बाजरा किसानों के लिए बड़ी खबर है। स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने कम बारिश वाले इलाकों के लिए बजारे की दो नई हाइब्रिड किस्मों का विकाय किया है। इन नई किस्मों का मकसद जल की कम उपलब्धता वाले इलाकों में बजारे की खेती को बेहतर विकल्प बनाना है।
विश्वविद्यालय ने इन किस्मों का नाम बीएचपी 1202 और बीएचपी 1602 रखा है। विश्वविद्यालय के अनुसंधान अधिकारी डॉ. एन.के. शर्मा के अनुसार, संस्थान में शुष्क क्षेत्रों को ध्यान में रखकर लगातार शोध किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि हाल ही में आरएचबी 233 और आरएचबी 234 नाम की दो दूसरी किस्में भी सामने आई हैं।
70 से 75 दिन में पकने वाली किस्मों के विकास पर फोकस
कम बारिश वाले इलाकों में बाजरे की फसल को पकने में लगने वाला समय काफी अहम होता है। इस समय बाजरे की अलग-अलग किस्मों के विकास में लगभग 65-70 दिन से 90 से 95 दिन का समय लगता है। विश्वविद्यालय ऐसी बाजरा किस्मों के विकास पर जोर देरा है, जो 70 से 75 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। कम समय में पकने वाली किस्में शुष्क क्षेत्रों के लिए काफी उपयोगी होती है, क्योंकि ये किस्में मिट्टी में मौजूद सीमित नमी को कम समय में उपयोग कर सकती हैं।
उन्होंने बताया कि राज 171, जेवीवी-2 और दाह शक्ति जैसी किस्में भी क्षेत्र में सराही जाती हैं। किसानों को जमीन की स्थिति, पानी की उपलब्धता और स्थानीय मौसम को ध्यान में रखकर बीजों का चयन करना चाहिए।