लोक मान्यता है कि कार्तिक स्नान से जीवन में सुख-समृद्धि, आरोग्य, मानसिक शांति मिलती है। पूर्व जन्मों के पाप धुल जाते हैं। इस मास में धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान-पूजा का अधिक महत्व होता है, जिसमें मोक्ष की प्राप्ति का भी उल्लेख मिलता है। लिहाजा, कार्तिक शुरू होते ही स्त्रियां और बूढ़े-बुजुर्ग लोटा-डोरी लेकर निकल पड़ते हैं। गंगा मैया हों, सरजू जी हों, या गांव का कोई पुराना पोखरा, जल तो बस जल है, जिसमें आस्था मिल जाए, तो वह गंगाजल बन जाता है। शीतल जल में डुबकी लगाते ही शरीर कांपता है। पर, मन में एक अजीब-सी ऊष्मा भर जाती है। यह देह को तपाकर आत्मा को जगाने की क्रिया है। तभी तो स्त्रियां गाती हैं -
घर की लीपाई-पुताई, तो इसके बाद शुरू होती है। आज के सीमेंट वाले घरों को क्या पता कि पीली मिट्टी, भूसा और गोबर मिलाकर जब दीवारें लीपी जाती थीं, तो घर सिर्फ साफ नहीं होता था, वह सांस लेने लगता था। घर की हर दीवार, हर कोना जीवंत हो उठता था। यह काम किसी एक का नहीं था। चाची माटी सान रही हैं, दीवार पर पहला हाथ फेर रही हैं, तो बच्चे दौड़े-दौड़े पानी ला रहे हैं। एक उत्सव का माहौल, जिसमें सभी भागीदार हैं। आज की डिस्टेंपर और इमल्शन वाली पीढ़ियां, इस सौंदर्य को क्या समझेंगी? उनके लिए तो यह सब पिछड़ापन है। पर, उस गोबर-माटी की गंध में जो पवित्रता थी, जो अपनेपन का अहसास था, वह आज की महंगी दीवारों में कहां? घर की मालकिन हथेलियों से दीवारों पर जो कलाकृतियां बनातीं, वे किसी कला विद्यालय की देन नहीं थीं। वे उनके मन में बसे लोक का प्रतिबिंब थीं, जिसमें सूरज, चंदा, मोर, हाथी की छाप दिखाई देती। तब लोक अपनी कला को जीता था, उसे दीवारों पर सजाकर बेचता नहीं था।
दिवाली का अर्थशास्त्र भी लोक का अपना अर्थशास्त्र था। यह बाजार का नहीं, समाज का अर्थशास्त्र था। कुम्हार चाक घुमाता, तो सिर्फ दीये नहीं बनते थे, पूरे गांव की दिवाली का उजाला बनता था। चाक की गति पर पूरे गांव की रोशनी निर्भर थी। बच्चे कौतूहल से उसे देखते। गीली माटी कैसे आकार लेती है, फिर आंवे में तपकर दीयाली पकती है। उसमें तेल और बाती पड़ते ही अंधकार के सामने चुनौती खड़ी हो जाती। यह जीवन का सबसे बड़ा दर्शन था।
कुम्हार के घर से दीये, कलश, मिट्टी के हाथी-घोड़े आते। भरभूंजे के यहां से लाई (लावा-चिवड़ा) आता। हलवाई चीनी के खिलौने बनाता- हाथी, घोड़ा, मछली, ऊंट, बताशे। आज की तरह चॉकलेट नहीं थी, आस्था की मिठास थी। खेत से ताजा ऊख आती, जो छठ पूजा का अनिवार्य हिस्सा थी। दिवाली एक ऐसा चक्र थी, जो गांव के हर छोटे-बड़े कारीगर, हर किसान के जीवन को गति देती थी। पैसा एक हाथ से दूसरे हाथ जाता, लेकिन गांव का पैसा गांव में ही रहता। आज का ऑनलाइन बाजार इस सामाजिक ताने-बाने को कहां समझता है! वह तो बस एक ‘क्लिक’ पर आपकी जरूरत पूरी करता है, आपके पड़ोसी कारीगर की जरूरत को खत्म करके।
फिर आती थीं वे पांच रातें। धनतेरस पर गांव का आदमी सोना-चांदी नहीं; पीतल का एक लोटा या कांसे की थाली खरीदता। यह समृद्धि का प्रतीक था। दिखावे का नहीं, जरूरत का। नई फसल का पैसा जब घर आता, तो सबसे पहले घर के लिए एक बर्तन खरीदा जाता – अन्नपूर्णा का सम्मान। नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली को घर के बाहर घूरे पर एक पुराना, दीया जलाया जाता, ताकि काल की अनिष्ट छाया से घर-परिवार सुरक्षित रहे। इसे ‘जम का दीया’ कहते थे। यह दारिद्र को, घर की नकारात्मकता को बाहर खदेड़ने का टोटका था। यह लोक-मन का मनोवैज्ञानिक उपचार था।
...और फिर दिवाली की रात। अमावस का घना अंधेरा। पर, उस रात कोई अंधेरे से डरता नहीं था।
फिर, लोक आस्था का महापर्व छठ आता। अपनी पूरी पवित्रता के साथ। इस दिन घाट-तालाब-नदी पर लाखों श्रद्धालु उदयाचल और अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। लोक-मानस की सादगी, स्त्रियों के व्रत का कठोर तप और घाटों पर गूंजते गीत - ‘केलवा के पात पऽ...।’ छठ अनुशासन, श्रम और आस्था का पर्व है। दिवाली की रोशनी के बाद छठ का यह सामूहिक विश्वास लोकजीवन को पूर्ण करता है।
आज दिवाली चीनी झालरों और वाट्सएप संदेशों में सिमट रही है। बाजार ने इसे इवेंट बना दिया है। फिर भी, जब किसी देहरी पर आज भी मिट्टी का दीया टिमटिमाता है, जब छठ के घाट पर कोई स्त्री अर्घ्य देती है, तब लगता है लोक-उत्सव अभी जिंदा हैं। अंधेरे को चुनौती देते उस छोटे दीये में उम्मीद अब भी जीवित है।