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बढ़ सकता है अल नीनो का खतरा: एशिया में सूखे की आशंका तेज, भारत समेत शीर्ष चावल निर्यातक देशों पर मंडराया संकट

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 22 Sep 2026 02:14 PM IST
सार

इस साल रिकॉर्ड तोड़ अल नीनो की आशंका है, जो एशिया समेत दुनियाभर में गंभीर सूखे और अन्य मौसमी आपदाओं का कारण बन सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण-पूर्व एशिया पर पड़ने की आशंका है, लेकिन भारत, वियतनाम और थाईलैंड जैसे दुनिया के तीन शीर्ष चावल निर्यातक देश भी इससे बुरी तरह प्रभावित होने वाले देशों में शामिल हैं। जानिए, विस्तार से...

दुनिया के तीन शीर्ष चावल निर्यातक देश भारत, वियतनाम और थाईलैंड इस साल अल नीनो से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल हैं।
दुनिया के तीन शीर्ष चावल निर्यातक देश भारत, वियतनाम और थाईलैंड इस साल अल नीनो से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल हैं। - फोटो : AI Image
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विस्तार
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दुनियाभर के मौसम संकेत इस साल एक रिकॉर्ड तोड़ अल नीनो की ओर इशारा कर रहे हैं, जो विशेषज्ञों के मुताबिक एशिया में गंभीर सूखा और दुनिया के कई हिस्सों में अन्य मौसमी आपदाएं ला सकता है, जिससे करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम के मुताबिक, 2027 के अंत तक इससे करीब 4.9 करोड़ और लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की चपेट में आ सकते हैं, जबकि गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि वैश्विक खाद्य कीमतों में 15% से ज्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है।

अल नीनो क्या है और क्यों है इस बार अलग
अल नीनो समुद्री तापमान में बदलाव की एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, लेकिन इस साल इसके दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में सूखे, लू, बाढ़ और अन्य जलवायु-संबंधी उथल-पुथल के नए चरम स्तर तक पहुंचने की आशंका है। दक्षिण-पूर्व एशिया दुनिया के सबसे जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है, जो पहले से ही ईरान युद्ध के चलते ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। अल नीनो पहले ही खेतों में जंगल की आग भड़का रहा है, बड़े शहरों की जलापूर्ति घटा रहा है और मछली पकड़ने के कारोबार को नुकसान पहुंचा रहा है।

एशिया की जिन सरकारों ने युद्ध के चलते बढ़ी ऊर्जा कीमतों और उर्वरक की कमी से निपटने के लिए अपने वित्तीय भंडार का इस्तेमाल किया है, उनके पास अब दिसंबर में चरम पर पहुंचने वाले इस तीव्र अल नीनो से निपटने की क्षमता कम बची है। सिंगापुर के ISEAS-यूसुफ इशाक इंस्टीट्यूट से जुड़े पॉल टेंग के मुताबिक, "अल नीनो सिर्फ उन तमाम दूसरी समस्याओं को और बढ़ा रहा है, जो हम पहले से देख रहे हैं।"

चावल के शीर्ष निर्यातकों में भारत भी शामिल
दक्षिण-पूर्व एशिया में बरसात का मौसम आमतौर पर जून से अक्टूबर तक चलता है, जब बारिश जलाशयों को फिर से भरती है, गर्म शहरों को ठंडा करती है और अगली बुआई के सीजन से पहले सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराती है। संयुक्त राष्ट्र की राफिसुरा के मुताबिक, सूखे के चलते किसानों को बुआई टालनी पड़ सकती है, खेती का रकबा घटाना पड़ सकता है, या पूरी तरह फसल बदलनी पड़ सकती है। उन्होंने कहा, "कृषि इस मामले में सबसे आगे है।"

यहां सबसे अहम बात यह है कि चावल और पाम ऑयल जैसी मुख्य फसलों में कटौती का असर वैश्विक स्तर पर पड़ सकता है। दुनिया के तीन शीर्ष चावल निर्यातक देश भारत, वियतनाम और थाईलैंड इस साल अल नीनो से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल हैं। यानी अगर भारत में मानसून कमजोर रहता है और चावल उत्पादन पर असर पड़ता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक चावल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है, जिससे भारत के किसानों के साथ-साथ दुनियाभर के उपभोक्ता भी प्रभावित हो सकते हैं।

