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दीपोत्सव के कई रंग: कहीं राम, कहीं कृष्ण, कहीं काली, तो कहीं बलि - बंगाल से गुजरात तक, हर आंगन की अपनी दिवाली

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sun, 08 Nov 2026 01:46 PM IST
सार

जगमगाते दीये, रंगबिरंगी रंगोली, मिठाइयों के डिब्बे और परिजनों से भरा घर, दिवाली का यही चित्र हमारे मन में उभरता है। पर, त्योहारों के मौसम में देश की यात्रा करें तो पता चलता है कि दिवाली हर जगह एक जैसी नहीं दिखती। कहीं देवी काली केंद्र में हैं, कहीं भोर से पहले श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय का उत्सव होता है, तो कहीं दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा होती है। जानिए, विस्तार से...

दिवाली पर अलग-अलग रीतियां और परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं।
दिवाली पर अलग-अलग रीतियां और परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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दिवाली का अर्थ केवल दीये, रंगोली और मिठाइयां नहीं है। बंगाल में इस रात काली की आराधना होती है, तमिलनाडु में भोर से उत्सव शुरू होता है, उत्तर भारत में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परंपरा है, महाराष्ट्र में बलि प्रतिपदा मनाई जाती है और गुजरात में नया साल शुरू होता है। गोवा में नरकासुर के पुतले जलते हैं, तो पंजाब में सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस मनाता है। रीति-रिवाज अलग हैं, पर आशा, कृतज्ञता, नवीनता और मेल-मिलाप का भाव हर जगह एक है।

पश्चिम बंगाल : शक्ति स्वरूपा काली की आराधना
बंगाल में दिवाली की रात काली पूजा से जुड़ी है। देश के कई घरों में जब लक्ष्मी पूजन होता है, तब यहां श्रद्धालु मां काली से सुरक्षा और शक्ति की कामना करते हैं। मंदिर और सामुदायिक पंडाल सजते हैं, देवी की भव्य प्रतिमाएं आकर्षण का केंद्र बनती हैं, और परिवार दीप जलाकर, भोग अर्पित कर और पंडालों में जाकर आशीर्वाद लेते हैं। काली को उग्र और शक्तिशाली रूप में पूजा जाता है, जो बुराई का नाश कर भक्तों की रक्षा करती हैं।

तमिलनाडु और दक्षिण भारत : भोर की दीपावली
कई तमिल परिवारों में दीपावली का उत्सव नरक चतुर्दशी की सुबह से शुरू हो जाता है, जो पारंपरिक पांच दिवसीय क्रम में दिवाली की रात से एक दिन पहले आती है। यह दिन श्रीकृष्ण द्वारा क्रूर शासक नरकासुर के वध की स्मृति है, जो अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है।

लोग सूर्योदय से पहले जागते हैं, पारंपरिक तेल-स्नान करते हैं, नए वस्त्र पहनते हैं, उत्सव का नाश्ता करते हैं और मिठाई-नमकीन बांटते हैं। तमिलनाडु में 'दीपावली मरुंदु' नाम की पारंपरिक हर्बल औषधि भी बनाई जाती है, जो भारी पकवानों का संतुलन बनाने वाली मानी जाती है।

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी दीपावली मनाई जाती है, जहां जोर सुबह की रीतियों, पारिवारिक मेल-मिलाप और उत्सवी भोजन पर रहता है।

उत्तर भारत: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट
उत्तर भारत के कई परिवारों में उत्सव दिवाली की रात के बाद भी चलता है, अगले दिन गोवर्धन पूजा के रूप में। कथा है कि श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर वृंदावन के लोगों और पशुओं को मूसलाधार बारिश से बचाया था। यह प्रसंग विनम्रता, समुदाय और प्रकृति के प्रति सम्मान की याद दिलाता है। मंदिरों और घरों में 'अन्नकूट' यानी अन्न का पर्वत सजाया जाता है और तरह-तरह के व्यंजन देवताओं को अर्पित किए जाते हैं। श्रीकृष्ण से जुड़े मथुरा और वृंदावन में इस पूजा का विशेष महत्व है।

