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MUSHROOM MARKET: कृषि में बड़े बदलाव का वाहक बन रहा मशरूम, टिकाऊ खेती और कमोडिटी बाजार में बढ़ रहा महत्व

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 25 Jan 2025 02:28 PM IST
सार

मशरूम का उत्पादन और इसका कारोबार कृषि में एक बड़े बदलाव का वाहक बन रहा है, जिससे आर्थिक अवसर और पर्यावरणीय लाभ दोनों मिल रहे हैं। इससे किसानों को अच्छी कमाई के अवसर भी मिल रहे हैं। खाद्य मशरूम का बढ़ता बाजार भारत के कृषि क्षेत्र और उससे जुड़े क्षेत्रों को पर्याप्त लाभ प्रदान करने के लिए तैयार है।

मशरूम की टिकाऊ खेती से आर्थिक अवसर और पर्यावरणीय लाभ दोनों मिल रहे हैं। तकनीक से बह रही है नई बयार।
मशरूम की टिकाऊ खेती से आर्थिक अवसर और पर्यावरणीय लाभ दोनों मिल रहे हैं। तकनीक से बह रही है नई बयार। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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हाल के वर्षों में, खाद्य मशरूम के वैश्विक बाजार में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जिसमें भारत इस बढ़ते हुए उद्योग में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। वर्ष 2024 तक, बाजार का मूल्य लगभग 67.4 अरब डॉलर होने का अनुमान है, जो वर्ष 2029 तक 7.57 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ 97.1 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह तीव्र वृद्धि मशरूम में छिपे पोषण और इसके पर्यावरणीय लाभों के लिए बढ़ती उपभोक्ता मांग को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। साथ ही, पौधों पर आधारित शाकाहारी आहार की बढ़ती प्रवृत्ति का भी इससे पता चलता है।

बढ़ रहा है मशरूम का बाजार 

भारत में, खाद्य मशरूम क्षेत्र ने 2024 में अनिवार्य वृद्धि का अनुभव किया, पूर्वानुमानों के अनुसार 2025 तक बाजार मूल्य 34.7 अरब डॉलर हो जाएगा। इस उछाल का श्रेय पौष्टिक और बहुमुखी सुपरफूड विकल्प के रूप में मशरूम की बढ़ती लोकप्रियता को दिया जा सकता है। ऑयस्टर, शिटेक, लायन मेन और बटन मशरूम जैसी किस्मों को इनके मजबूत पोषण संबंधी लाभों के कारण विशेष रूप से पसंद किया जा रहा है। शाकाहारी आहार की ओर बदलाव ने पौधे-आधारित प्रोटीन के एक आवश्यक स्रोत के रूप में मशरूम में रुचि को भी बढ़ावा दिया है।

टिकाऊ खेती से पर्यावरणीय लाभ

मशरूम की खेती कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है और यह टिकाऊ खेती की प्रथाओं का हिस्सा है। पर्यावरण के दृष्टिकोण से, मशरूम की खेती टिकाउ कृषि पद्धति में शुमार की जाती है। इसके लिए, पारंपरिक खेती की तुलना में काफी कम भूमि और पानी की आवश्यकता होती है। कृषि अपशिष्ट का उपयोग भी इसकी खेती में किया जा सकता है, जिससे पारिस्थितिकी स्थिरता को बढ़ावा मिलता है और अपशिष्ट निपटारे की समस्या से भी निजात मिलता है। इसके अतिरिक्त, यह प्रक्रिया पशुपालन की तुलना में कम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती है, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के उद्देश्य से वैश्विक पहलों का समर्थन करती है।


स्वास्थ्य से जुड़े कई फायदे 

मशरूम विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जो उन्हें संतुलित आहार के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प के रूप में पेश करते हैं। कम कैलोरी और कम वसा के साथ, मशरूम उन लोगों के लिए भी फायदेमंद है, जो अपना वजन नियंत्रित रखना चाहते हैं। इसके अलावा, शोध से संकेत मिलता है कि मशरूम प्रतिरक्षा को बढ़ाने में भी सहायक हो सकते हैं और पुरानी बीमारियों की संभावना को कम कर सकते हैं। इस तरह, इसके फायदों की फेहरिस्त काफी लंबी है। 

सरकारी समर्थन का असर 

मशरूम की खेती के क्षेत्र की क्षमता को पहचानते हुए, भारत सरकार ने कई सहायक नीतियां बनाई हैं। वर्ष 2025 में, मशरूम किसानों को 50 प्रतिशत तक की वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए सब्सिडी पहल शुरू की गई थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आवश्यक संसाधन प्रदान करके मशरूम की खेती को अपनाने में सुविधा प्रदान करना है। इसके अलावा, सरकार ने किसानों को टिकाऊ खेती तकनीकों और स्पॉन उत्पादन के बारे में शिक्षित करने के लिए प्रशिक्षण सत्र शुरू किए हैं। इन नीतिगत पहलों ने उद्योग को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन और मशरूम की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है। सरकारी समर्थन ने रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, जिससे आर्थिक विकास में योगदान मिला है।

तकनीक से बदली तस्वीर 

एंड फंगी के संस्थापक और सीईओ तरुण आहूजा कहते हैं, मशरूम की खेती को बदलने में तकनीकी प्रगति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्वचालित कृषि प्रणाली, परिष्कृत स्पॉन उत्पादन विधियां और प्रिसिजन फार्मिंग जैसे नवाचार इस क्षेत्र में क्रांति ला रहे हैं। ये प्रगति किसानों को उत्पादन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने, श्रम लागत को कम करने और मशरूम की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, फसलों में बीमारी को रोकने के लिए, पूरी तरह से साफ और कीटाणुओं से मुक्त वातावरण बनाने के लिए अंकुरण कक्ष और आटोक्लेव का उपयोग किया जाता है। बता दें कि आटोक्लेव एक ऐसा उपकरण है, जो भाप का उपयोग करके वस्तुओं को जीवाणुरहित करता है।

इसी तरह, उच्च गुणवत्ता वाले ऊतक संवर्धन और मातृ स्पॉन के विकास ने स्वस्थ और अधिक प्रचुर मात्रा में मशरूम की पैदावार को सुनिश्चित किया है। जैसे-जैसे ये तकनीकें विकसित होती जा रही हैं, इनसे खाद्य मशरूम बाजार में महत्वपूर्ण वृद्धि होने की उम्मीद है, जिससे यह किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए एक आकर्षक अवसर पेश कर रहा है।
मशरूम की खेती छोटी जगह व कम खर्च में की जा सकती है।
मशरूम की खेती छोटी जगह व कम खर्च में की जा सकती है। - फोटो : गांव जंक्शन

आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व

भारत में टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने और कमोडिटी बाजार को प्रभावित करने में मशरूम महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरा है। मशरूम की खेती से जुड़े स्वास्थ्य और पर्यावरणीय लाभों के साथ-साथ खाद्य मशरूम क्षेत्र का तेजी से विस्तार, इस उद्योग के आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व को उजागर करता है। सरकारी समर्थन और निरंतर तकनीकी प्रगति के साथ, मशरूम की खेती का भविष्य उज्ज्वल है। 
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