बैंकॉक के उत्तर में थाईलैंड के 55 वर्षीय धान किसान बूनमार्क मार्कसूक जैसे किसान पहले ही मुश्किल फैसलों का सामना कर रहे हैं। युद्ध के चलते महंगे ईंधन और उर्वरक के अलावा, अब वे अपना ज्यादातर समय अपने धान के खेतों में पानी पंप करने में बिता रहे हैं, क्योंकि उन्हें अब बारिश पर भरोसा नहीं रहा।

पाम ऑयल आपूर्ति पर भी संकट
अल नीनो का असर इंडोनेशिया और मलेशिया पर भी पड़ रहा है, जो दुनिया के करीब 85% पाम ऑयल की आपूर्ति करते हैं — जिसका इस्तेमाल बिस्किट और लिपस्टिक से लेकर टूथपेस्ट और डिटर्जेंट तक हर चीज में होता है। मलेशिया के प्रधानमंत्री ने अपने कृषि एवं खाद्य सुरक्षा मंत्रालय को अल नीनो के असर को कम करने के उपाय तलाशने का निर्देश दिया है, जिसका सबसे ज्यादा असर नवंबर में मलेशिया पर पड़ने का अनुमान है।

इंडोनेशियाई पाम ऑयल एसोसिएशन के अध्यक्ष एड्डी मार्टोनो के मुताबिक, इंडोनेशिया में किसान उर्वरकों को मिट्टी में घोलने के लिए बारिश पर निर्भर रहते हैं, ताकि पौधे जलें नहीं। उन्होंने कहा, "अगर बारिश नहीं होती, तो हर कोई खाद डालना बंद कर देगा," जिससे देश का कुल उत्पादन प्रभावित होगा।

वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर मंडराया खतरा
अल नीनो वर्षों के दौरान प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है, जो कुछ वर्षों के अंतराल पर होता है और अक्सर वैश्विक मौसम पैटर्न को बदल देता है। संयुक्त राष्ट्र के एशिया-प्रशांत आर्थिक और सामाजिक आयोग की आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रभाग की प्रमुख करेफ राफिसुरा के मुताबिक, इस साल समुद्र पहले से ही औसत से ज्यादा गर्म हैं, और अगस्त में वैश्विक महासागरों ने जलवायु गर्म होने के चलते नए तापमान रिकॉर्ड बनाए हैं।

ब्रिटेन की राष्ट्रीय मौसम एवं जलवायु सेवा के मुताबिक, यह तीव्र होता अल नीनो "इतिहास में अब तक का सबसे मजबूत" हो सकता है। इसी तरह अमेरिका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन ने कहा है कि 69% संभावना है कि यह 1950 से अब तक दर्ज किया गया सबसे तीव्र अल नीनो साबित होगा।

संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम के मुताबिक, अल नीनो का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह से महसूस होगा, लेकिन इससे दुनियाभर में खाद्य सुरक्षा को खतरा पहुंचने की आशंका है। इसके चलते 2027 के अंत तक कम से कम 4.9 करोड़ और लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की चपेट में आ सकते हैं। एजेंसी के मुताबिक, यह समस्या मध्य अमेरिका और दक्षिणी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सबसे गंभीर रहेगी, जबकि पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया पर भी इसका बड़ा असर पड़ने की आशंका है और भारत इसी दक्षिण एशियाई क्षेत्र का हिस्सा है।

आर्थिक नुकसान खरबों डॉलर तक पहुंचने का अनुमान
किसी गंभीर अल नीनो से होने वाले कुल आर्थिक नुकसान का सटीक आकलन मुश्किल है, लेकिन HSBC की ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च के मुताबिक, पिछली घटनाओं से हुआ नुकसान खरबों डॉलर तक पहुंच चुका है, और इस बार यह आंकड़ा और भी बड़ा हो सकता है। निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों का अनुमान है कि इस बार का अल नीनो वैश्विक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 15% से ज्यादा की बढ़ोतरी कर सकता है।
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