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चाक की गति पर निर्भर गांव की रोशनी : कुम्हार के यहां दीयों के साथ बनता पूरे समुदाय की दिवाली का उजाला

डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी, लोक-संस्कृति के अध्येता Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 20 Oct 2025 12:54 AM IST
सार

कार्तिक लोक मान्यता में पवित्र महीना है। भोर की डुबकी, घरों की लीपाई-पुताई, दीयों की रोशनी और कुम्हार के चाक की मिट्टी की महक समाज और आस्था को जोड़ती है। दिवाली और छठ जैसे पर्व व्यक्ति के अहंकार को मिटाकर जीवन में सामूहिकता का भाव भर देते हैं।

लोक-मन, लोक-आस्था और लोक के सबसे  बड़े उत्सव दिवाली का महीना है कार्तिक।
लोक-मन, लोक-आस्था और लोक के सबसे बड़े उत्सव दिवाली का महीना है कार्तिक। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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कार्तिक का महीना हौले-हौले जमीन पर उतर रहा है। जैसे आसमान से ओस की बूंदें दूब पर उतरती हैं। उसमें क्वार की सफेदी और तीखापन नहीं है। सूरज की आभा पीली पड़ रही है। हवा में नमी कम है। धान की फसल घर आ गई है। खेत खाली हैं। रबी की खेती के लिए फिर से जुताई की तैयारी है। हल्की सिहरन पैदा करती ठंड दस्तक दे रही है। यही कार्तिक है। लोक-मन, लोक-आस्था और लोक के सबसे बड़े उत्सव दिवाली का महीना है कार्तिक।

शहर का आदमी तो दिवाली को धनतेरस से जानता है और कैलेंडर से पहचानता है। लेकिन, गांव, खासकर, पूर्वांचल का आदमी, हवा के बदलते रुख, नदी-ताल-तलैया के ठंडे होते पानी और भोर में 'राम-राम' जपते घाट की ओर जाती अपनी माँ या दादी के कदमों की आहट से इसे जानता है। यह व्यक्ति की नहीं, समष्टि की दिवाली है। यह 'मैं' का नहीं, 'हम' का उत्सव है।

पोखरा का जल और आस्था का संगम 

लोक मान्यता है कि कार्तिक स्नान से जीवन में सुख-समृद्धि, आरोग्य, मानसिक शांति मिलती है। पूर्व जन्मों के पाप धुल जाते हैं। इस मास में धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान-पूजा का अधिक महत्व होता है, जिसमें मोक्ष की प्राप्ति का भी उल्लेख मिलता है। लिहाजा, कार्तिक शुरू होते ही स्त्रियां और बूढ़े-बुजुर्ग लोटा-डोरी लेकर निकल पड़ते हैं। गंगा मैया हों, सरजू जी हों, या गांव का कोई पुराना पोखरा, जल तो बस जल है, जिसमें आस्था मिल जाए, तो वह गंगाजल बन जाता है। शीतल जल में डुबकी लगाते ही शरीर कांपता है। पर, मन में एक अजीब-सी ऊष्मा भर जाती है। यह देह को तपाकर आत्मा को जगाने की क्रिया है। तभी तो स्त्रियां गाती हैं - 


‘कातिक मास, पुनीत मास, धरम-करम के मास हो’ 

उनके गीतों में जीवन की सहज लय साफ झलकती है। यह लय उसी माटी से आती है, जिसे वे साल भर अपनी मेहनत से सींचती हैं। कार्तिक का यह नहान दिवाली की पहली तैयारी है -
मन की सफाई, आत्मा की लीपाई-पुताई करने का...।

मिट्टी, भूसा और गोबर से लीपाई-पुताई 

घर की लीपाई-पुताई, तो इसके बाद शुरू होती है। आज के सीमेंट वाले घरों को क्या पता कि पीली मिट्टी, भूसा और गोबर मिलाकर जब दीवारें लीपी जाती थीं, तो घर सिर्फ साफ नहीं होता था, वह सांस लेने लगता था। घर की हर दीवार, हर कोना जीवंत हो उठता था। यह काम किसी एक का नहीं था। चाची माटी सान रही हैं, दीवार पर पहला हाथ फेर रही हैं, तो बच्चे दौड़े-दौड़े पानी ला रहे हैं। एक उत्सव का माहौल, जिसमें सभी भागीदार हैं। आज की डिस्टेंपर और इमल्शन वाली पीढ़ियां, इस सौंदर्य को क्या समझेंगी? उनके लिए तो यह सब पिछड़ापन है। पर, उस गोबर-माटी की गंध में जो पवित्रता थी, जो अपनेपन का अहसास था, वह आज की महंगी दीवारों में कहां? घर की मालकिन हथेलियों से दीवारों पर जो कलाकृतियां बनातीं, वे किसी कला विद्यालय की देन नहीं थीं। वे उनके मन में बसे लोक का प्रतिबिंब थीं, जिसमें सूरज, चंदा, मोर, हाथी की छाप दिखाई देती। तब लोक अपनी कला को जीता था, उसे दीवारों पर सजाकर बेचता नहीं था।


