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नरक चतुर्दशी आज: छोटी दिवाली पर क्यों जलाया जाता है यमराज के नाम का दीपक, जानें भगवान कृष्ण और नरकासुर की कथा

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 07 Nov 2026 01:29 PM IST
सार

छोटी दिवाली यानी नरक चतुर्दशी 7 नवंबर 2026 को मनाई जा रही है। इस दिन अभ्यंग स्नान, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और यमराज के नाम दीपदान की परंपरा है। जानें, पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध की पौराणिक कथा...

नरक चतुर्दशी को है यम का दीया जलाने की परंपरा।
नरक चतुर्दशी को है यम का दीया जलाने की परंपरा। - फोटो : एआई
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विस्तार
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दीपों के त्योहार दिवाली की रौनक के बीच छोटी दिवाली का अपना विशेष महत्व है। इसे नरक चतुर्दशी, नरक चौदस, रूप चौदस और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। पांच दिवसीय दीपोत्सव का यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा, सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान और यमराज के नाम दीपदान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा और दीपदान करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मकता दूर होती है। इस साल छोटी दिवाली 7 नवंबर 2026, शनिवार को मनाई जा रही है।

आइए जानते हैं पूजा का शुभ मुहूर्त, अभ्यंग स्नान की विधि और नरकासुर वध की पौराणिक कथा।

छोटी दिवाली 2026: कब है नरक चतुर्दशी?
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली मनाई जाती है। इस साल चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट से शुरू हो रही है और 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 47 मिनट पर समाप्त होगी।

उदया तिथि और पर्व की परंपरा के अनुसार, छोटी दिवाली 7 नवंबर, शनिवार को मनाई जा रही है। इस दिन सुबह अभ्यंग स्नान और शाम को यमराज के नाम दीपदान का विशेष महत्व है।

छोटी दिवाली 2026: पूजा और स्नान का शुभ मुहूर्त
छोटी दिवाली पर सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करना शुभ माना जाता है। वहीं, शाम को यमराज के नाम से दीपक जलाने की परंपरा है। इस साल पूजा और स्नान के प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं।
  • छोटी दिवाली: 7 नवंबर 2026, शनिवार
  • चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 7 नवंबर, सुबह 10:47 बजे
  • चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवंबर, सुबह 11:47 बजे
  • अभ्यंग स्नान मुहूर्त: सुबह 5:41 बजे से 6:38 बजे तक
  • चंद्रोदय का समय: शाम 5:41 बजे
  • यम दीपदान मुहूर्त: शाम 5:31 बजे से 5:57 बजे तक
  • सायाह्न संध्या मुहूर्त: शाम 5:31 बजे से 6:50 बजे तक
छोटी दिवाली पर कैसे करें पूजा और अभ्यंग स्नान?
छोटी दिवाली की शुरुआत अभ्यंग स्नान से होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर शरीर पर तिल के तेल की मालिश करनी चाहिए। इसके बाद उबटन लगाकर स्नान करने की परंपरा है। इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से आरोग्य, सौंदर्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

स्नान के बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर पूजा स्थल की सफाई करें। भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं। उन्हें फूल, चंदन, धूप, दीप और मिठाई अर्पित करें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए नरकासुर वध की कथा सुनें।

शाम को घर के मुख्य द्वार, आंगन और पूजा स्थल पर दीपक जलाएं। इस दिन दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के नाम का दीपक जलाने की परंपरा है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार के सदस्यों को सुख-शांति तथा दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। छोटी दिवाली पर जरूरतमंदों को अन्न और वस्त्र का दान करना भी शुभ माना जाता है।

छोटी दिवाली की पौराणिक कथा: भगवान श्रीकृष्ण ने किया था नरकासुर का वध
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में नरकासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर था। उसने अपनी शक्ति और अत्याचारों से तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। वह देवताओं, ऋषि-मुनियों और आम लोगों को परेशान करता था। नरकासुर ने 16 हजार से अधिक कन्याओं को बंदी बना लिया था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर सभी ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी।

कथा के अनुसार, नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसका वध उसकी माता के हाथों ही हो सकता है। नरकासुर की माता भूमिदेवी थीं। भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को भूमिदेवी का अवतार माना जाता है। इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा को साथ लेकर नरकासुर के विरुद्ध युद्ध करने पहुंचे।

युद्ध के दौरान नरकासुर और भगवान श्रीकृष्ण के बीच भीषण संघर्ष हुआ। एक समय ऐसा आया जब नरकासुर के प्रहार से भगवान श्रीकृष्ण ने मूर्छित होने का नाटक किया। यह देखकर सत्यभामा क्रोधित हो गईं और उन्होंने नरकासुर पर बाण चला दिया। इस तरह नरकासुर का अंत हुआ और उसके अत्याचारों से लोगों को मुक्ति मिली।

नरकासुर की मृत्यु के बाद बंदी बनाई गई सभी कन्याओं को मुक्त कराया गया। पौराणिक मान्यता है कि मृत्यु से पहले नरकासुर ने भगवान श्रीकृष्ण से वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु के दिन को लोग शोक के बजाय उत्सव के रूप में मनाएं। भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी यह इच्छा स्वीकार कर ली।

इसके बाद लोगों ने नरकासुर के अंत की खुशी में दीप जलाए और उत्सव मनाया। तभी से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी और छोटी दिवाली के रूप में मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देता है।

छोटी दिवाली पर यमराज के नाम क्यों जलाते हैं दीपक?
छोटी दिवाली पर यमराज के नाम दीपदान करने की विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। इसे यम दीपदान कहा जाता है।

मान्यता है कि यमराज के नाम दीपदान करने से परिवार के सदस्यों को लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन घर के मुख्य द्वार के साथ अन्य स्थानों पर भी दीपक जलाकर रोशनी की जाती है।

छोटी दिवाली का यह पर्व केवल दीप जलाने और उत्सव मनाने तक सीमित नहीं है। यह जीवन से बुराइयों को दूर करने, अच्छे कर्म अपनाने और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने का संदेश भी देता है।

(डिस्क्लेमर : पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित।)
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