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Goa S Narkasur Tradition The Unique Diwali Ritual Of Burning Demon Effigies
दीपोत्सव से जुड़ी परंपरा: दीपावली पर गोवा के गली-कूचों में दीयों से पहले क्यों जलाते हैं नरकासुर का पुतला...
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sun, 08 Nov 2026 12:16 PM IST
सार
गोवा के गली-कूचों में दीपावली की शुरुआत कुछ अलग अंदाज में होती है। यहां नरकासुर के विशाल पुतलों के दहन के साथ दीपावली दस्तक देती है। नरक चतुर्दशी की पूर्व संध्या पर मोहल्लों के युवा इन पुतलों को तैयार कर जुलूस में निकालते हैं और भोर से पहले उनका दहन करते हैं। जानें, इस अनूठी परंपरा की पूरी कहानी...
यहां नरकासुर के विशाल पुतलों के दहन के साथ दीपावली दस्तक देती है।
- फोटो : एआई
गोवा में दीपावली का आगाज ऐसी परंपरा से होता है, जो देश के दूसरे हिस्सों से इसे अलग पहचान देती है। यहां दीपावली की पूर्व संध्या पर गलियों और चौराहों पर राक्षसी चेहरे वाले विशाल पुतले दिखाई देने लगते हैं। कहीं उनकी आंखें बाहर निकली होती हैं, तो कहीं वे रंग-बिरंगे वस्त्रों और सजावट से सजे होते हैं।
ये पुतले नरकासुर के होते हैं। नरक चतुर्दशी की रात इन्हें जुलूस के साथ घुमाया जाता है और फिर भोर होने से पहले आग के हवाले कर दिया जाता है। यह परंपरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
कृष्ण-सत्यभामा से जुड़ी नरकासुर की कथा
हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, नरकासुर एक शक्तिशाली असुर राजा था। उसके अत्याचारों से लोग और देवता परेशान थे। उसने अनेक महिलाओं को बंदी बना रखा था। आखिरकार भगवान कृष्ण और सत्यभामा ने उसका वध किया।
नरकासुर की पराजय को अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में याद किया जाता है। इसी प्रसंग से नरक चतुर्दशी का संबंध है।
गोवा में इस कथा का एक स्थानीय रूप भी प्रचलित है। इतिहासकार प्रजल साखरदांडे के अनुसार, प्राचीन गोमंतक यानी आज के गोवा पर कभी नरकासुर का शासन माना जाता था। उसके अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की।
कथा के मुताबिक, कृष्ण ने नरकासुर का वध कर बंदी महिलाओं को मुक्त कराया। इसके बाद महिलाओं ने अंधकार से मुक्ति और प्रकाश के स्वागत में दीप जलाए। यह स्थानीय मान्यता गोवा की दीपावली को नरकासुर की कथा से जोड़ती है।
पुतले बनाने में जुटते हैं मोहल्लों के युवा
नरकासुर के पुतले तैयार करने का काम दीपावली से कई सप्ताह पहले शुरू हो जाता है। मोहल्लों के युवा समूह और क्लब इसके लिए एकजुट होते हैं। लोग धन, सामग्री और श्रम देकर सहयोग करते हैं।
पहले पुतलों का ढांचा बांस से बनाया जाता था और उसमें सूखी घास भरकर कागज से ढक दिया जाता था। अब लोहे या स्टील की छड़ों, बांस, नारियल के रेशों, घास, अखबार और कागज की लुगदी से विशाल आकृतियां बनाई जाती हैं। चेहरे को मिट्टी से आकार देकर रंगों और सजावटी सामग्री से तैयार किया जाता है।
समय के साथ इस परंपरा में प्रतिस्पर्धा का रंग भी जुड़ गया है। कई मोहल्लों में नरकासुर पुतला प्रतियोगिताएं होती हैं। कुछ पुतलों में हाइड्रोलिक तकनीक लगाई जाती है, जिससे वे पौराणिक युद्ध के दृश्य जैसे करतब दिखा सकें।
पणजी के माला और बेटिम, चिम्बेल, तालेगांव तथा मडगांव के कुछ हिस्सों में ऐसे पुतलों के प्रदर्शन खास आकर्षण होते हैं। मडगांव के कोम्बा इलाके में 'नाचोवपाचो नरकासुर' की परंपरा भी है, जिसमें पुतले के भीतर मौजूद व्यक्ति उसे चलाता और नृत्य करता है।
रातभर जुलूस, भोर में पुतला दहन
दीपावली की पूर्व संध्या पर नरकासुर के पुतलों को गलियों और सड़कों से जुलूस के रूप में निकाला जाता है। इनके साथ संगीत, रोशनी और स्थानीय उत्सव का माहौल रहता है। लोग अलग-अलग मोहल्लों में जाकर पुतलों को देखते हैं।
नरक चतुर्दशी की सुबह होने से पहले इनका दहन किया जाता है। कुछ जगहों पर पुतला दहन से पहले आरती होती है। इसके साथ करित नाम का कड़वा फल पैर के अंगूठे से कुचलकर उसका रस चखने की परंपरा भी बताई जाती है। इसके बाद दीपावली की सुबह अभ्यंग स्नान यानी तेल लगाकर स्नान करने की रस्म निभाई जाती है।
परंपरा के साथ पर्यावरण की चिंता
गोवा में नरकासुर के पुतले जलाने की परंपरा समय के साथ बदली है। इतिहासकारों के अनुसार, पुर्तगाली शासन के दौरान यह आयोजन कुछ गांवों तक सीमित था। 1961 में गोवा की मुक्ति के बाद इसे अधिक व्यापक पहचान मिली। अब पुतले पहले से बड़े और अधिक सजावटी हो गए हैं।
हालांकि, इनके निर्माण में प्लास्टिक, थर्मोकोल और दूसरी ऐसी सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल ने पर्यावरण को लेकर चिंता भी बढ़ाई है। इन सामग्रियों को जलाने से प्रदूषण और जहरीले धुएं का खतरा पैदा हो सकता है। पहले बांस और सूखी घास से बने पुतले अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल थे। ऐसे में इस परंपरा की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए कम प्रदूषण वाली सामग्री अपनाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
गोवा की दीपावली में नरकासुर के पुतले केवल एक पौराणिक प्रसंग का मंचन नहीं हैं। इनके निर्माण से लेकर जुलूस और दहन तक, पूरा आयोजन मोहल्लों की सामूहिक भागीदारी से आकार लेता है।
भोर में पुतले की आग बुझती है और दीपावली की सुबह दीपों, पूजा और अभ्यंग स्नान के साथ शुरू होती है। इस तरह गोवा में दीपावली की रोशनी से पहले नरकासुर के अंत की यह अनूठी परंपरा बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है।
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