भारतीय किसान संघ द्वारा राजधानी दिल्ली में आयोजित पहले राष्ट्रीय महिला किसान सम्मेलन में RSS के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने कहा कि महिलाओं को मात्र खेतों में काम करने वाले कार्यबल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम किसान और कृषि उद्यमी के रूप में कानूनी और सामाजिक मोर्चे पर पहचान मिलनी चाहिए। इस सम्मेलन में देशभर से पांच हजार महिला किसान और BKS पदाधिकारी अपने खर्च पर सम्मेलन में शामिल हुईं।
आरएसएस के वरिष्ठ नेता रामलाल के अनुसार, टिकाऊ खेती और समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े निर्णयों में महिला किसानों ोक सबसे आगे रखा जाना चाहिए।
खेती में 60 से 70 फीसदी श्रम के बावजूद कामगार की पहचान
आरएसएस नेता ने बताया कि बुवाई, कटाई से देशी बीजों के संरक्षण और पशुपालन तक महिलाओं ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि खेती से जुड़े शारीरिक श्रम का लगभग 60 से 70 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं, इसके बावजूद सामाजिक व्यवस्था और सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें अक्सर केवल कृषि मजदूर या परिवार के मददगार के तौर पर देखा जाता है।
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026 की पृष्ठभूमि में बीकेएस की महिला शाखा के मार्गदर्शन में आयोजित यह सम्मेलन इस धारणा को बदलने और महिला किसानों को उनकी सही पहचान, गरिमा और आत्मसम्मान दिलाने का माध्यम बना है।
साल 2047 के विकसित भारत के विजन में गौ-कृषि और पांच प्रमुख स्तंभ
सम्मेलन में साल 2047 तक विकसित और स्वस्थ भारत को बनाने में पारंपरिक कृषि की भूमिका पर मंथन हुआ, जिसमें गौ-कृषि-वाणिज्यम् का विचार प्रमुख रहा। इसके अलावा जीएम और जीन-एडिटिंग के माध्यम से तैयार किस्मों का विरोध भी चर्चा का विषय रहा।
आरएसएस नेता ने बताया कि सम्मेलन में पांच प्रमुख स्तंभ तय किए गए हैं - रसायन मुक्त खेती और गौ-आधारित जैविक कृषि, पौष्टिक भोजन, रोगमुक्त जीवन, नशामुक्त समाज और कृषि उपज का लाभकारी भाव। उन्होंने सम्मेलन में महिलाओं द्वारा दिए गए नारे हम भारत की महिलाएं वैभव लाएंगी की सराहना करते हुए कहा कि इसने अन्नदाता शब्द को एक नया गौरव दिया है और देश को रोगमुक्त व समृद्ध बनाने की दिशा में ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत की है।
कॉर्पोरेट और रासायनिक खेती की जगह महिला किसानों पर केंद्रित हों सरकारी योजनाएं
रामलाल ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की कि वे अपनी नीतियों के केंद्र में महिला किसानों को रखें और उनकी जरूरतों के हिसाब से योजनाएं तैयार करें। उन्होंने कहा कि महिला किसानों को आसानी से कर्ज, स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां और जैविक उत्पादों के विपणन की सुविधाएं मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मौजूदा नीतियां अक्सर कॉर्पोरेट और रसायन आधारित खेती के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण विकास की सफलता महिला शक्ति के हाथों में है। उन्होंने महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित इस सम्मेलन के आयोजन के लिए भारतीय किसान संघ को बधाई दी और अन्य संगठनों को भी ऐसी पहलों से सीखने का सुझाव दिया।