहीं आ गया है, क्या वे अन्याय की छाती पर चढ़कर उसका प्रतिकार नहीं करेंगे, क्या वे अर्जुन की तरह भ्रमित रहेंगे, क्या तुम्हारी गीता अर्जुन को वैराग्य का पाठ पढ़ाती है, नहीं, गीता तो पुरुषार्थ का ग्रंथ है, उसमें वैराग्य कहां, हां अपने कर्म से न बंधने की सीख अवश्य है,
किंतु भ्रमित संतति कर्म से ही विरत होने लगे तो, गीता के पाठ का सही अर्थ कौन संतति तक पहुंचाएगा, क्योंकि सब तो तुम्हारे प्रेम रूप में मगन हैं, तुम्हारे युगांधर स्वरूप को जागृत करने के लिए जगत को क्या करना होगा इसकी अपने भक्तों को प्रेरणा दो, कहो, बहुत हुआ नृत्य, संगीत, प्रेम, अब कर्म क्षेत्र में उतरो, अपने अपने कुरुक्षेत्र संभालों, ईश्वर भक्ति का अर्थ कर्म से विरक्ति नहीं है, अपने प्रत्येक कर्म को श्रीकृष्ण का कर्म समझकर करो यही भक्ति है, अपने कर्म को करते हुए नाचते रहो, गाते रहो, वह कर्म ही श्रीकृष्ण का ध्यान बन जाए, वह कर्म ही आनंद बन जााए, यही श्रीकृष्ण का संदेश है, जो यह जगत भुलाए बैठा है और अपने नियत कर्म को करने के अतिरिक्त सबकुछ कर रहा है ।