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तरबूज-खरबूज से लेकर सब्जियां : फसल जल्दी तैयार कर बाजार में पहले पहुंचें किसान, लो टनल तकनीक से मिलेगी मदद
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Fri, 23 Oct 2026 06:27 PM IST
सार
लो टनल तकनीक से तरबूज, खरबूजा, खीरा, लौकी और करेले की अगेती खेती में मदद मिल सकती है। जानें लो टनल फिल्म लगाने, तापमान नियंत्रित करने और फसल की देखभाल का तरीका।
लो-टनल संरक्षित खेती की बेहतरीन तकनीक
- फोटो : गांव जंक्शन
अगर आप फसल को सामान्य मौसम से पहले तैयार कर बाजार में पहुंचाना चाहते हैं, तो लो टनल तकनीक मददगार हो सकती है। इस तकनीक में फसल की कतारों के ऊपर प्लास्टिक फिल्म से कम ऊंचाई वाली सुरंग जैसी संरचना बनाई जाती है। इससे ठंड के दौरान छोटे पौधों को गर्म वातावरण मिलता है और फसल की शुरुआती बढ़वार में मदद मिलती है। इस तरह किसान फसल की बुवाई और उत्पादन को पहले शुरू करने की कोशिश कर सकते हैं।
ऐसे करें लो टनल तकनीक से खेती
एक्सपर्ट के मुताबिक, लो टनल से बेहतर परिणाम पाने के लिए खेत में उठी हुई क्यारियां बनाएं। ड्रिप सिंचाई और मल्च का इस्तेमाल करें। पौधों के बीच उचित दूरी रखें और प्लास्टिक फिल्म को सहारा देने के लिए हूप यानी अर्धगोलाकार ढांचे सही दूरी पर लगाएं। इन व्यवस्थाओं से शुरुआती अवस्था में फसल को ठंड से बचाने में मदद मिल सकती है।
30 माइक्रोन की प्लास्टिक फिल्म का इस्तेमाल
एग्रीप्लास्ट की 30 माइक्रोन एलडीपीई लो टनल फिल्म को अल्ट्रावायलेट (यूवी) किरणों से सुरक्षा देने के लिए तैयार किया गया है। इसमें एंटी-ड्रिप गुण भी हैं, जिससे फिल्म के अंदर पानी की बूंदें बनने की समस्या को कम करने में मदद मिलती है। यह फिल्म 2 मीटर और 4 मीटर चौड़ाई में उपलब्ध है। इस तकनीक का इस्तेमाल तरबूज, खरबूजा, लौकी, करेला और खीरा जैसी फसलों में किया जा सकता है।
लो टनल में रोजाना देखभाल जरूरी
लो टनल लगाने के बाद फसल की नियमित निगरानी करना जरूरी है। तापमान बढ़ने पर सुरंग में हवा आने-जाने की व्यवस्था करें, ताकि अंदर ज्यादा गर्मी न हो। ठंडी रातों में जरूरत के अनुसार फिल्म को बंद रखें। फिल्म पूरी तरह हटाने से पहले पौधों को धीरे-धीरे बाहर के वातावरण के अनुकूल बनाएं।
ध्यान रखें : लो टनल तकनीक फसल को जल्दी स्थापित करने और उत्पादन पहले शुरू करने में मदद कर सकती है, लेकिन सही समय पर हवा देना, तापमान पर नजर रखना और फसल की देखभाल करना जरूरी है। इससे किसान शुरुआती बाजार में फसल पहुंचाने का अवसर पा सकते हैं।
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