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उत्तर प्रदेश : दलहनी-तिलहनी फसलों की खेती से बढ़ाएं कमाई, बुवाई से पहले रखें इन बातों का ध्यान

संतोष देव गिरि, मिर्जापुर Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 29 Oct 2026 07:49 PM IST
सार

मिर्जापुर के कृषि विज्ञान केंद्र ने सरसों, मटर और मसूर की खेती के लिए जरूरी सलाह दी है। जानें सरसों की उन्नत किस्में, बुवाई का समय और बीजोपचार का महत्व।

यूपी में दलहनी-तिलहनी फसलों की खेती से बढ़ाएं कमाई
यूपी में दलहनी-तिलहनी फसलों की खेती से बढ़ाएं कमाई - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में खेती का बड़ा हिस्सा बारिश पर निर्भर है। यहां किसान सरसों, चना, अरहर और मसूर जैसी दलहनी-तिलहनी फसलों को कमाई का अच्छा जरिया मानते हैं। हालांकि, सही समय पर बुवाई, उन्नत बीजों का चयन और फसल की उचित देखभाल नहीं होने पर किसानों को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को रबी सीजन में दलहनी-तिलहनी फसलों की खेती वैज्ञानिक तरीके से करने की सलाह दी है।

सही समय पर बुवाई और बीज उपचार जरूरी
मिर्जापुर के हलिया क्षेत्र के किसान राघवेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि पहाड़ी इलाकों में सरसों, अरहर, चना और तीसी की खेती से अच्छी कमाई हो सकती है। हालांकि, नीलगाय और छुट्टा मवेशियों से फसल की सुरक्षा करना बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, अधिक बारिश, कोहरा और पाला पड़ने से भी फसलों को नुकसान हो सकता है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), वाराणसी के कृषि विज्ञान केंद्र, बरकछा (मिर्जापुर) के अध्यक्ष प्रो. श्रीराम सिंह ने बताया कि किसान दलहनी-तिलहनी फसलों की खेती से अपनी आमदनी बढ़ाने के साथ मिट्टी की उर्वरता सुधारने में भी मदद कर सकते हैं। दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने में सहायक होती हैं। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे अपनी जरूरत के अनुसार प्रमाणित बीज खरीदें और समय पर बुवाई करें।

सरसों की इन उन्नत किस्मों से बढ़ा सकते हैं उत्पादन
प्रो. श्रीराम सिंह के मुताबिक, कृषि विज्ञान केंद्र बरकछा में रबी सीजन की बुवाई के लिए सरसों की बृजराज, सुरेखा और आरएच 1424 किस्मों के बीज उपलब्ध हैं। ये किस्में लगभग 125 से 130 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। अनुकूल परिस्थितियों में इनसे प्रति एकड़ औसतन 10 से 12 क्विंटल तक उपज मिल सकती है।

उन्होंने बताया कि बेहतर उत्पादन के लिए किसानों को समय पर बुवाई करने के साथ संतुलित मात्रा में खाद का इस्तेमाल करना चाहिए। सरसों की बुवाई कतारों में करें और बीज को बोने से पहले उपचारित करें। इसके अलावा, मिट्टी की जरूरत के अनुसार सल्फर का इस्तेमाल भी फसल के लिए लाभकारी हो सकता है।

नवंबर के पहले सप्ताह तक सरसों की बुवाई की सलाह
कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि सरसों की समय से बुवाई के लिए खेत में पर्याप्त नमी होना जरूरी है। किसानों को नवंबर के पहले सप्ताह तक समय पर बोई जाने वाली किस्मों की बुवाई पूरी करने का प्रयास करना चाहिए।

समय से बुवाई के लिए आरएच 725, आरएच 761, आरएच 1424, सुरेखा और गिरिराज जैसी किस्मों पर विचार किया जा सकता है। वहीं, धान की कटाई के बाद देर से बुवाई की स्थिति में राधिका, डीआरएमआर 150-35 और बृजराज जैसी किस्मों का चयन किया जा सकता है। किस्म चुनने से पहले अपने क्षेत्र की जलवायु और कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह जरूर लें।

मटर और मसूर के बीज भी उपलब्ध
कृषि विज्ञान केंद्र बरकछा में मटर की आईपीएफडी 13-2, आईपीएफडी 19-1 और आईपीएफडी 19-3 किस्मों के बीज भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा मसूर की आईपीएल 315 किस्म का बीज भी किसानों को दिया जा रहा है।

कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल करें, बीजोपचार के बाद उचित दूरी पर बुवाई करें और फसल की नियमित निगरानी रखें। इससे बीज के अंकुरण और फसल की बढ़वार में मदद मिल सकती है। किसान कृषि विज्ञान केंद्र में संपर्क कर अपने क्षेत्र के अनुसार बीजों और खेती की तकनीक की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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