महाराष्ट्र : दिवाली पड़वा पर राजा बलि का स्मरण
महाराष्ट्र में दिवाली के अगले दिन 'दिवाली पड़वा' यानी बलि प्रतिपदा मनाई जाती है। यह दिन उदार और शक्तिशाली राजा बलि से जुड़ा है। एक लोकप्रिय कथा के अनुसार भगवान विष्णु वामन रूप में बलि के सामने आए और तीन पग भूमि मांगी।

वामन ने विराट रूप लेकर दो पगों में धरती और आकाश नाप लिए, और तीसरे पग के लिए बलि ने अपना शीश अर्पित कर दिया। अलग-अलग परंपराओं में इस कथा की व्याख्या भिन्न है, पर बलि प्रतिपदा राजा की उदारता और प्रजा से उनके जुड़ाव से जोड़ी जाती है। इस दिन परिवारों का मिलना-जुलना, उत्सव का भोजन और रिश्तों का उत्सव होता है।

गुजरात : दिवाली और नववर्ष का आरंभ
गुजरात में दिवाली गुजराती नववर्ष से जुड़ी है, जो मुख्य दिवाली के अगले दिन आता है। घर और दुकानें साफ-सुथरी और सजी होती हैं, द्वार रंगोली से दमकते हैं और लोग शुभकामनाओं व मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं।

कई व्यवसायी 'चोपड़ा पूजन' करते हैं, जिसमें बही-खातों की पूजा कर नए वित्तीय वर्ष की शुभ शुरुआत मानी जाती है। व्यापारियों के लिए यह समृद्धि और सफलता के आशीर्वाद का अवसर है, और परिवारों के लिए अपनों से मिलने तथा नई शुरुआत का स्वागत करने का।

गोवा : जीवंत होती नरकासुर की कथा
गोवा में दिवाली के मौसम का सबसे अनोखा दृश्य नरकासुर के विशाल पुतले हैं। स्थानीय समुदाय बांस, कागज और कपड़े से रंगीन पुतले बनाते हैं, जो मोहल्लों के उत्सवों में सजाए जाते हैं और नरक चतुर्दशी की भोर से पहले जलाए जाते हैं।

कथा के अनुसार अत्याचारी बन चुका नरकासुर श्रीकृष्ण के हाथों पराजित हुआ, और कुछ कथाओं में सत्यभामा की भूमिका का भी उल्लेख है। पुतले बुराई की पराजय का प्रतीक हैं, और उन्हें बनाने की प्रक्रिया कला, सहयोग और साझा उत्सव से समुदाय को जोड़ती है।

पंजाब और सिख समुदाय : बंदी छोड़ दिवस
दिवाली के आसपास सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस मनाता है, जो गुरु हरगोबिंद साहिब जी की कैद से रिहाई की स्मृति है। सिख परंपरा के अनुसार गुरु जी ने यह सुनिश्चित किया कि कैद 52 अन्य राजा भी उनके साथ मुक्त हों।

यह दिन स्वतंत्रता, न्याय और दूसरों के लिए खड़े होने का प्रतीक है। गुरुद्वारे रोशनी से जगमगाते हैं, कीर्तन और अरदास गूंजते हैं और परिवार एकत्र होते हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में यह पर्व विशेष महत्व रखता है, जहां रोशनी से नहाया परिसर श्रद्धालुओं का केंद्र बन जाता है।

जो सबको जोड़ता है...
बंगाल की काली पूजा से दक्षिण की नरक चतुर्दशी तक, दिवाली भारत की अनेक संस्कृतियों, आस्थाओं और कथाओं को प्रतिबिंबित करती है। रीतियां भिन्न हैं, पर आशा, कृतज्ञता, नवीनता और साथ-साथ होने का भाव हर उत्सव में बहता है।
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