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टेनिस बॉल जैसी गेंदे की नई किस्म : मिलते हैं बेहतर दाम, किसानों की बेहतर कमाई, अब ऑर्किड पर भी काम

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 24 Oct 2026 11:28 AM IST
सार

क्रिस्टल क्रॉप की गेंदे की ‘विजेता’ संकर किस्म अपने गोल आकार और 20-25 दिन तक भंडारण की खासियत के लिए चर्चा में है। जानें गेंदे की खेती, फूलों के दाम और ऑर्किड की नई भारतीय किस्मों के बारे में।

गेंदे के फूलों में मुनाफे की महक
गेंदे के फूलों में मुनाफे की महक - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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गेंदे की खेती करने वाले किसानों के लिए फूलों की एक नई संकर किस्म बेहतर कमाई का जरिया बन रही है। क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड (CCPL) ने गेंदे की ‘विजेता’ किस्म विकसित की है। गेंदे की इस किस्म की खासियत इसका टेनिस बॉल जैसा गोल आकार, मजबूत बनावट और लंबे समय तक ताजा बने रहना है। इसकी मांग बढ़ने के साथ विदेशी कंपनियां भी भारत में गेंदे की खेती और इसके निर्यात की संभावनाएं तलाशने लगी हैं।

कंपनी के मुताबिक, गेंदे की इस संकर किस्म के बीज अब उसके बीज कारोबार में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले उत्पाद बन गए हैं। कंपनी ने इस किस्म पर शोध वर्ष 2012 में शुरू किया था और 2014 में इसे विकसित करने में सफलता मिली।

20-25 दिन तक कोल्ड स्टोरेज में रखा जा सकता है फूल
क्रिस्टल क्रॉप के वेजिटेबल एंड फ्लावर सीड्स बिजनेस हेड अनुराग बाजपेयी ने बिजनेस लाइन को बताया कि गेंदे की ‘विजेता’ किस्म की मांग बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। इसका फूल टेनिस बॉल जैसा गोल होता है और इसकी शेल्फ लाइफ यानी ताजा बने रहने की अवधि अधिक है। इसे कोल्ड स्टोरेज में 20 से 25 दिन तक रखा जा सकता है।

इस फूल की एक और खासियत यह है कि दबने के बाद भी यह काफी हद तक अपना आकार वापस पा लेता है। इससे दूर के बाजारों तक फूल पहुंचाने में नुकसान का जोखिम कम होता है। कंपनी के मुताबिक, कुछ जगहों पर यह किस्म गुलदाउदी की जगह भी ले रही है।

त्योहारों में 60 से 100 रुपये किलो तक पहुंचते हैं दाम
त्योहारों और शादी-विवाह के दौरान गेंदे के फूलों की मांग बढ़ जाती है। कंपनी के अधिकारियों के मुताबिक, दिवाली जैसे त्योहारों पर फूल के दाम 60 से 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकते हैं। आम तौर पर किसानों को 50 से 60 रुपये प्रति किलो के आसपास भाव मिलता है, हालांकि वास्तविक कीमत बाजार और मांग के हिसाब से बदलती रहती है।

कर्नाटक के कोलार के पास काजिकलहल्ली गांव के किसान केएन चंद्रशेखरन ‘विजेता’ किस्म की खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस किस्म की पैदावार अच्छी है और त्योहारों के दौरान उन्हें फूल का भाव 80 रुपये प्रति किलो तक मिल जाता है। पहले वह गुलदाउदी की खेती करते थे, लेकिन अब गेंदे से बेहतर कमाई हो रही है। इसी क्षेत्र के एक अन्य किसान पिल्ले गौड़ा के अनुसार, वह गेंदे की खेती इसके आकार, बनावट और पैदावार को देखते हुए करते हैं। उनके मुताबिक, इसकी पैदावार 10 टन तक पहुंच सकती है।

मजबूत पौधा, गिरने का खतरा कम
कंपनी के अनुसंधान एवं विकास प्रमुख राममोहन जी के मुताबिक, गेंदे की इस संकर किस्म का पौधा चार फीट से अधिक ऊंचा हो सकता है। इसका तना मजबूत होता है, जिससे पौधे के गिरने यानी जमीन पर झुकने का खतरा कम रहता है। कंपनी अब गेंदे की पीले रंग वाली एक नई संकर किस्म भी विकसित करने की योजना बना रही है। फिलहाल ‘विजेता’ किस्म नारंगी रंग के फूल देती है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग इस्तेमाल
देश के अलग-अलग हिस्सों में गेंदे के फूलों का इस्तेमाल अलग तरीके से होता है। उत्तर भारत में धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा के लिए पूरे फूल का उपयोग किया जाता है, जबकि दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में, इसकी पंखुड़ियों से मालाएं बनाई जाती हैं।

कंपनी का कहना है कि धार्मिक आयोजनों और त्योहारों में बढ़ती मांग ने गेंदे की इस किस्म को लोकप्रिय बनाने में मदद की है। किसानों के लिए इसकी अच्छी पैदावार, टिकाऊपन और बाजार में मांग कमाई के अवसर बढ़ा सकती है।

ऑर्किड की भारतीय संकर किस्में विकसित करने की तैयारी
गेंदे के बाद क्रिस्टल क्रॉप अब ऑर्किड के क्षेत्र में भी काम कर रही है। कंपनी के अधिकारियों के अनुसार, भारत हर साल करीब 30 करोड़ रुपये के ऑर्किड आयात करता है। घरेलू स्तर पर संकर किस्में विकसित होने से किसानों और खरीदारों को कम कीमत पर पौधे उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

कंपनी के बायोटेक प्रमुख पुरुषोत्तम एमजी के मुताबिक, कंपनी ने स्थानीय आनुवंशिक संसाधनों और टिश्यू कल्चर तकनीक की मदद से ऑर्किड की भारतीय संकर किस्में विकसित की हैं। कंपनी का दावा है कि इनसे आयातित ऑर्किड के मुकाबले सस्ते विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। एक स्थानीय ऑर्किड की कीमत 400 रुपये से कम रखने की बात भी कही गई है।

कंपनी की योजना भविष्य में ऑर्किड के साथ चमेली और गुलाब के बीजों का उत्पादन शुरू करने की भी है। इसके लिए वह स्वतंत्र पौध उत्पादकों के साथ काम कर रही है, ताकि तैयार पौधों को बाजार तक पहुंचाया जा सके। इससे इन फूलों की खेती करने वाले किसानों की संख्या बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
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