कुम्हार
कुम्हार - फोटो : सोशल मीडिया

चाक की गति पर निर्भर गांव की रोशनी

दिवाली का अर्थशास्त्र भी लोक का अपना अर्थशास्त्र था। यह बाजार का नहीं, समाज का अर्थशास्त्र था। कुम्हार चाक घुमाता, तो सिर्फ दीये नहीं बनते थे, पूरे गांव की दिवाली का उजाला बनता था। चाक की गति पर पूरे गांव की रोशनी निर्भर थी। बच्चे कौतूहल से उसे देखते। गीली माटी कैसे आकार लेती है, फिर आंवे में तपकर दीयाली पकती है। उसमें तेल और बाती पड़ते ही अंधकार के सामने चुनौती खड़ी हो जाती। यह जीवन का सबसे बड़ा दर्शन था। 

कुम्हार के घर से दीये, कलश, मिट्टी के हाथी-घोड़े आते। भरभूंजे के यहां से लाई (लावा-चिवड़ा) आता। हलवाई चीनी के खिलौने बनाता- हाथी, घोड़ा, मछली, ऊंट, बताशे। आज की तरह चॉकलेट नहीं थी, आस्था की मिठास थी। खेत से ताजा ऊख आती, जो छठ पूजा का अनिवार्य हिस्सा थी। दिवाली एक ऐसा चक्र थी, जो गांव के हर छोटे-बड़े कारीगर, हर किसान के जीवन को गति देती थी। पैसा एक हाथ से दूसरे हाथ जाता, लेकिन गांव का पैसा गांव में ही रहता। आज का ऑनलाइन बाजार इस सामाजिक ताने-बाने को कहां समझता है! वह तो बस एक ‘क्लिक’ पर आपकी जरूरत पूरी करता है, आपके पड़ोसी कारीगर की जरूरत को खत्म करके।

स्वास्थ्य और विज्ञान से जुड़ा भोजन

कार्तिक का खानपान! यह जीभ का नहीं, ऋतु का स्वाद था। सिंघाड़े की बेल अभी पोखरों में फैली है। ताजा सिंघाड़े उबालकर खाइए या उसके आटे की पूड़ियां बनाइए। शकरकंद यानी गंजी को भउर (राख की आग) में भूनकर खाने का जो स्वाद था, वह किसी माइक्रोवेव में कहां मिलेगा? नए चावल की महक रसोई में भर जाती। इस चावल का चिवड़ा, साथ में दही और गुड़ - यह कार्तिक का अमृत है। यह भोजन सिर्फ पेट नहीं भरता, यह शरीर को आने वाली सर्दियों के लिए तैयार कर देता। हमारी परंपराएं कितनी वैज्ञानिक थीं, यह आज के ‘डाइट चार्ट’ बनाने वाले भी नहीं समझ सकते। हमारे पुरखों ने भोजन को ऋतु से, स्वास्थ्य से और उत्सव से जोड़कर जीवन का एक संपूर्ण विज्ञान रचा था।
हर देहरी, हर मुंडेर, हर आंगन, यहां तक कि तुलसी चौरा और कुएं की जगत पर भी जलते दीयों की पंक्तियां अंधेरे को चुनौती देती हैं।
हर देहरी, हर मुंडेर, हर आंगन, यहां तक कि तुलसी चौरा और कुएं की जगत पर भी जलते दीयों की पंक्तियां अंधेरे को चुनौती देती हैं। - फोटो : गांव जंक्शन

पांच रातों का उत्सव  

फिर आती थीं वे पांच रातें। धनतेरस पर गांव का आदमी सोना-चांदी नहीं; पीतल का एक लोटा या कांसे की थाली खरीदता। यह समृद्धि का प्रतीक था। दिखावे का नहीं, जरूरत का। नई फसल का पैसा जब घर आता, तो सबसे पहले घर के लिए एक बर्तन खरीदा जाता – अन्नपूर्णा का सम्मान। नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली को घर के बाहर घूरे पर एक पुराना, दीया जलाया जाता, ताकि काल की अनिष्ट छाया से घर-परिवार सुरक्षित रहे। इसे ‘जम का दीया’ कहते थे। यह दारिद्र को, घर की नकारात्मकता को बाहर खदेड़ने का टोटका था। यह लोक-मन का मनोवैज्ञानिक उपचार था।

