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छत्तीसगढ़ का मॉडल बना मिसाल : 2500 कंटूर ट्रेंच का कमाल! गांव में मिला रोजगार, पहाड़ों में रुका पानी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 11 Jul 2026 08:57 PM IST
सार

  • छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में 'मोर गांव मोर पानी' अभियान 
  • 2,500 कंटूर ट्रेंच बनाकर ग्रामीणों ने वर्षा जल संरक्षण की छेड़ी मुहिम 
  • भूजल स्तर सुधरने, मिट्टी संरक्षण और पलायन रोकने में मिल रही मदद 

लगभग 1,000 ट्रेंच करीब 2.98 लाख रुपये की लागत से तैयार किए गए हैं।
लगभग 1,000 ट्रेंच करीब 2.98 लाख रुपये की लागत से तैयार किए गए हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में 'मोर गांव मोर पानी' अभियान जल संरक्षण और ग्रामीण रोजगार का सफल उदाहरण बनकर उभरा है। इस अभियान के तहत अब तक 2,500 स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच (SCT) बनाए जा चुके हैं। इन संरचनाओं का उद्देश्य केवल वर्षा जल को रोकना नहीं, बल्कि ग्रामीणों को उनके गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराकर पलायन रोकना भी है।

2500 कंटूर ट्रेंच से बढ़ेगी जल सुरक्षा
जिला प्रशासन के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके से कंटूर ट्रेंच बनाए जा रहे हैं, ताकि बारिश का पानी बहने के बजाय जमीन में समा सके। इससे भूजल स्तर रिचार्ज होगा, जलस्रोतों को नई ऊर्जा मिलेगी और खेतों की मिट्टी का कटाव भी कम होगा। यह पहल भविष्य में खेती और ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।

VB-G RAM G से बढ़ी मजदूरी और रोजगार
यह कार्य विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन ग्रामीण (VB-G RAM G) के तहत किया जा रहा है। योजना में ग्रामीणों को 125 दिन का गारंटीकृत रोजगार और 300 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिल रही है। पहले मनरेगा के तहत उन्हें 100 दिन का रोजगार और 261 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलती थी। बढ़ी हुई मजदूरी और अतिरिक्त कार्यदिवसों से ग्रामीणों की आय में सुधार हुआ है।

गांव में ही काम मिलने से रुका पलायन
शंकरगढ़ जनपद पंचायत के सरिमा गांव में अकेले करीब 1,000 कंटूर ट्रेंच बनाए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पहले रोजगार के लिए पंजाब सहित दूसरे राज्यों में जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में ही काम मिलने से पलायन लगभग रुक गया है। स्थानीय रोजगार मिलने से परिवार साथ रह रहे हैं और आर्थिक स्थिति भी बेहतर हो रही है।

कम लागत में बड़ा फायदा
बलरामपुर के कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी के अनुसार लगभग 1,000 ट्रेंच करीब 2.98 लाख रुपये की लागत से तैयार किए गए हैं। यह श्रम आधारित कार्य होने के कारण ग्रामीणों को सीधे रोजगार मिला है। बारिश का पानी इन ट्रेंच में संग्रहित होकर धीरे-धीरे जमीन में समाता है, जिससे भविष्य में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है।

खेती, पर्यावरण और गांव... तीनों को लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि कंटूर ट्रेंच तकनीक से वर्षा जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज, मिट्टी संरक्षण और हरित आवरण बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही स्थानीय रोजगार उपलब्ध होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

बलरामपुर का यह मॉडल दिखाता है कि यदि जल संरक्षण और रोजगार योजनाओं को साथ जोड़कर लागू किया जाए तो गांवों में टिकाऊ विकास और पलायन रोकने की दिशा में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
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