एक विश्लेषण के अनुसार, अगस्त महीने से चीनी, दूध और मिठाइयों की कीमतों में अचानक हुए इजाफे के कारण त्योहारी सीजन में आम आदमी का बजट बिगड़ गया है। सितंबर में भी इन चीजों के दाम बढ़ते रहे। खुदरा महंगाई में खाद्य और ईंधन के बढ़ते दामों के कारण सितंबर में यह लगभग दो साल के उच्चतम स्तर 5.5 प्रतिशत पर पहुंच गई है। ध्यान रहे कि चीनी, दूध और दूध से बने उत्पाद हमारे भोजन का अहम हिस्सा हैं।
तेजी से बढ़ा चीनी की महंगाई का ग्राफ
यह विश्लेषण सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के डेटा प्लेटफॉर्म 'ई-सांख्यिकी' (eSankhyiki) के तीन महीने के आंकड़ों पर आधारित है, जो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) से जुड़ा है।
आंकड़ों के अनुसार, पूरे भारत के स्तर पर जुलाई में चीनी की महंगाई दर 4.92 प्रतिशत थी। यह अगस्त में उछलकर 24 प्रतिशत से अधिक हो गई और सितंबर में लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई। 12 बड़े राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, जुलाई में चीनी की महंगाई 3.37 से 6.29 प्रतिशत के बीच थी, जो सितंबर में बढ़कर 25 से 35 प्रतिशत के बीच हो गई।
जुलाई में इन 12 राज्यों में पश्चिम बंगाल में महंगाई सबसे कम और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा थी। लेकिन सितंबर आते-आते यह स्थिति बदल गई। सितंबर में उत्तर प्रदेश और केरल सबसे कम महंगाई वाले (निचले दो) राज्य बन गए, जबकि तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश सबसे ज्यादा महंगाई वाले (शीर्ष दो) राज्य बन गए।
उत्तर प्रदेश में दाम नियंत्रण में क्यों और तमिलनाडु में क्यों बढ़े?
उत्तर प्रदेश के सूत्रों के अनुसार, यूपी के पश्चिमी, मध्य और पूर्वी—सभी क्षेत्रों में चीनी मिलें फैली हुई हैं। इससे सरकार को राज्य की चीनी की मांग पूरी करने के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। इसके अलावा, आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए राज्य सरकार मिलों पर सख्ती बरत रही है और यह सुनिश्चित कर रही है कि कीमतें बेकाबू न हों।
वहीं, तमिलनाडु (जहां सितंबर में चीनी की महंगाई सबसे ज्यादा रही) की स्थिति के बारे में ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) के अध्यक्ष प्रफुल्ल विठलानी ने बताया कि एक समय था जब तमिलनाडु में इतना अधिक चीनी उत्पादन होता था कि वह अपना बचा हुआ माल केरल को बेचता था।
विठलानी के अनुसार, "समय के साथ तमिलनाडु में चीनी का उत्पादन काफी निचले स्तर पर आ गया है, जिस कारण तमिलनाडु और केरल दोनों राज्यों के व्यापारी मांग पूरी करने के लिए कर्नाटक और महाराष्ट्र से चीनी खरीद रहे हैं। इसमें परिवहन (ट्रांसपोर्ट) और अन्य खर्चे जुड़ जाने के कारण कीमतें पूरे भारत में लगभग सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं।"
दूध की महंगाई: केरल सबसे ऊपर, कर्नाटक में राहत
अध्ययन में शामिल 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दूध की महंगाई के मामले में केरल सबसे ऊपर है। इसके बाद तमिलनाडु और महाराष्ट्र का नंबर आता है। वहीं, कर्नाटक में दूध की महंगाई सबसे कम है।
अमूल के पूर्व एमडी और इंडियन डेयरी एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष आर. एस. सोढ़ी के अनुसार, कर्नाटक में राज्य सरकार की तरफ से 6 रुपये प्रति लीटर की सब्सिडी दी जाती है। इस वजह से वहां सहकारी ब्रांड के दूध की कीमतें अन्य राज्यों की तुलना में 8 से 10 रुपये प्रति लीटर कम हैं। उन्होंने बताया, "महाराष्ट्र और केरल में दूध की कीमतों में अन्य जगहों की तुलना में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है।"
उद्योग के सूत्रों के अनुसार, दूध की कीमतों में यह बढ़ोतरी उत्पादन और संचालन खर्च बढ़ने के कारण हुई है। विभिन्न रिपोर्टों से पता चलता है कि सामान्य से कम बारिश (मानसून) होने के कारण कई राज्यों में पशुओं के चारे की कीमतों में बहुत तेजी से (दहाई के अंकों में) बढ़ोतरी हुई है। साथ ही, डीजल के दाम बढ़ने से परिवहन (ढुलाई) का खर्च भी काफी बढ़ गया है, जिसका सीधा असर दूध की कीमतों पर पड़ा है।