...और फिर दिवाली की रात। अमावस का घना अंधेरा। पर, उस रात कोई अंधेरे से डरता नहीं था। 

हर देहरी, हर मुंडेर, हर आंगन, यहां तक कि तुलसी चौरा और कुएं की जगत पर भी जलते दीयों की पंक्तियां उस अंधेरे को चुनौती देती। ये दीये सिर्फ रोशनी नहीं थे, ये सामूहिक जिजीविषा और, अंधकार पर विजय पाने की मानवीय इच्छाशक्ति का प्रतीक थे। पूरा गांव एक साथ जागता। पटाखों का शोर नहीं है, कहीं एक-आध 'छुछूंदर' या 'अनार' जल गया तो जल गया। असली धूम तो थी मिलने-मिलाने की, लाई-चिवड़ा और मिठाई बांटने की। कई घरों में इस रात लक्ष्मी-गणेश के साथ रतजगा होता।

अगले दिन ‘दलिद्दर’ खेदते हैं। एक दम भोर में ही। सूरज के जगने से पहले माई-बहनें सूप पीटकर कंडा से दलिद्दर भगातीं, ताकि घर विपत्ति, आफत से बचा रहे। दलिद्दर (दरिद्रता या गरीबी) को घर-बार और जीवन से दूर भगाने की इच्छा से यह परंपरा शुरू हुई। लोक-मान्यता है कि यदि घर के कूड़े-करकट, आलस्य, निर्धनता और नकारात्मकता को त्याग दिया जाए तो लक्ष्मी (यानी समृद्धि), घर में प्रवेश करती हैं। इसके अगले दिन गोधन कूटने की परंपरा निभाते हैं। स्त्रियां मूसल से गोबर के बनाए 'गोधन’ को कूटती थीं और गाती थीं-‘कवने भइया जाले अहेरिया।’ यह भाई के जीवन से हर विपत्ति, हर अभाव हर लेने का सामूहिक प्रहार था। यह एक प्रतीकात्मक कर्मकांड था, जो समाज को यह विश्वास दिलाता कि हम अपनी मेहनत से, अपनी एकता से हर अभाव को दूर कर सकते हैं।
दिवाली की रोशनी के बाद छठ का सामूहिक विश्वास लोकजीवन को पूर्ण करता है। 
दिवाली की रोशनी के बाद छठ का सामूहिक विश्वास लोकजीवन को पूर्ण करता है।  - फोटो : गांव जंक्शन

छठ महापर्व की छटा  

फिर, लोक आस्था का महापर्व छठ आता। अपनी पूरी पवित्रता के साथ। इस दिन घाट-तालाब-नदी पर लाखों श्रद्धालु उदयाचल और अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। लोक-मानस की सादगी, स्त्रियों के व्रत का कठोर तप और घाटों पर गूंजते गीत - ‘केलवा के पात पऽ...।’ छठ अनुशासन, श्रम और आस्था का पर्व है। दिवाली की रोशनी के बाद छठ का यह सामूहिक विश्वास लोकजीवन को पूर्ण करता है। 


देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी और भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप के विवाह का अनुष्ठान किया जाता है।
देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी और भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप के विवाह का अनुष्ठान किया जाता है। - फोटो : एआई

तुलसी विवाह और आस्था का उत्सव

इसी कार्तिक के महीने में लोक-परंपरा तुलसी विवाह का उत्सव भी मनाती है, जब यह गीत गाया जाता - ‘ए मइया तुलसी कवन घरे जइबू।’ तुलसी विवाह का सनातन धर्म में अत्यंत विशिष्ट महत्व है। तुलसी मैया (वृंदा) और भगवान विष्णु (शालिग्राम) के प्रतीकात्मक मिलन का पर्व भर नहीं है, यह भक्ति, समर्पण और पर्यावरण चेतना 
का भी उत्सव है। 

वाट्सएप संदेशों में सिमटती दिवाली 

आज दिवाली चीनी झालरों और वाट्सएप संदेशों में सिमट रही है। बाजार ने इसे इवेंट बना दिया है। फिर भी, जब किसी देहरी पर आज भी मिट्टी का दीया टिमटिमाता है, जब छठ के घाट पर कोई स्त्री अर्घ्य देती है, तब लगता है लोक-उत्सव अभी जिंदा हैं। अंधेरे को चुनौती देते उस छोटे दीये में उम्मीद अब भी जीवित है।


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