आगामी रबी सीजन में बारिश पर निर्भर (रेनफेड) क्षेत्रों के लिए मौसम चुनौतीपूर्ण रह सकता है। कृषि सचिव अतीश चंद्र ने सोमवार को कहा कि अल नीनो मौसम पैटर्न के असर से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने राज्यों को अभी से मौसम की स्थिति के अनुसार फसल प्रबंधन की रणनीति तैयार करने की सलाह दी। रबी फसलों की बुवाई अक्टूबर से शुरू होती है। गेहूं, सरसों समेत अन्य रबी फसलों की बुवाई से पहले दो दिवसीय राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन-रबी अभियान 2026 में सीजन की तैयारियों पर चर्चा हुई।
कहीं ज्यादा नमी तो कहीं बारिश की कमी की चुनौती
कृषि सचिव ने कहा कि खरीफ सीजन भी खासकर बारिश पर निर्भर क्षेत्रों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा। कई राज्यों में पहले फसलों की बुआई और क्षेत्र कवरेज की समस्या आई और बाद में फसलों को बचाना मुश्किल हुआ। उन्होंने कहा कि आगामी रबी सीजन में कुछ राज्यों को मिट्टी में ज्यादा नमी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। वहीं कम बारिश वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक नमी की कमी का असर रह सकता है। इसलिए राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति तैयार करनी होगी।
जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से दिख रहा
अतीश चंद्र ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि मौजूदा हकीकत है। कई सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी बेमौसम और भारी बारिश से फसलों को नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले माना जाता था कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां भविष्य में सामने आएंगी, लेकिन अब बदलाव तेजी से दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में खेती को बदलते मौसम के अनुसार तैयार करना जरूरी है।
638 लाख हेक्टेयर में होती है रबी की खेती
कृषि सचिव के अनुसार देश में सामान्य तौर पर करीब 638 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में रबी फसलों की बुआई होती है। इसमें 300 लाख हेक्टेयर से अधिक में गेहूं, करीब 140 लाख हेक्टेयर में दलहन, 87 लाख हेक्टेयर में तिलहन और 55 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज की खेती होती है। भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है, लेकिन दालों, तिलहनों और कुछ बागवानी उत्पादों, जैसे फलों के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता है।
फसल विविधीकरण से आत्मनिर्भरता पर जोर
अतीश चंद्र ने आत्मनिर्भरता के लिए फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। हालांकि उन्होंने कहा कि इसके रास्ते में अनुसंधान, जलवायु अनुकूल खेती और किसानों की आय से जुड़ी कई चुनौतियां हैं। उन्होंने कहा कि फसल विविधीकरण के साथ टिकाऊ खेती पर भी ध्यान देना होगा। सरकार की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ और मृदा स्वास्थ्य जैसी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इनके असर का आकलन केवल सब्सिडी बांटने के आधार पर नहीं, बल्कि खेत स्तर पर इनके परिणामों को देखकर किया जाना चाहिए।
किसानों की आय बढ़ाना हो प्राथमिकता
कृषि सचिव ने राज्य सरकारों से ऐसी योजनाओं और उपायों पर ध्यान देने को कहा, जिनसे किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी हो। उन्होंने कृषि क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को भी एक अहम प्राथमिकता बताया। उन्होंने कहा कि फसल उत्पादन से पहले और उत्पादन के बाद दोनों स्तरों पर बुनियादी सुविधाओं में काफी कमियां हैं। आधुनिक कृषि ढांचे को विकसित करने से फसल के नुकसान को कम किया जा सकता है।
फल-सब्जियों के लिए खरीद व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत
उन्होंने कहा कि फलों और सब्जियों के लिए अभी अनाज जैसी सरकारी खरीद व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद बाजार की मांग के कारण बागवानी क्षेत्र का उत्पादन और बाजार दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि बागवानी की वृद्धि दर अब अनाज, दालों और तिलहनों की तुलना में तेज है। कृषि बाजार से जुड़े सुधार किए गए हैं, लेकिन कई स्तरों पर बनी व्यवस्थाओं के कारण इन सुधारों का पूरा लाभ जमीन पर नहीं पहुंच पा रहा है। इसकी समीक्षा जरूरी है।
डिजिटल कृषि को बताया सबसे अहम प्राथमिकता
अतीश चंद्र ने डिजिटल कृषि को सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल किया। उन्होंने कहा कि सही आंकड़ों की कमी से कृषि की योजना बनाने में परेशानी होती है। रबी, खरीफ और जायद फसलों की योजना के लिए उत्पादन, खेती के क्षेत्र और किसानों से जुड़े सटीक आंकड़े जरूरी हैं। उन्होंने किसान आईडी को जमीन के रिकॉर्ड से जोड़ने और वास्तविक किसानों को कृषि व्यवस्था से जोड़ने पर जोर दिया। उनके अनुसार, बड़े स्तर पर किसान डेटा तैयार करने की यह पहल महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि किसानों तक योजनाओं और सेवाओं की अंतिम छोर तक पहुंच (लास्ट माइल कनेक्टिविटी) मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए किसान आईडी बनाना, उसे जमीन के रिकॉर्ड से जोड़ना और खेती करने वाले किसानों को डिजिटल व्यवस्था में शामिल करना जरूरी है।
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