अक्टूबर-नवंबर में अक्सर प्याज के दाम बढ़ने लगते हैं। ऐसे समय में बाजार में प्याज की आवक कम होने से किसानों को बेहतर भाव मिलने की संभावना रहती है। रबी सीजन की प्याज की फसल सितंबर तक खत्म हो जाती है, इसके बाद बाजार की मांग पूरी करने के लिए दूसरे राज्यों से प्याज आती है। ऐसे में खरीफ सीजन में प्याज की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का विकल्प बन सकती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वांचल में आमतौर पर खरीफ में प्याज की खेती कम होती है। इसकी सबसे बड़ी वजह बारिश है। लगातार बारिश से खेत में पानी भरने और प्याज के पौधों में गलन जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए किसान ‘शेड्स’ तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस तरीके में प्याज की छोटी गांठें पहले से तैयार करके जुलाई में खेत में रोपी जाती हैं।
शेड्स तकनीक क्या है?
इस तकनीक की तैयारी प्याज की रोपाई से कई महीने पहले शुरू करनी होती है। फरवरी-मार्च में छोटे आकार के काले प्याज के बीज से नर्सरी तैयार की जाती है। जब नर्सरी में प्याज के बल्ब करीब 1.5 से 2 सेंटीमीटर आकार के हो जाते हैं तो उन्हें कुछ समय खेत में ही बढ़ने दिया जाता है। पत्तियां निकलने के बाद पौधों पर रोलर या खाली ड्रम चलाया जाता है। इससे पत्तियां सूखने लगती हैं और प्याज के बल्ब की बढ़वार रुक जाती है।
इसके बाद अप्रैल, मई या जून में इन छोटे बल्बों को खेत से निकाल लिया जाता है। इन्हें पत्तियों समेत रस्सी से बांधकर ऐसी जगह लटका दिया जाता है, जहां नमी और बारिश से सुरक्षित रखा जा सके। इसी तरह तैयार किए गए 1.5 से 2 सेंटीमीटर के छोटे बल्बों को ‘शेड्स’ कहा जाता है।
जुलाई में करें रोपाई
जुलाई में तैयार शेड्स को खेत में मेढ़ या रिज बनाकर लगाया जाता है। इस तरीके का फायदा यह है कि किसान बारिश के मौसम में प्याज की फसल को सामान्य नर्सरी से तैयार करने के बजाय पहले से तैयार छोटे बल्बों की रोपाई कर सकते हैं। इससे फसल करीब 90 दिन में तैयार हो जाती है। इसलिए जुलाई में रोपाई की गई फसल अक्टूबर के आसपास बाजार में लाई जा सकती है। यही समय प्याज के बाजार भाव के लिहाज से किसानों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
अक्टूबर-नवंबर में मिल सकता है बेहतर भाव
रबी प्याज की फसल खत्म होने के बाद अक्टूबर-नवंबर में बाजार में प्याज की मांग बनी रहती है। इस दौरान खरीफ प्याज की बिक्री से किसानों को सामान्य सीजन की तुलना में बेहतर भाव मिलने की संभावना रहती है। उत्पादन, लागत और बाजार भाव के आधार पर इस खेती में दोगुने से तीन गुने तक मुनाफे की संभावना बताई गई है। हालांकि वास्तविक कमाई बाजार भाव, उत्पादन लागत और फसल की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी।
इन किस्मों को लगाने की सलाह
खरीफ सीजन में प्याज की खेती के लिए विशेषज्ञों ने सामान्य सुखसागर जैसी किस्मों के बजाय पतली गर्दन वाली किस्मों को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं- N-53, आर्का कल्याण और ADF शामिल हैं। किसान अपने क्षेत्र की मिट्टी, मौसम और बाजार की स्थिति के अनुसार किस्म का चुनाव करें।
जैविक तरीके से भी कर सकते हैं खेती
इस तकनीक में प्राकृतिक खेती के तरीकों को भी अपनाया जा सकता है। इसमें रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के बजाय जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और आच्छादन जैसे प्राकृतिक उपायों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है। बीमारी या कीट का प्रकोप होने पर नीमास्त्र और दसपर्णी अर्क जैसे जैविक उपायों से नियंत्रण का प्रयास किया जाता है।
थ्रिप्स और माइट से बचाव जरूरी
प्याज की फसल में थ्रिप्स और माइट जैसे रस चूसने वाले छोटे कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनसे बचाव के लिए शुरुआती स्तर पर नीम ऑयल जैसे जैविक उत्पादों का इस्तेमाल किया जा सकता है। खेत में नियमित निगरानी करना जरूरी है, ताकि शुरुआती प्रकोप में ही नियंत्रण किया जा सके।
बारिश और तूफान से फसल को खतरा
खरीफ में प्याज की खेती में सबसे बड़ा जोखिम बारिश है। ज्यादा बारिश, खेत में पानी भरने या चक्रवात की स्थिति में फसल को नुकसान हो सकता है। इसलिए खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था जरूरी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरीके से तैयार की गई प्याज की फसल ने लगातार कई दिनों तक भारी तूफान का सामना भी किया है। हालांकि हर मौसम में फसल का प्रदर्शन अलग हो सकता है, इसलिए किसान स्थानीय मौसम और कृषि विशेषज्ञों की सलाह को ध्यान में रखें।
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